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विदेश में पढ़ाई का बढ़ता ट्रेंड: अवसर, आकर्षण और वास्तविकताएँ
Ankita Suman
बेहतर शिक्षा, वैश्विक अवसर और करियर की उम्मीदों के बीच बढ़ता आकर्षण—लेकिन लागत, ब्रेन ड्रेन और सामाजिक दबाव जैसे सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण
पिछले एक दशक में भारतीय छात्रों के बीच विदेश में पढ़ाई का रुझान तेजी से बढ़ा है। इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, डेटा साइंस, हेल्थकेयर और आर्ट्स जैसे क्षेत्रों में हर साल लाखों छात्र अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। यह केवल बेहतर डिग्री हासिल करने की इच्छा भर नहीं है, बल्कि वैश्विक exposure, करियर संभावनाओं और जीवनशैली के आकर्षण का सम्मिलित परिणाम है।
इस प्रवृत्ति के पीछे सबसे बड़ा कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रिसर्च के अवसर माने जाते हैं। विकसित देशों के विश्वविद्यालयों में आधुनिक प्रयोगशालाएँ, उद्योग से जुड़ा पाठ्यक्रम और व्यावहारिक प्रशिक्षण की मजबूत व्यवस्था छात्रों को प्रतिस्पर्धी बनाती है। साथ ही, बहुसांस्कृतिक वातावरण में पढ़ाई करने से सोच का दायरा व्यापक होता है और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित होता है। कई छात्रों के लिए यह अनुभव केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विकास की यात्रा भी होता है।
हालाँकि, इस ट्रेंड का दूसरा पहलू भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। विदेश में पढ़ाई का खर्च अधिकांश परिवारों के लिए बहुत बड़ा निवेश है। ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, स्वास्थ्य बीमा और मुद्रा विनिमय दरों का दबाव कई बार छात्रों को आर्थिक तनाव में डाल देता है। शिक्षा ऋण का बोझ भी एक वास्तविकता है, जिसे करियर की शुरुआती अवस्था में चुकाना आसान नहीं होता।
इसके अलावा, “ब्रेन ड्रेन” की बहस भी समय-समय पर सामने आती है। जब बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र विदेश में बस जाते हैं, तो देश को उनके कौशल और नवाचार का लाभ सीमित रूप से ही मिल पाता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इसे “ब्रेन गेन” भी मानते हैं, क्योंकि वैश्विक अनुभव हासिल करने वाले कई पेशेवर बाद में देश लौटकर ज्ञान और नेटवर्क के साथ योगदान देते हैं।
सामाजिक स्तर पर भी यह प्रवृत्ति नई मानसिकता को जन्म दे रही है। विदेश में पढ़ाई अब केवल शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान का प्रतीक बनती जा रही है। इससे शिक्षा के उद्देश्य और साधनों के बीच संतुलन का प्रश्न खड़ा होता है। क्या हर छात्र के लिए विदेश ही बेहतर विकल्प है, या देश में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसरों को मजबूत करना अधिक स्थायी समाधान हो सकता है?
सरकार और शैक्षणिक संस्थानों के सामने चुनौती स्पष्ट है—देश में विश्वस्तरीय शिक्षा, रिसर्च और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना। यदि घरेलू विश्वविद्यालय उद्योग से बेहतर जुड़ाव और आधुनिक पाठ्यक्रम विकसित करें, तो प्रतिभाओं का पलायन कम हो सकता है। साथ ही, पारदर्शी नीतियाँ और स्कॉलरशिप कार्यक्रम छात्रों को विकल्पों के साथ निर्णय लेने में मदद कर सकते हैं।
अंततः, विदेश में पढ़ाई न तो पूरी तरह लाभकारी है और न ही पूरी तरह जोखिमपूर्ण। यह एक व्यक्तिगत निर्णय है, जो अवसर, संसाधन और लक्ष्य पर निर्भर करता है। आवश्यक है कि छात्र आकर्षण के बजाय जानकारी और तैयारी के आधार पर निर्णय लें। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और जिम्मेदार नागरिकता का विकास होना चाहिए—चाहे वह देश में हो या विदेश में।
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