लैंगिक समानता की बदलती तस्वीर: उपलब्धियां, चुनौतियां और आगे का रास्ता

Ankita Suman

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शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सोच में बदलाव के बावजूद असमानता के नए रूप उभर रहे हैं

समाज में लैंगिक समानता यानी महिलाओं और पुरुषों को बराबर अवसर देने की सोच पहले से ज्यादा मजबूत हुई है। पढ़ाई, नौकरी और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सोच में धीरे-धीरे हुए परिवर्तन का नतीजा है। फिर भी पूरी बराबरी का लक्ष्य अभी दूर है।

सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में दिखता है। स्कूल और कॉलेजों में लड़कियों की संख्या बढ़ी है और वे कई परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। पहले जिन पेशों को केवल पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, अब वहां भी महिलाएं आगे आ रही हैं। इंजीनियरिंग, प्रशासन, खेल और व्यापार जैसे क्षेत्रों में उनकी भागीदारी समाज की बदलती सोच को दिखाती है।

रोजगार के क्षेत्र में स्थिति थोड़ी जटिल है। शहरों में महिलाओं को नौकरी और व्यवसाय के ज्यादा अवसर मिल रहे हैं, लेकिन कार्यस्थल पर वेतन में अंतर और पदोन्नति की सीमित संभावनाएं अब भी समस्या हैं। घर और काम की दोहरी जिम्मेदारी भी महिलाओं पर अधिक रहती है। लचीले काम के विकल्प बढ़े हैं, लेकिन इससे घरेलू जिम्मेदारियां कम नहीं हुईं।

सामाजिक सोच में बदलाव हो रहा है, लेकिन गति धीमी है। कुछ परिवारों में पुरुष घरेलू कामों में भागीदारी कर रहे हैं और बच्चों की देखभाल साझा जिम्मेदारी बन रही है। इसके बावजूद कई जगह पारंपरिक धारणाएं अभी भी मजबूत हैं। डिजिटल दुनिया में महिलाओं को ट्रोलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। यह दिखाता है कि समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी तय होती है।

सरकारी योजनाओं और सामाजिक पहलों ने महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसर देने की दिशा में मदद की है। बैंक खाते, कौशल प्रशिक्षण और सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रमों ने कई महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों और वंचित वर्गों तक इन योजनाओं का पूरा लाभ पहुंचाना अभी भी चुनौती बना हुआ है।

आगे बढ़ने के लिए समाज को मिलकर काम करना होगा। परिवार, स्कूल और कार्यस्थल—तीनों स्तरों पर बराबरी की सोच को व्यवहार में लाना जरूरी है। लड़कों और पुरुषों की भागीदारी के बिना यह बदलाव अधूरा रहेगा। सुरक्षित माहौल, समान वेतन और शिक्षा तक समान पहुंच जैसे कदम लैंगिक समानता को मजबूत करेंगे।

लैंगिक समानता की तस्वीर आज पहले से बेहतर जरूर है, लेकिन इसे स्थायी और व्यापक बनाने के लिए लगातार प्रयास जरूरी हैं। बराबरी केवल अधिकार का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बेहतर और न्यायपूर्ण समाज की पहचान है।

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