क्या आधुनिक शिक्षा में जीवन मूल्य गायब हो रहे हैं?

अंकिता सुमन

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डिग्री और कौशल के बीच कहीं छूटता जा रहा चरित्र निर्माण का सवाल

नई शिक्षा नीति, स्मार्ट क्लासरूम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारतीय शिक्षा प्रणाली तेजी से बदल रही है। पाठ्यक्रम अधिक व्यावहारिक हो रहे हैं, करियर विकल्प बढ़े हैं और छात्रों को “जॉब-रेडी” बनाने पर खास जोर है। लेकिन इसी प्रगति के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या आधुनिक शिक्षा में जीवन मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं?

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार दिलाना नहीं, बल्कि जिम्मेदार, संवेदनशील और नैतिक नागरिक तैयार करना भी होता है। आज स्कूल और कॉलेजों में सफलता को अंकों, रैंकिंग और पैकेज से मापा जा रहा है। प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि सहानुभूति, धैर्य, ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य पाठ्यपुस्तकों से बाहर होते दिख रहे हैं।

क्या बदला है शिक्षा का फोकस?
आधुनिक शिक्षा प्रणाली कौशल-आधारित मॉडल पर केंद्रित है। कोडिंग, मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और तकनीकी दक्षता को प्राथमिकता मिल रही है, जो समय की मांग भी है। समस्या तब पैदा होती है जब इसी प्रक्रिया में नैतिक शिक्षा, नागरिक बोध और मानवीय संवेदनाएं गौण हो जाती हैं। कई संस्थानों में मूल्य शिक्षा अब केवल एक औपचारिक पीरियड या वैकल्पिक विषय बनकर रह गई है।

परिणाम समाज में दिख रहे हैं
शिक्षा और व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी के संकेत समाज में साफ नजर आते हैं। छात्रों में तनाव, अवसाद और असहिष्णुता बढ़ रही है। असफलता को स्वीकार करने का धैर्य कम हुआ है। सोशल मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति ने त्वरित सफलता और दिखावे को बढ़ावा दिया है, जिससे नैतिक विवेक कमजोर पड़ रहा है। जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा सिखाती है और सहयोग नहीं, तब सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होना स्वाभाविक है।

क्या पूरी तरह दोष शिक्षा व्यवस्था का है?
इस सवाल का उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता। परिवार, समाज और डिजिटल वातावरण भी उतने ही जिम्मेदार हैं। पहले जीवन मूल्य घर और समुदाय से स्वतः मिल जाते थे। आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवाद कम हो रहा है और बच्चों का अधिक समय स्क्रीन के साथ बीत रहा है। ऐसे में शिक्षा संस्थानों पर अपेक्षाएं और बढ़ जाती हैं।

नीति और व्यवहार के बीच अंतर
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में नैतिकता, भारतीय ज्ञान परंपरा, सह-अस्तित्व और संवैधानिक मूल्यों की बात की गई है। लेकिन जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन असमान है। मूल्य शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित ढांचे में ढालना कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। शिक्षक प्रशिक्षण, गतिविधि-आधारित सीख और सामुदायिक सहभागिता से इसे प्रभावी बनाया जा सकता है।

आगे का रास्ता क्या है?
समाधान शिक्षा को पीछे ले जाने में नहीं, बल्कि संतुलन बनाने में है। आधुनिक कौशल और जीवन मूल्यों को एक-दूसरे का विरोधी मानना गलत होगा। तकनीक के साथ करुणा, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग और सफलता के साथ विनम्रता सिखाई जा सकती है। इसके लिए पाठ्यक्रम के साथ-साथ शिक्षण पद्धति और मूल्यांकन प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है।

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www.dainikjagranmpcg.com
03 Feb 2026 By Nitin Trivedi

क्या आधुनिक शिक्षा में जीवन मूल्य गायब हो रहे हैं?

अंकिता सुमन

नई शिक्षा नीति, स्मार्ट क्लासरूम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में भारतीय शिक्षा प्रणाली तेजी से बदल रही है। पाठ्यक्रम अधिक व्यावहारिक हो रहे हैं, करियर विकल्प बढ़े हैं और छात्रों को “जॉब-रेडी” बनाने पर खास जोर है। लेकिन इसी प्रगति के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या आधुनिक शिक्षा में जीवन मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं?

यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार दिलाना नहीं, बल्कि जिम्मेदार, संवेदनशील और नैतिक नागरिक तैयार करना भी होता है। आज स्कूल और कॉलेजों में सफलता को अंकों, रैंकिंग और पैकेज से मापा जा रहा है। प्रतिस्पर्धा इतनी तीव्र है कि सहानुभूति, धैर्य, ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्य पाठ्यपुस्तकों से बाहर होते दिख रहे हैं।

क्या बदला है शिक्षा का फोकस?
आधुनिक शिक्षा प्रणाली कौशल-आधारित मॉडल पर केंद्रित है। कोडिंग, मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और तकनीकी दक्षता को प्राथमिकता मिल रही है, जो समय की मांग भी है। समस्या तब पैदा होती है जब इसी प्रक्रिया में नैतिक शिक्षा, नागरिक बोध और मानवीय संवेदनाएं गौण हो जाती हैं। कई संस्थानों में मूल्य शिक्षा अब केवल एक औपचारिक पीरियड या वैकल्पिक विषय बनकर रह गई है।

परिणाम समाज में दिख रहे हैं
शिक्षा और व्यवहार के बीच बढ़ती दूरी के संकेत समाज में साफ नजर आते हैं। छात्रों में तनाव, अवसाद और असहिष्णुता बढ़ रही है। असफलता को स्वीकार करने का धैर्य कम हुआ है। सोशल मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति ने त्वरित सफलता और दिखावे को बढ़ावा दिया है, जिससे नैतिक विवेक कमजोर पड़ रहा है। जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा सिखाती है और सहयोग नहीं, तब सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होना स्वाभाविक है।

क्या पूरी तरह दोष शिक्षा व्यवस्था का है?
इस सवाल का उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता। परिवार, समाज और डिजिटल वातावरण भी उतने ही जिम्मेदार हैं। पहले जीवन मूल्य घर और समुदाय से स्वतः मिल जाते थे। आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवाद कम हो रहा है और बच्चों का अधिक समय स्क्रीन के साथ बीत रहा है। ऐसे में शिक्षा संस्थानों पर अपेक्षाएं और बढ़ जाती हैं।

नीति और व्यवहार के बीच अंतर
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में नैतिकता, भारतीय ज्ञान परंपरा, सह-अस्तित्व और संवैधानिक मूल्यों की बात की गई है। लेकिन जमीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन असमान है। मूल्य शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित ढांचे में ढालना कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। शिक्षक प्रशिक्षण, गतिविधि-आधारित सीख और सामुदायिक सहभागिता से इसे प्रभावी बनाया जा सकता है।

आगे का रास्ता क्या है?
समाधान शिक्षा को पीछे ले जाने में नहीं, बल्कि संतुलन बनाने में है। आधुनिक कौशल और जीवन मूल्यों को एक-दूसरे का विरोधी मानना गलत होगा। तकनीक के साथ करुणा, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग और सफलता के साथ विनम्रता सिखाई जा सकती है। इसके लिए पाठ्यक्रम के साथ-साथ शिक्षण पद्धति और मूल्यांकन प्रणाली में भी बदलाव जरूरी है।

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