ट्रेंडिंग फैशन और सोशल मीडिया: हमारी संस्कृति पर असर

Ankita Suman

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सोशल मीडिया ने फैशन को विश्वव्यापी बना दिया है, लेकिन इसका प्रभाव हमारी संस्कृति पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। हमें ट्रेंड्स को अपनाने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की जिम्मेदारी निभानी होगी। यही संतुलन युवा पीढ़ी को व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तर पर मजबूत बनाएगा।

सोशल मीडिया ने आज के समय में हमारी सोच, व्यवहार और जीवनशैली पर गहरा प्रभाव डाल दिया है। इंस्टाग्राम, टिकटॉक और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर ट्रेंडिंग फैशन को देखकर युवा वर्ग अपनी पहचान और व्यक्तित्व बनाने के नए तरीकों की तलाश में रहते हैं। वहीं, इसके प्रभाव ने हमारी सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों पर सवाल उठाने लग है।

सोशल मीडिया और फैशन का तालमेल

सोशल मीडिया पर हर दिन नए फैशन ट्रेंड्स उभरते हैं। फैशन ब्लॉगर, इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज़ अपने आउटफिट, मेकअप और एक्सेसरीज की झलकियाँ साझा करते हैं। इससे युवा पीढ़ी में तुरंत अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ती है। उदाहरण के लिए, वेस्टर्न आउटफिट्स, ब्रांडेड जूते और ट्रेंडी एक्सेसरीज भारत के छोटे शहरों में भी लोकप्रिय हो रही हैं।

संस्कृति पर असर

हालांकि यह फैशन और सोशल मीडिया का मेल व्यक्तित्व विकास और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन इसका असर हमारी सांस्कृतिक पहचान पर भी पड़ता है। पारंपरिक भारतीय पहनावे जैसे साड़ी, सलवार-कुर्ता और धोती धीरे-धीरे युवाओं की रोज़मर्रा की पसंद से बाहर हो रहे हैं। त्यौहारों और धार्मिक अवसरों पर भी वेस्टर्न और फ्यूज़न स्टाइल की झलक ज्यादा देखने को मिलती है। इसके साथ ही स्थानीय और हस्तशिल्प आधारित उद्योगों पर भी दबाव बढ़ा है, क्योंकि लोग तेज़ी से बदलते फैशन ट्रेंड्स के चलते परंपरागत उत्पादों की ओर कम आकर्षित होते हैं।

फायदे और नुकसान

सोशल मीडिया फैशन का एक बड़ा फायदा यह है कि यह रचनात्मकता और एक्सप्रेशन का अवसर देता है। युवा अपनी पसंद और शैली के माध्यम से खुद को व्यक्त कर सकते हैं। वहीं, नुकसान यह है कि ट्रेंड्स की तेजी से बदलती दुनिया में सामाजिक दबाव और “फॉलोइंग” की भावना अधिक होती है। इससे मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है और उपभोक्तावाद बढ़ सकता है।

हमारी संस्कृति और आधुनिक फैशन के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। युवाओं को सोशल मीडिया के ट्रेंड्स को अपनाने के साथ-साथ पारंपरिक मूल्यों और भारतीय हस्तशिल्प को भी सम्मान देना चाहिए। स्कूल, कॉलेज और फैशन प्लेटफॉर्म्स में पारंपरिक पहनावे को प्रोत्साहित करने वाले अभियानों की शुरुआत की जा सकती है। इससे संस्कृति का संरक्षण भी होगा और युवा अपनी शैली के माध्यम से रचनात्मकता भी दिखा पाएंगे।

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