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दतिया में बीजेपी का ओवरकॉन्फिडेंस... और जनता का एक फैसला जिसने पूरा चुनावी गणित बदल दिया
Opinion By Devendra Patel
उपचुनाव के नतीजे सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि सत्ता, संगठन और रणनीति के लिए एक राजनीतिक संदेश भी हैं
भारतीय राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती नहीं होते, वे नेताओं के आत्मविश्वास की भी परीक्षा लेते हैं। कई बार राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के दौरान ही जीत का जश्न मनाने लगते हैं। मंच पर भाषणों में आत्मविश्वास झलकता है, कार्यकर्ताओं के चेहरों पर जीत की चमक दिखाई देती है और रणनीतिकारों को लगता है कि इस बार भी गणित उनके पक्ष में ही बैठेगा। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत यही है कि जनता किसी भी राजनीतिक समीकरण की स्थायी साझेदार नहीं होती। दतिया विधानसभा उपचुनाव ने यही संदेश दिया है।
बीजेपी शायद इस भरोसे में थी कि संगठन की ताकत, सत्ता का प्रभाव और चुनावी मशीनरी मिलकर जीत की राह आसान बना देंगे। लेकिन मतगणना पूरी हुई तो तस्वीर बिल्कुल उलट थी। कांग्रेस के कुंवर घनश्याम सिंह जीत गए और बीजेपी को ऐसे इलाके में हार का सामना करना पड़ा, जिसे कभी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था।
टिकट बदला, लेकिन समीकरण भी बदल गए
राजनीति में चेहरा बदलना आसान होता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी भावनाओं को बदलना नहीं। बीजेपी ने इस बार पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह नए उम्मीदवार पर दांव लगाया। पार्टी का निर्णय संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा रहा होगा, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठने लगा कि क्या स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों की नब्ज सही ढंग से पढ़ी गई थी? राजनीतिक दल अक्सर मान लेते हैं कि कार्यकर्ता हर फैसले को सहज स्वीकार कर लेंगे। लेकिन कई बार सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपने ही संगठन के भीतर पैदा हुई खामोशी होती है।
खामोशी भी राजनीति करती है
इस पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उस नेता की रही, जो सबसे कम बोले। नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया और चुनाव प्रचार में भी संगठन के साथ दिखाई दिए। इसके बावजूद नतीजों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या टिकट परिवर्तन का असर कार्यकर्ताओं के उत्साह पर पड़ा? क्या स्थानीय स्तर पर वही ऊर्जा दिखाई दी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी? इन सवालों के जवाब बीजेपी के अंदर तलाशे जाएंगे, लेकिन चुनाव परिणाम ने इन्हें राजनीतिक बहस का हिस्सा जरूर बना दिया है।
कांग्रेस भी पूरी तरह सहज नहीं थी
दिलचस्प यह भी है कि कांग्रेस के भीतर भी सब कुछ सामान्य नहीं था। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने अपने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। यानी एक तरफ बीजेपी अपने नए प्रयोग के साथ मैदान में थी, तो दूसरी ओर कांग्रेस अपने अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही थी। इसके बावजूद जनता ने कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि कई बार मतदाता स्थानीय परिस्थितियों को संगठनात्मक विवादों से ज्यादा महत्व देता है।
तीसरे मोर्चे ने भी बदला समीकरण
दतिया उपचुनाव में आज़ाद समाज पार्टी की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय रंग दिया। पार्टी भले जीत नहीं सकी, लेकिन उसे मिले वोटों ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर खींचा। भारतीय चुनावों में कई बार तीसरा उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं करता, लेकिन जीत-हार का अंतर तय करने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दतिया में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिला।
कम मतदान भी छोड़ गया सवाल
इस उपचुनाव में मतदान प्रतिशत पिछली बार की तुलना में कम रहा। कम मतदान का असर किस दल पर पड़ा, इसका विस्तृत विश्लेषण समय के साथ होगा, लेकिन यह तय है कि जब समर्थक मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचते, तो चुनावी गणित बदलने में देर नहीं लगती। कई बार विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत उसकी रैली नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के मतदाता की चुप्पी बन जाती है।
बीजेपी के लिए संदेश, कांग्रेस के लिए भी सीख
दतिया का परिणाम सिर्फ बीजेपी के आत्ममंथन का विषय नहीं है। कांग्रेस के लिए भी यह संदेश है कि चुनाव जीतना और जनाधार को स्थायी बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं। वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा याद दिलाता है कि संगठन जितना मजबूत हो, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करना हमेशा आसान फैसला नहीं होता।
भारतीय लोकतंत्र की यही ताकत है कि यहां आखिरी फैसला किसी रणनीतिकार, किसी सर्वे या किसी राजनीतिक दावे का नहीं होता। मतदाता जब ईवीएम का बटन दबाता है, तो कई बार वर्षों से बने राजनीतिक समीकरण भी बदल जाते हैं। दतिया उपचुनाव शायद यही कह रहा है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा आत्मविश्वास जनता का होना चाहिए, राजनीतिक दलों का नहीं। क्योंकि चुनावों में जीत का सबसे बड़ा दुश्मन कई बार विपक्ष नहीं, बल्कि अपना ही अति-आत्मविश्वास बन जाता है।
— देवेंद्र पटेल
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दतिया में बीजेपी का ओवरकॉन्फिडेंस... और जनता का एक फैसला जिसने पूरा चुनावी गणित बदल दिया
Opinion By Devendra Patel
भारतीय राजनीति में चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती नहीं होते, वे नेताओं के आत्मविश्वास की भी परीक्षा लेते हैं। कई बार राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के दौरान ही जीत का जश्न मनाने लगते हैं। मंच पर भाषणों में आत्मविश्वास झलकता है, कार्यकर्ताओं के चेहरों पर जीत की चमक दिखाई देती है और रणनीतिकारों को लगता है कि इस बार भी गणित उनके पक्ष में ही बैठेगा। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत यही है कि जनता किसी भी राजनीतिक समीकरण की स्थायी साझेदार नहीं होती। दतिया विधानसभा उपचुनाव ने यही संदेश दिया है।
बीजेपी शायद इस भरोसे में थी कि संगठन की ताकत, सत्ता का प्रभाव और चुनावी मशीनरी मिलकर जीत की राह आसान बना देंगे। लेकिन मतगणना पूरी हुई तो तस्वीर बिल्कुल उलट थी। कांग्रेस के कुंवर घनश्याम सिंह जीत गए और बीजेपी को ऐसे इलाके में हार का सामना करना पड़ा, जिसे कभी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था।
टिकट बदला, लेकिन समीकरण भी बदल गए
राजनीति में चेहरा बदलना आसान होता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी भावनाओं को बदलना नहीं। बीजेपी ने इस बार पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह नए उम्मीदवार पर दांव लगाया। पार्टी का निर्णय संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा रहा होगा, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठने लगा कि क्या स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों की नब्ज सही ढंग से पढ़ी गई थी? राजनीतिक दल अक्सर मान लेते हैं कि कार्यकर्ता हर फैसले को सहज स्वीकार कर लेंगे। लेकिन कई बार सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपने ही संगठन के भीतर पैदा हुई खामोशी होती है।
खामोशी भी राजनीति करती है
इस पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा उस नेता की रही, जो सबसे कम बोले। नरोत्तम मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया और चुनाव प्रचार में भी संगठन के साथ दिखाई दिए। इसके बावजूद नतीजों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या टिकट परिवर्तन का असर कार्यकर्ताओं के उत्साह पर पड़ा? क्या स्थानीय स्तर पर वही ऊर्जा दिखाई दी, जिसकी उम्मीद की जा रही थी? इन सवालों के जवाब बीजेपी के अंदर तलाशे जाएंगे, लेकिन चुनाव परिणाम ने इन्हें राजनीतिक बहस का हिस्सा जरूर बना दिया है।
कांग्रेस भी पूरी तरह सहज नहीं थी
दिलचस्प यह भी है कि कांग्रेस के भीतर भी सब कुछ सामान्य नहीं था। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने अपने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। यानी एक तरफ बीजेपी अपने नए प्रयोग के साथ मैदान में थी, तो दूसरी ओर कांग्रेस अपने अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही थी। इसके बावजूद जनता ने कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि कई बार मतदाता स्थानीय परिस्थितियों को संगठनात्मक विवादों से ज्यादा महत्व देता है।
तीसरे मोर्चे ने भी बदला समीकरण
दतिया उपचुनाव में आज़ाद समाज पार्टी की मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय रंग दिया। पार्टी भले जीत नहीं सकी, लेकिन उसे मिले वोटों ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान जरूर खींचा। भारतीय चुनावों में कई बार तीसरा उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं करता, लेकिन जीत-हार का अंतर तय करने में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दतिया में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिला।
कम मतदान भी छोड़ गया सवाल
इस उपचुनाव में मतदान प्रतिशत पिछली बार की तुलना में कम रहा। कम मतदान का असर किस दल पर पड़ा, इसका विस्तृत विश्लेषण समय के साथ होगा, लेकिन यह तय है कि जब समर्थक मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचते, तो चुनावी गणित बदलने में देर नहीं लगती। कई बार विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत उसकी रैली नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के मतदाता की चुप्पी बन जाती है।
बीजेपी के लिए संदेश, कांग्रेस के लिए भी सीख
दतिया का परिणाम सिर्फ बीजेपी के आत्ममंथन का विषय नहीं है। कांग्रेस के लिए भी यह संदेश है कि चुनाव जीतना और जनाधार को स्थायी बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं। वहीं बीजेपी के लिए यह नतीजा याद दिलाता है कि संगठन जितना मजबूत हो, स्थानीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नजरअंदाज करना हमेशा आसान फैसला नहीं होता।
भारतीय लोकतंत्र की यही ताकत है कि यहां आखिरी फैसला किसी रणनीतिकार, किसी सर्वे या किसी राजनीतिक दावे का नहीं होता। मतदाता जब ईवीएम का बटन दबाता है, तो कई बार वर्षों से बने राजनीतिक समीकरण भी बदल जाते हैं। दतिया उपचुनाव शायद यही कह रहा है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा आत्मविश्वास जनता का होना चाहिए, राजनीतिक दलों का नहीं। क्योंकि चुनावों में जीत का सबसे बड़ा दुश्मन कई बार विपक्ष नहीं, बल्कि अपना ही अति-आत्मविश्वास बन जाता है।
— देवेंद्र पटेल
