भारत चौथे स्थान पर रहा, लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स के करीब 45% कार्यक्रम में एक भी पदक नहीं जीत सका

Saumya Gupta

ग्लासगो में भारत ने 39 पदक जीते, लेकिन तैराकी, ट्रैक साइकिलिंग और आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स में खाली हाथ रहा। खेल एवं युवा कल्याण संचालनालय (DSYW), मध्य प्रदेश से जुड़े वरिष्ठ कोच कैप्टन मनोज झा के अनुसार समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बनाने वाले हाई-परफॉर्मेंस सिस्टम की कमी है।

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का चौथा स्थान सम्मानजनक उपलब्धि है। भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और नौ कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। मुक्केबाजी और जूडो में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए, जबकि एथलेटिक्स, पैरा एथलेटिक्स और भारोत्तोलन ने भी पदक तालिका में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लेकिन इस संतोषजनक प्रदर्शन के पीछे एक ऐसा आंकड़ा छिपा है, जो भारतीय खेल व्यवस्था की एक गंभीर कमजोरी सामने लाता है।

यह आंकड़ा है—96

ग्लासगो में तैराकी और पैरा तैराकी की 56 पदक स्पर्धाएं आयोजित हुईं। ट्रैक और पैरा ट्रैक साइकिलिंग में 26 तथा आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स में 14 पदक स्पर्धाएं थीं।

इन तीनों खेलों को मिलाकर कुल 96 पदक स्पर्धाएं हुईं। यह ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स की कुल 215 पदक स्पर्धाओं का 44.7 प्रतिशत था।

भारत इन तीनों खेलों में एक भी पदक नहीं जीत सका।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने सभी 96 स्पर्धाओं में भाग लिया था। असली चिंता यह है कि भारत उन तीन खेलों में पदक नहीं जीत सका, जिनमें पूरे कॉमनवेल्थ गेम्स कार्यक्रम के लगभग 45 प्रतिशत पदक उपलब्ध थे।

यही वह संरचनात्मक कमजोरी है, जिसे भारत का चौथा स्थान और 39 पदकों की चमक छिपा देती है।

केवल हटाए गए खेलों की कहानी नहीं

भारत के अपेक्षाकृत कम पदकों के लिए कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश और महिला क्रिकेट को ग्लासगो के कार्यक्रम से बाहर रखने को प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

यह तर्क काफी हद तक सही है। बर्मिंघम 2022 में ये भारत के सबसे मजबूत खेलों में शामिल थे और इनकी अनुपस्थिति ने देश की संभावित पदक संख्या को कम किया।

लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।

भारत उन खेलों में पदक नहीं जीत सकता था, जिन्हें प्रतियोगिता में शामिल ही नहीं किया गया था। लेकिन तैराकी, ट्रैक साइकिलिंग और आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स ग्लासगो के मुख्य कार्यक्रम का हिस्सा थे।

इन खेलों में भारत के सामने अवसर मौजूद थे, लेकिन देश के पास पदक जीतने योग्य गहराई और तैयारी नहीं थी।

खेल एवं युवा कल्याण संचालनालय (DSYW), मध्य प्रदेश से जुड़े वरिष्ठ कोच कैप्टन मनोज झा का मानना है कि इस परिणाम को भारत में प्रतिभा की कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार—

“भारत के पास प्रतिभाशाली तैराक हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी एक मजबूत हाई-परफॉर्मेंस स्विमिंग इकोसिस्टम की है। विश्वस्तरीय कोचिंग, खेल विज्ञान, नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव और लंबे समय तक व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं मिलने के कारण भारतीय तैराक पदक की दौड़ में पिछड़ जाते हैं।”

उनकी यह टिप्पणी चर्चा को कुछ खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन से हटाकर उस पूरी व्यवस्था पर ले जाती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के तैराक तैयार करती है।

कुछ दशमलव सेकंड के पीछे वर्षों की तैयारी

तैराकी के नतीजे देखने पर कई बार लगता है कि भारतीय खिलाड़ी पदक के बेहद करीब थे। किसी तैराक का समय फाइनल से कुछ दशमलव सेकंड या पदक विजेता से एक सेकंड से भी कम पीछे हो सकता है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय तैराकी में यही छोटा अंतर निर्णायक होता है।

मनोज झा के अनुसार—

“तैराकी में कुछ दशमलव सेकंड भी फाइनल और पदक के बीच का अंतर बन जाते हैं। इस अंतर को कम करने के लिए बेहतर रेस तैयारी, खेल विज्ञान और नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की जरूरत होती है।”

यह अंतर स्टार्ट, टर्न, पानी के भीतर की तकनीक, स्ट्रोक की दक्षता, अंतिम 25 मीटर में गति बनाए रखने और दबाव में सही रेस रणनीति से बनता है।

इन कमजोरियों को किसी बड़े टूर्नामेंट से पहले लगाए गए कुछ सप्ताह के राष्ट्रीय शिविर से दूर नहीं किया जा सकता।

इसके लिए पूरे वर्ष तकनीकी निगरानी, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, पोषण, रिकवरी, बायोमैकेनिक्स, मनोवैज्ञानिक तैयारी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा आवश्यक होती है।

झा के अनुसार, फिलहाल भारत में केवल कुछ ही ऐसे तैराक हैं, जिनके समय कॉमनवेल्थ पदक मानकों के करीब हैं।

भारत के पास ऐसे तैराकों का बड़ा समूह नहीं है, जो लगातार अंतरराष्ट्रीय मानक समय हासिल कर सके। यही कमी व्यक्तिगत और रिले दोनों स्पर्धाओं को प्रभावित करती है।

ऑस्ट्रेलिया कई पदक जीतने वाले तैराक कैसे तैयार करता है?

ऑस्ट्रेलिया ने ग्लासगो में दिखाया कि किसी एक पदक-सघन खेल में मजबूत होना पूरी पदक तालिका को कैसे बदल सकता है।

ऑस्ट्रेलियाई तैराकों और पैरा तैराकों ने उपलब्ध 56 स्वर्ण पदकों में से 37 जीते। केवल तैराकी में ऑस्ट्रेलिया के स्वर्ण पदक भारत के सभी खेलों में जीते गए 13 स्वर्ण पदकों से लगभग तीन गुना थे।

यह अंतर केवल बेहतर व्यक्तिगत खिलाड़ियों के कारण नहीं था।

एक मुक्केबाज, भारोत्तोलक या जूडो खिलाड़ी सामान्यतः एक ही पदक के लिए प्रतिस्पर्धा करता है। इसके विपरीत, एक विश्वस्तरीय तैराक कई व्यक्तिगत दूरी, अलग-अलग स्ट्रोक और रिले स्पर्धाओं में उतर सकता है।

एक ही तैराक किसी देश की पदक तालिका को कई बार प्रभावित कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया ऐसे ‘मेडल मल्टीप्लायर’ खिलाड़ी तैयार करता है। भारतीय व्यवस्था अभी भी अधिकतर ऐसे खिलाड़ियों पर निर्भर है, जिनके पास एक ही वास्तविक पदक अवसर होता है।

मनोज झा के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देशों में खिलाड़ियों को एक से अधिक स्पर्धाओं के लिए तैयार किया जाता है, क्योंकि उनका विकास तंत्र बचपन से शुरू होता है।

उन्होंने कहा—

“उनके तैराकों को कई स्पर्धाओं के लिए तैयार किया जाता है। भारत में यह व्यवस्था अभी विकसित हो रही है, इसलिए हमारे तैराक सीमित स्पर्धाओं तक ही प्रतिस्पर्धी रह पाते हैं।”

भारत के पास मजबूत रिले टीमें तैयार करने के लिए भी पर्याप्त गहराई नहीं है।

किसी रिले स्पर्धा में सफलता के लिए कम से कम चार अंतरराष्ट्रीय स्तर के तैराकों की आवश्यकता होती है। एक या दो उत्कृष्ट खिलाड़ियों के बावजूद टीम पोडियम से दूर रह सकती है, यदि बाकी तैराकों के समय कमजोर हों।

झा ने कहा—

“जब तक भारत अलग-अलग स्ट्रोक, दूरी और रिले के लिए बड़ी संख्या में उच्चस्तरीय तैराक तैयार नहीं करेगा, तब तक कई पदकों की संभावना सीमित रहेगी।”

क्या भारत गलत लक्ष्य के लिए तैराक तैयार कर रहा है?

मनोज झा ने भारतीय तैराकी में आयु-वर्ग की घरेलू प्रतियोगिताओं पर अत्यधिक ध्यान दिए जाने का भी मुद्दा उठाया।

भारत में तैराकों और कोचों का मूल्यांकन प्रायः राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के पदकों के आधार पर होता है। घरेलू स्तर पर पदक जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय चैंपियन बन जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने की गारंटी नहीं है।

उन्होंने कहा—

“कई मामलों में ध्यान अंतरराष्ट्रीय मानक समय हासिल करने की बजाय घरेलू आयु-वर्ग प्रतियोगिताएं जीतने पर रहता है।”

यह व्यवस्था खिलाड़ियों और कोचों को दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय विकास की जगह अल्पकालिक घरेलू सफलता की ओर धकेल सकती है।

एक बेहतर मॉडल में खिलाड़ियों का मूल्यांकन केवल भारत में उनकी रैंकिंग से नहीं, बल्कि एशियाई, कॉमनवेल्थ और विश्व स्तर के आयु-वर्ग मानकों से किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय चैंपियन के समय की तुलना यह देखने के लिए होनी चाहिए कि वह उसी आयु के एशियाई या कॉमनवेल्थ फाइनलिस्ट से कितना पीछे है।

भारतीय खिलाड़ी व्यवस्थित प्रशिक्षण देर से शुरू करते हैं

मनोज झा के अनुसार, बच्चों को चार से छह वर्ष की उम्र के बीच तैराकी सीखना शुरू कर देना चाहिए। इस उम्र में पानी के प्रति आत्मविश्वास और सही तकनीकी आधार विकसित किया जा सकता है।

लगभग 13 वर्ष की उम्र से प्रतिभाशाली तैराकों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, खेल विज्ञान और लंबी अवधि के हाई-परफॉर्मेंस कार्यक्रम से जोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा—

“कई मामलों में भारतीय खिलाड़ी अपने अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में व्यवस्थित प्रशिक्षण देर से शुरू करते हैं।”

तैराकी और जिम्नास्टिक्स जैसे खेलों में शुरुआती तकनीकी विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में जब तक कई बच्चों को नियमित कोचिंग मिलनी शुरू होती है, तब तक अग्रणी देशों के खिलाड़ी कई वर्षों की तकनीकी ट्रेनिंग और क्लब प्रतियोगिताओं का अनुभव हासिल कर चुके होते हैं।

मध्य प्रदेश में पूल और खिलाड़ी का असंतुलन

भारतीय तैराकी की राष्ट्रीय कमजोरी का सीधा संबंध मध्य प्रदेश से भी है।

मनोज झा के अनुसार, राज्य में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन बेहतर कोचिंग, नियमित प्रतियोगिता, खेल विज्ञान और पूरे वर्ष उपलब्ध उच्चस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाओं की जरूरत है।

समस्या हमेशा सुविधाओं के पूरी तरह अभाव की नहीं है। कई बार उपलब्ध सुविधाओं, खिलाड़ियों और कोचिंग के बीच तालमेल नहीं बन पाता।

उन्होंने कहा—

“कई स्थानों पर अच्छे स्विमिंग पूल हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धी तैराक नहीं हैं। दूसरी जगह प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं, लेकिन उनके पास उचित सुविधाएं नहीं हैं। इसलिए कहा जाता है—‘नो पूल, नो प्लेयर।’”

लेकिन केवल एक पूल बना देना हाई-परफॉर्मेंस सेंटर तैयार करना नहीं है।

इसके लिए योग्य कोच, खिलाड़ियों के लिए नियमित और निर्बाध प्रशिक्षण समय, जिम और स्ट्रेंथ प्रशिक्षण, वीडियो विश्लेषण, फिजियोथेरेपी, पोषण, नियमित प्रतियोगिताएं और शुरुआती से एलीट स्तर तक स्पष्ट विकास मार्ग आवश्यक है।

कई मौजूदा सुविधाएं इसलिए भी प्रभावी नहीं बन पातीं क्योंकि सार्वजनिक उपयोग, व्यावसायिक गतिविधियों और प्रतिस्पर्धी प्रशिक्षण के बीच सही समय निर्धारण नहीं किया जाता।

यदि भोपाल के प्रकाश तरण पुष्कर को हाई-परफॉर्मेंस तैराकी केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है, तो उसकी सफलता का मूल्यांकन केवल निर्माण और उपकरणों से नहीं, बल्कि कोचिंग, वैज्ञानिक निगरानी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के परिणामों से करना होगा।

मनोज झा का मानना है कि सही योजना और तत्काल काम शुरू होने की स्थिति में भोपाल का यह केंद्र 2030 तक कॉमनवेल्थ स्तर के तैराक तैयार करने में योगदान दे सकता है।

उन्होंने चार आवश्यकताएं बताईं—

  • विश्वस्तरीय कोचिंग।
  • वैज्ञानिक खिलाड़ी निगरानी।
  • नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता।
  • चार वर्षों का स्पष्ट और संरचित विकास कार्यक्रम।

अहमदाबाद 2030 के लिए मापने योग्य लक्ष्य

भारत 2030 में अहमदाबाद कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करेगा। तैराकी और पैरा तैराकी मुख्य खेल कार्यक्रम का हिस्सा रहेंगी। इसलिए भारत ग्लासगो में सामने आई कमजोरी को खेल कार्यक्रम बदलकर नहीं छिपा सकता।

मनोज झा के अनुसार पहला लक्ष्य यह होना चाहिए कि अधिक भारतीय तैराक लगातार अंतरराष्ट्रीय क्वालिफाइंग समय हासिल करें और बड़े आयोजनों के फाइनल तक पहुंचें।

दूसरा लक्ष्य अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए।

भारत को 2030 तक तीन से चार वास्तविक कॉमनवेल्थ पदक दावेदार तैराक तैयार करने चाहिए।

इस लक्ष्य के लिए हर वर्ष के स्पष्ट मानक तय किए जा सकते हैं—

  • कितने भारतीय तैराक कॉमनवेल्थ फाइनल के समय से एक प्रतिशत के भीतर हैं?
  • कितने खिलाड़ी पदक जीतने योग्य समय के करीब हैं?
  • शीर्ष तैराक साल में कितनी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले रहे हैं?
  • कितनी रिले टीमें विकसित की जा रही हैं?
  • कितने खिलाड़ियों को पूर्णकालिक खेल विज्ञान सहायता मिल रही है?
  • कितने जूनियर तैराक सफलतापूर्वक सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं?

ऐसे मापने योग्य लक्ष्य नहीं होंगे तो हाई-परफॉर्मेंस सेंटर और अकादमियों की घोषणाओं का वास्तविक परिणाम जांचना कठिन होगा।

भारत को कभी-कभार मिलने वाले चैंपियन नहीं, पदक पैदा करने वाली व्यवस्था चाहिए

भारत के 39 पदकों का सम्मान और उत्सव होना चाहिए। भारतीय मुक्केबाजों, जूडो खिलाड़ियों, एथलीटों, भारोत्तोलकों और पैरा खिलाड़ियों ने सीमित खेल कार्यक्रम के बावजूद प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

भारत का चौथा स्थान असफलता नहीं था।

लेकिन तैराकी, साइकिलिंग और जिम्नास्टिक्स में शून्य पदक को सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ये ऐसे खेल हैं, जिनमें एक खिलाड़ी कई पदक और एक मजबूत राष्ट्रीय व्यवस्था दर्जनों पदक जीत सकती है। यही खेल ओलंपिक कार्यक्रम में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

अहमदाबाद 2030 में कुश्ती, बैडमिंटन, शूटिंग और टेबल टेनिस जैसे भारत के मजबूत खेल वापस आते हैं तो देश का पदक आंकड़ा तेजी से बढ़ सकता है।

लेकिन इससे ग्लासगो में सामने आई मूल समस्या समाप्त नहीं होगी।

2030 में भारत की असली परीक्षा केवल यह नहीं होगी कि वह 39 से अधिक पदक जीतता है या नहीं।

असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारत पूल में फाइनलिस्ट, मजबूत रिले टीमें और एक ही आयोजन में कई पदक जीतने वाले तैराक तैयार कर पाया है।

मनोज झा के आकलन से एक बात स्पष्ट है—

भारत के पास संभावित तैराकों की कमी नहीं है।

कमी उस पूरी व्यवस्था की है, जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बना सके।

-----------------

हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनलhttps://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुकDainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम@dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूबDainik Jagran MPCG Digital

📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए

www.dainikjagranmpcg.com
04 Aug 2026 By दैनिक जागरण

भारत चौथे स्थान पर रहा, लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स के करीब 45% कार्यक्रम में एक भी पदक नहीं जीत सका

Saumya Gupta

ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का चौथा स्थान सम्मानजनक उपलब्धि है। भारतीय दल ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और नौ कांस्य सहित कुल 39 पदक जीते। मुक्केबाजी और जूडो में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए, जबकि एथलेटिक्स, पैरा एथलेटिक्स और भारोत्तोलन ने भी पदक तालिका में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

लेकिन इस संतोषजनक प्रदर्शन के पीछे एक ऐसा आंकड़ा छिपा है, जो भारतीय खेल व्यवस्था की एक गंभीर कमजोरी सामने लाता है।

यह आंकड़ा है—96

ग्लासगो में तैराकी और पैरा तैराकी की 56 पदक स्पर्धाएं आयोजित हुईं। ट्रैक और पैरा ट्रैक साइकिलिंग में 26 तथा आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स में 14 पदक स्पर्धाएं थीं।

इन तीनों खेलों को मिलाकर कुल 96 पदक स्पर्धाएं हुईं। यह ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स की कुल 215 पदक स्पर्धाओं का 44.7 प्रतिशत था।

भारत इन तीनों खेलों में एक भी पदक नहीं जीत सका।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत ने सभी 96 स्पर्धाओं में भाग लिया था। असली चिंता यह है कि भारत उन तीन खेलों में पदक नहीं जीत सका, जिनमें पूरे कॉमनवेल्थ गेम्स कार्यक्रम के लगभग 45 प्रतिशत पदक उपलब्ध थे।

यही वह संरचनात्मक कमजोरी है, जिसे भारत का चौथा स्थान और 39 पदकों की चमक छिपा देती है।

केवल हटाए गए खेलों की कहानी नहीं

भारत के अपेक्षाकृत कम पदकों के लिए कुश्ती, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हॉकी, स्क्वैश और महिला क्रिकेट को ग्लासगो के कार्यक्रम से बाहर रखने को प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

यह तर्क काफी हद तक सही है। बर्मिंघम 2022 में ये भारत के सबसे मजबूत खेलों में शामिल थे और इनकी अनुपस्थिति ने देश की संभावित पदक संख्या को कम किया।

लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है।

भारत उन खेलों में पदक नहीं जीत सकता था, जिन्हें प्रतियोगिता में शामिल ही नहीं किया गया था। लेकिन तैराकी, ट्रैक साइकिलिंग और आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स ग्लासगो के मुख्य कार्यक्रम का हिस्सा थे।

इन खेलों में भारत के सामने अवसर मौजूद थे, लेकिन देश के पास पदक जीतने योग्य गहराई और तैयारी नहीं थी।

खेल एवं युवा कल्याण संचालनालय (DSYW), मध्य प्रदेश से जुड़े वरिष्ठ कोच कैप्टन मनोज झा का मानना है कि इस परिणाम को भारत में प्रतिभा की कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार—

“भारत के पास प्रतिभाशाली तैराक हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी एक मजबूत हाई-परफॉर्मेंस स्विमिंग इकोसिस्टम की है। विश्वस्तरीय कोचिंग, खेल विज्ञान, नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं का अनुभव और लंबे समय तक व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं मिलने के कारण भारतीय तैराक पदक की दौड़ में पिछड़ जाते हैं।”

उनकी यह टिप्पणी चर्चा को कुछ खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन से हटाकर उस पूरी व्यवस्था पर ले जाती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के तैराक तैयार करती है।

कुछ दशमलव सेकंड के पीछे वर्षों की तैयारी

तैराकी के नतीजे देखने पर कई बार लगता है कि भारतीय खिलाड़ी पदक के बेहद करीब थे। किसी तैराक का समय फाइनल से कुछ दशमलव सेकंड या पदक विजेता से एक सेकंड से भी कम पीछे हो सकता है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय तैराकी में यही छोटा अंतर निर्णायक होता है।

मनोज झा के अनुसार—

“तैराकी में कुछ दशमलव सेकंड भी फाइनल और पदक के बीच का अंतर बन जाते हैं। इस अंतर को कम करने के लिए बेहतर रेस तैयारी, खेल विज्ञान और नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की जरूरत होती है।”

यह अंतर स्टार्ट, टर्न, पानी के भीतर की तकनीक, स्ट्रोक की दक्षता, अंतिम 25 मीटर में गति बनाए रखने और दबाव में सही रेस रणनीति से बनता है।

इन कमजोरियों को किसी बड़े टूर्नामेंट से पहले लगाए गए कुछ सप्ताह के राष्ट्रीय शिविर से दूर नहीं किया जा सकता।

इसके लिए पूरे वर्ष तकनीकी निगरानी, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, पोषण, रिकवरी, बायोमैकेनिक्स, मनोवैज्ञानिक तैयारी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा आवश्यक होती है।

झा के अनुसार, फिलहाल भारत में केवल कुछ ही ऐसे तैराक हैं, जिनके समय कॉमनवेल्थ पदक मानकों के करीब हैं।

भारत के पास ऐसे तैराकों का बड़ा समूह नहीं है, जो लगातार अंतरराष्ट्रीय मानक समय हासिल कर सके। यही कमी व्यक्तिगत और रिले दोनों स्पर्धाओं को प्रभावित करती है।

ऑस्ट्रेलिया कई पदक जीतने वाले तैराक कैसे तैयार करता है?

ऑस्ट्रेलिया ने ग्लासगो में दिखाया कि किसी एक पदक-सघन खेल में मजबूत होना पूरी पदक तालिका को कैसे बदल सकता है।

ऑस्ट्रेलियाई तैराकों और पैरा तैराकों ने उपलब्ध 56 स्वर्ण पदकों में से 37 जीते। केवल तैराकी में ऑस्ट्रेलिया के स्वर्ण पदक भारत के सभी खेलों में जीते गए 13 स्वर्ण पदकों से लगभग तीन गुना थे।

यह अंतर केवल बेहतर व्यक्तिगत खिलाड़ियों के कारण नहीं था।

एक मुक्केबाज, भारोत्तोलक या जूडो खिलाड़ी सामान्यतः एक ही पदक के लिए प्रतिस्पर्धा करता है। इसके विपरीत, एक विश्वस्तरीय तैराक कई व्यक्तिगत दूरी, अलग-अलग स्ट्रोक और रिले स्पर्धाओं में उतर सकता है।

एक ही तैराक किसी देश की पदक तालिका को कई बार प्रभावित कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया ऐसे ‘मेडल मल्टीप्लायर’ खिलाड़ी तैयार करता है। भारतीय व्यवस्था अभी भी अधिकतर ऐसे खिलाड़ियों पर निर्भर है, जिनके पास एक ही वास्तविक पदक अवसर होता है।

मनोज झा के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे देशों में खिलाड़ियों को एक से अधिक स्पर्धाओं के लिए तैयार किया जाता है, क्योंकि उनका विकास तंत्र बचपन से शुरू होता है।

उन्होंने कहा—

“उनके तैराकों को कई स्पर्धाओं के लिए तैयार किया जाता है। भारत में यह व्यवस्था अभी विकसित हो रही है, इसलिए हमारे तैराक सीमित स्पर्धाओं तक ही प्रतिस्पर्धी रह पाते हैं।”

भारत के पास मजबूत रिले टीमें तैयार करने के लिए भी पर्याप्त गहराई नहीं है।

किसी रिले स्पर्धा में सफलता के लिए कम से कम चार अंतरराष्ट्रीय स्तर के तैराकों की आवश्यकता होती है। एक या दो उत्कृष्ट खिलाड़ियों के बावजूद टीम पोडियम से दूर रह सकती है, यदि बाकी तैराकों के समय कमजोर हों।

झा ने कहा—

“जब तक भारत अलग-अलग स्ट्रोक, दूरी और रिले के लिए बड़ी संख्या में उच्चस्तरीय तैराक तैयार नहीं करेगा, तब तक कई पदकों की संभावना सीमित रहेगी।”

क्या भारत गलत लक्ष्य के लिए तैराक तैयार कर रहा है?

मनोज झा ने भारतीय तैराकी में आयु-वर्ग की घरेलू प्रतियोगिताओं पर अत्यधिक ध्यान दिए जाने का भी मुद्दा उठाया।

भारत में तैराकों और कोचों का मूल्यांकन प्रायः राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के पदकों के आधार पर होता है। घरेलू स्तर पर पदक जीतना महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय चैंपियन बन जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने की गारंटी नहीं है।

उन्होंने कहा—

“कई मामलों में ध्यान अंतरराष्ट्रीय मानक समय हासिल करने की बजाय घरेलू आयु-वर्ग प्रतियोगिताएं जीतने पर रहता है।”

यह व्यवस्था खिलाड़ियों और कोचों को दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय विकास की जगह अल्पकालिक घरेलू सफलता की ओर धकेल सकती है।

एक बेहतर मॉडल में खिलाड़ियों का मूल्यांकन केवल भारत में उनकी रैंकिंग से नहीं, बल्कि एशियाई, कॉमनवेल्थ और विश्व स्तर के आयु-वर्ग मानकों से किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय चैंपियन के समय की तुलना यह देखने के लिए होनी चाहिए कि वह उसी आयु के एशियाई या कॉमनवेल्थ फाइनलिस्ट से कितना पीछे है।

भारतीय खिलाड़ी व्यवस्थित प्रशिक्षण देर से शुरू करते हैं

मनोज झा के अनुसार, बच्चों को चार से छह वर्ष की उम्र के बीच तैराकी सीखना शुरू कर देना चाहिए। इस उम्र में पानी के प्रति आत्मविश्वास और सही तकनीकी आधार विकसित किया जा सकता है।

लगभग 13 वर्ष की उम्र से प्रतिभाशाली तैराकों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग, खेल विज्ञान और लंबी अवधि के हाई-परफॉर्मेंस कार्यक्रम से जोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा—

“कई मामलों में भारतीय खिलाड़ी अपने अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में व्यवस्थित प्रशिक्षण देर से शुरू करते हैं।”

तैराकी और जिम्नास्टिक्स जैसे खेलों में शुरुआती तकनीकी विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में जब तक कई बच्चों को नियमित कोचिंग मिलनी शुरू होती है, तब तक अग्रणी देशों के खिलाड़ी कई वर्षों की तकनीकी ट्रेनिंग और क्लब प्रतियोगिताओं का अनुभव हासिल कर चुके होते हैं।

मध्य प्रदेश में पूल और खिलाड़ी का असंतुलन

भारतीय तैराकी की राष्ट्रीय कमजोरी का सीधा संबंध मध्य प्रदेश से भी है।

मनोज झा के अनुसार, राज्य में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन बेहतर कोचिंग, नियमित प्रतियोगिता, खेल विज्ञान और पूरे वर्ष उपलब्ध उच्चस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाओं की जरूरत है।

समस्या हमेशा सुविधाओं के पूरी तरह अभाव की नहीं है। कई बार उपलब्ध सुविधाओं, खिलाड़ियों और कोचिंग के बीच तालमेल नहीं बन पाता।

उन्होंने कहा—

“कई स्थानों पर अच्छे स्विमिंग पूल हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धी तैराक नहीं हैं। दूसरी जगह प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं, लेकिन उनके पास उचित सुविधाएं नहीं हैं। इसलिए कहा जाता है—‘नो पूल, नो प्लेयर।’”

लेकिन केवल एक पूल बना देना हाई-परफॉर्मेंस सेंटर तैयार करना नहीं है।

इसके लिए योग्य कोच, खिलाड़ियों के लिए नियमित और निर्बाध प्रशिक्षण समय, जिम और स्ट्रेंथ प्रशिक्षण, वीडियो विश्लेषण, फिजियोथेरेपी, पोषण, नियमित प्रतियोगिताएं और शुरुआती से एलीट स्तर तक स्पष्ट विकास मार्ग आवश्यक है।

कई मौजूदा सुविधाएं इसलिए भी प्रभावी नहीं बन पातीं क्योंकि सार्वजनिक उपयोग, व्यावसायिक गतिविधियों और प्रतिस्पर्धी प्रशिक्षण के बीच सही समय निर्धारण नहीं किया जाता।

यदि भोपाल के प्रकाश तरण पुष्कर को हाई-परफॉर्मेंस तैराकी केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है, तो उसकी सफलता का मूल्यांकन केवल निर्माण और उपकरणों से नहीं, बल्कि कोचिंग, वैज्ञानिक निगरानी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के परिणामों से करना होगा।

मनोज झा का मानना है कि सही योजना और तत्काल काम शुरू होने की स्थिति में भोपाल का यह केंद्र 2030 तक कॉमनवेल्थ स्तर के तैराक तैयार करने में योगदान दे सकता है।

उन्होंने चार आवश्यकताएं बताईं—

  • विश्वस्तरीय कोचिंग।
  • वैज्ञानिक खिलाड़ी निगरानी।
  • नियमित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता।
  • चार वर्षों का स्पष्ट और संरचित विकास कार्यक्रम।

अहमदाबाद 2030 के लिए मापने योग्य लक्ष्य

भारत 2030 में अहमदाबाद कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करेगा। तैराकी और पैरा तैराकी मुख्य खेल कार्यक्रम का हिस्सा रहेंगी। इसलिए भारत ग्लासगो में सामने आई कमजोरी को खेल कार्यक्रम बदलकर नहीं छिपा सकता।

मनोज झा के अनुसार पहला लक्ष्य यह होना चाहिए कि अधिक भारतीय तैराक लगातार अंतरराष्ट्रीय क्वालिफाइंग समय हासिल करें और बड़े आयोजनों के फाइनल तक पहुंचें।

दूसरा लक्ष्य अधिक महत्वाकांक्षी होना चाहिए।

भारत को 2030 तक तीन से चार वास्तविक कॉमनवेल्थ पदक दावेदार तैराक तैयार करने चाहिए।

इस लक्ष्य के लिए हर वर्ष के स्पष्ट मानक तय किए जा सकते हैं—

  • कितने भारतीय तैराक कॉमनवेल्थ फाइनल के समय से एक प्रतिशत के भीतर हैं?
  • कितने खिलाड़ी पदक जीतने योग्य समय के करीब हैं?
  • शीर्ष तैराक साल में कितनी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले रहे हैं?
  • कितनी रिले टीमें विकसित की जा रही हैं?
  • कितने खिलाड़ियों को पूर्णकालिक खेल विज्ञान सहायता मिल रही है?
  • कितने जूनियर तैराक सफलतापूर्वक सीनियर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच रहे हैं?

ऐसे मापने योग्य लक्ष्य नहीं होंगे तो हाई-परफॉर्मेंस सेंटर और अकादमियों की घोषणाओं का वास्तविक परिणाम जांचना कठिन होगा।

भारत को कभी-कभार मिलने वाले चैंपियन नहीं, पदक पैदा करने वाली व्यवस्था चाहिए

भारत के 39 पदकों का सम्मान और उत्सव होना चाहिए। भारतीय मुक्केबाजों, जूडो खिलाड़ियों, एथलीटों, भारोत्तोलकों और पैरा खिलाड़ियों ने सीमित खेल कार्यक्रम के बावजूद प्रभावशाली प्रदर्शन किया।

भारत का चौथा स्थान असफलता नहीं था।

लेकिन तैराकी, साइकिलिंग और जिम्नास्टिक्स में शून्य पदक को सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ये ऐसे खेल हैं, जिनमें एक खिलाड़ी कई पदक और एक मजबूत राष्ट्रीय व्यवस्था दर्जनों पदक जीत सकती है। यही खेल ओलंपिक कार्यक्रम में भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

अहमदाबाद 2030 में कुश्ती, बैडमिंटन, शूटिंग और टेबल टेनिस जैसे भारत के मजबूत खेल वापस आते हैं तो देश का पदक आंकड़ा तेजी से बढ़ सकता है।

लेकिन इससे ग्लासगो में सामने आई मूल समस्या समाप्त नहीं होगी।

2030 में भारत की असली परीक्षा केवल यह नहीं होगी कि वह 39 से अधिक पदक जीतता है या नहीं।

असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारत पूल में फाइनलिस्ट, मजबूत रिले टीमें और एक ही आयोजन में कई पदक जीतने वाले तैराक तैयार कर पाया है।

मनोज झा के आकलन से एक बात स्पष्ट है—

भारत के पास संभावित तैराकों की कमी नहीं है।

कमी उस पूरी व्यवस्था की है, जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बना सके।

https://www.dainikjagranmpcg.com/sports/india-finished-fourth-but-could-not-win-a-single-medal/article-60718

खबरें और भी हैं

दोस्ती के जश्न में सजा स्वाद का खास संगम, हयात प्लेस भोपाल में मना 'द फ्रेंडशिप फीस्ट'

टाप न्यूज

दोस्ती के जश्न में सजा स्वाद का खास संगम, हयात प्लेस भोपाल में मना 'द फ्रेंडशिप फीस्ट'

हयात प्लेस भोपाल ने फ्रेंडशिप डे के मौके पर 'द फ्रेंडशिप फीस्ट' ब्रंच का आयोजन कर शहरवासियों के दिन को...
देश विदेश 
दोस्ती के जश्न में सजा स्वाद का खास संगम, हयात प्लेस भोपाल में मना 'द फ्रेंडशिप फीस्ट'

'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का जीवन मंत्र: कर्म पर रखें विश्वास, फल की चिंता छोड़ें

भगवान श्रीकृष्ण के इस अमर उपदेश में छिपा है सफलता, शांति और आत्मविश्वास का रहस्य, जो हर परिस्थिति में जीवन...
जीवन के मंत्र 
'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का जीवन मंत्र: कर्म पर रखें विश्वास, फल की चिंता छोड़ें

'700 रुपए के मोमोज' से नहीं, अपनी क्यूटनेस से इंटरनेट पर छा गई नन्हीं अद्विका

पहाड़ों में शॉल ओढ़े बैठी बच्ची की क्यूट बातचीत ने सोशल मीडिया पर मचाई धूम, 2 करोड़ से ज्यादा व्यूज...
स्पेशल खबरें 
'700 रुपए के मोमोज' से नहीं, अपनी क्यूटनेस से इंटरनेट पर छा गई नन्हीं अद्विका

दतिया में बीजेपी का ओवरकॉन्फिडेंस... और जनता का एक फैसला जिसने पूरा चुनावी गणित बदल दिया

उपचुनाव के नतीजे सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि सत्ता, संगठन और रणनीति के लिए एक राजनीतिक संदेश भी...
ओपीनियन 
दतिया में बीजेपी का ओवरकॉन्फिडेंस... और जनता का एक फैसला जिसने पूरा चुनावी गणित बदल दिया

बिजनेस

एक्सपोनेंशियल रियल एस्टेट वर्ल्ड की 9वीं फिजिकल मीट सफलतापूर्वक संपन्न: सस्टेनेबल डिज़ाइन, सहयोग और नई पीढ़ी के नवोन्मेषकों पर रहा मुख्य ज़ोर एक्सपोनेंशियल रियल एस्टेट वर्ल्ड की 9वीं फिजिकल मीट सफलतापूर्वक संपन्न: सस्टेनेबल डिज़ाइन, सहयोग और नई पीढ़ी के नवोन्मेषकों पर रहा मुख्य ज़ोर
  भारत के रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम के शीर्ष पेशेवरों को एकजुट करने वाले प्रमुख नेटवर्किंग और नॉलेज प्लेटफॉर्म,
FSSAI की बड़ी कार्रवाई: डाबर के ‘100%’ दावे वाले शहद-घी समेत कई प्रोडक्ट्स की बिक्री पर रोक
WhatsApp ने हजारों यूजर्स के अकाउंट किए रिव्यू में, 24 घंटे तक चैट और कॉलिंग सेवाएं बंद
F&O ट्रेडिंग का समय बढ़ा, आज से शेयर बाजार में लागू हुए नए क्लोजिंग ऑक्शन नियम
शेयर बाजार में जोरदार उछाल, सेंसेक्स 800 अंक चढ़ा; निफ्टी 24,576 के पार पहुंचा
Copyright (c) Dainik Jagran All Rights Reserved.