क्या नकदी का दौर खत्म होने की ओर है? कैशलेस अर्थव्यवस्था पर दुनिया में तेज हुई नई बहस

Priyanka Mathur

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डिजिटल पेमेंट और UPI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या पूरी तरह Cashless व्यवस्था आर्थिक पारदर्शिता बढ़ाएगी या फिर इससे गरीब, ग्रामीण आबादी और वित्तीय गोपनीयता पर बड़ा असर पड़ेगा

कुछ साल पहले तक किसी भी खरीदारी का मतलब जेब से नोट निकालकर भुगतान करना होता था। किराने की दुकान, सब्जी मंडी, बस का टिकट, अस्पताल की फीस या रेस्त्रां का बिल—हर जगह Cash सबसे सामान्य और भरोसेमंद माध्यम माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आज एक QR कोड स्कैन करते ही कुछ सेकेंड में भुगतान हो जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में डिजिटल पेमेंट ने लोगों की जीवनशैली बदल दी है। ऐसे में एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है कि क्या आने वाले समय में Cash पूरी तरह खत्म हो जाएगा, या फिर Cashless Society का सपना समाज के एक बड़े वर्ग के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

भारत में डिजिटल पेमेंट का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI ने बैंकिंग व्यवस्था को आम लोगों तक पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। छोटे दुकानदार, ऑटो चालक, सड़क किनारे चाय बेचने वाले, फल विक्रेता और बड़े कारोबारी—आज लगभग हर कोई डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रहा है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने भुगतान की प्रक्रिया को इतना आसान बना दिया है कि कई लोग अब अपने साथ Cash रखना भी जरूरी नहीं समझते। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य डिजिटल लेनदेन का है।

सरकारें भी Cashless Economy को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि डिजिटल भुगतान से हर ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है, जिससे टैक्स चोरी पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलती है। काले धन, फर्जी लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियों पर भी निगरानी आसान हो जाती है। इसके अलावा सरकार को नकदी छापने, उसकी सुरक्षा, परिवहन और वितरण पर होने वाला भारी खर्च भी कम करना पड़ता है। यही कारण है कि कई देशों ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं और नीतियां बनाई हैं।

लेकिन इस पूरी बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई अर्थशास्त्रियों और सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह Cashless व्यवस्था हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं हो सकती। आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट की नियमित सुविधा नहीं है या वे डिजिटल बैंकिंग का उपयोग करने में सहज नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, बुजुर्ग नागरिक, दिहाड़ी मजदूर और कम आय वाले परिवार अब भी Cash पर अधिक निर्भर हैं। यदि भविष्य में Cash का इस्तेमाल बहुत सीमित हो जाता है तो यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि Cash केवल भुगतान का माध्यम नहीं बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। यदि मोबाइल नेटवर्क बंद हो जाए, बैंक सर्वर काम न करें, बिजली चली जाए या किसी तकनीकी कारण से डिजिटल भुगतान रुक जाए, तो Cash ही एकमात्र विकल्प बचता है। प्राकृतिक आपदा, युद्ध, साइबर हमले या बड़े तकनीकी संकट के दौरान दुनिया के कई देशों में Cash की उपयोगिता फिर सामने आई है। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी देश को पूरी तरह Cashless बनने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

एक और बड़ा मुद्दा Financial Privacy यानी वित्तीय गोपनीयता का है। जब हर भुगतान डिजिटल माध्यम से होगा तो व्यक्ति की खरीदारी, यात्रा, इलाज, खान-पान और आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे यह सवाल उठता है कि इस डेटा तक किसकी पहुंच होगी और इसका उपयोग किस तरह किया जाएगा। डिजिटल अधिकारों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डेटा सुरक्षा मजबूत नहीं होगी तो लोगों की निजी आर्थिक जानकारी का दुरुपयोग भी हो सकता है। यही वजह है कि कई देशों में डेटा प्रोटेक्शन कानूनों को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो चुका है। बैंक अब मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, एन्क्रिप्शन और फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति का मोबाइल खो भी जाए तो बैंक खाते को तुरंत ब्लॉक किया जा सकता है, जबकि Cash चोरी होने या खो जाने पर उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है। इसलिए उनके अनुसार तकनीक के साथ सुरक्षा भी लगातार मजबूत हो रही है।

हालांकि साइबर अपराधों में भी तेजी आई है। फर्जी कस्टमर केयर नंबर, फिशिंग लिंक, QR कोड स्कैम, स्क्रीन शेयरिंग ऐप, OTP फ्रॉड और बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। डिजिटल भुगतान जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से साइबर अपराधियों ने भी नए तरीके विकसित किए हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल साक्षरता और साइबर जागरूकता बढ़ाना अब सरकारों और बैंकिंग संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है।

दुनिया के कई देशों में अब यह चर्चा भी चल रही है कि क्या नागरिकों को हमेशा Cash में भुगतान करने का अधिकार मिलना चाहिए। स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में डिजिटल भुगतान का प्रतिशत दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन वहां भी कई विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन यह मांग कर रहे हैं कि Cash का विकल्प पूरी तरह समाप्त नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि आपातकालीन परिस्थितियों में Cash सबसे विश्वसनीय माध्यम साबित होता है।

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां करोड़ों लोग अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहते हैं। शहरों में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है, लेकिन गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी Cash का महत्व बना हुआ है। कई छोटे व्यापारी दोनों विकल्प रखते हैं ताकि ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत पूरी तरह Cashless बनने की बजाय "Less Cash Economy" की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जहां डिजिटल भुगतान प्रमुख होगा लेकिन Cash की भूमिका भी बनी रहेगी।

केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) जैसे नए प्रयोग भी इसी बदलाव का हिस्सा माने जा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक अपनी डिजिटल मुद्रा विकसित कर रहे हैं ताकि भुगतान प्रणाली और अधिक तेज, सुरक्षित और पारदर्शी बन सके। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल करेंसी आने के बाद भी Cash की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, क्योंकि यह केवल तकनीक का नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और व्यक्तिगत पसंद का भी विषय है।

आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां यह बहस केवल भुगतान के तरीके तक सीमित नहीं रह गई है। यह नागरिकों की स्वतंत्रता, वित्तीय समानता, डेटा सुरक्षा और तकनीकी पहुंच से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है। एक तरफ डिजिटल भुगतान से सुविधा, पारदर्शिता और तेज लेनदेन का रास्ता खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह चिंता भी बनी हुई है कि कहीं तकनीकी बदलाव की इस दौड़ में समाज का कमजोर वर्ग पीछे न छूट जाए। यही वजह है कि नीति निर्माता, अर्थशास्त्री और तकनीकी विशेषज्ञ अब ऐसे मॉडल की तलाश में हैं जिसमें डिजिटल प्रगति भी जारी रहे और Cash का विकल्प भी पूरी तरह खत्म न हो।

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06 Jul 2026 By Priyanka

क्या नकदी का दौर खत्म होने की ओर है? कैशलेस अर्थव्यवस्था पर दुनिया में तेज हुई नई बहस

Priyanka Mathur

कुछ साल पहले तक किसी भी खरीदारी का मतलब जेब से नोट निकालकर भुगतान करना होता था। किराने की दुकान, सब्जी मंडी, बस का टिकट, अस्पताल की फीस या रेस्त्रां का बिल—हर जगह Cash सबसे सामान्य और भरोसेमंद माध्यम माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आज एक QR कोड स्कैन करते ही कुछ सेकेंड में भुगतान हो जाता है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में डिजिटल पेमेंट ने लोगों की जीवनशैली बदल दी है। ऐसे में एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है कि क्या आने वाले समय में Cash पूरी तरह खत्म हो जाएगा, या फिर Cashless Society का सपना समाज के एक बड़े वर्ग के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

भारत में डिजिटल पेमेंट का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI ने बैंकिंग व्यवस्था को आम लोगों तक पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। छोटे दुकानदार, ऑटो चालक, सड़क किनारे चाय बेचने वाले, फल विक्रेता और बड़े कारोबारी—आज लगभग हर कोई डिजिटल भुगतान स्वीकार कर रहा है। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने भुगतान की प्रक्रिया को इतना आसान बना दिया है कि कई लोग अब अपने साथ Cash रखना भी जरूरी नहीं समझते। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य डिजिटल लेनदेन का है।

सरकारें भी Cashless Economy को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि डिजिटल भुगतान से हर ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है, जिससे टैक्स चोरी पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलती है। काले धन, फर्जी लेनदेन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियों पर भी निगरानी आसान हो जाती है। इसके अलावा सरकार को नकदी छापने, उसकी सुरक्षा, परिवहन और वितरण पर होने वाला भारी खर्च भी कम करना पड़ता है। यही कारण है कि कई देशों ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं और नीतियां बनाई हैं।

लेकिन इस पूरी बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई अर्थशास्त्रियों और सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी तरह Cashless व्यवस्था हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं हो सकती। आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है, इंटरनेट की नियमित सुविधा नहीं है या वे डिजिटल बैंकिंग का उपयोग करने में सहज नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, बुजुर्ग नागरिक, दिहाड़ी मजदूर और कम आय वाले परिवार अब भी Cash पर अधिक निर्भर हैं। यदि भविष्य में Cash का इस्तेमाल बहुत सीमित हो जाता है तो यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि Cash केवल भुगतान का माध्यम नहीं बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। यदि मोबाइल नेटवर्क बंद हो जाए, बैंक सर्वर काम न करें, बिजली चली जाए या किसी तकनीकी कारण से डिजिटल भुगतान रुक जाए, तो Cash ही एकमात्र विकल्प बचता है। प्राकृतिक आपदा, युद्ध, साइबर हमले या बड़े तकनीकी संकट के दौरान दुनिया के कई देशों में Cash की उपयोगिता फिर सामने आई है। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी देश को पूरी तरह Cashless बनने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

एक और बड़ा मुद्दा Financial Privacy यानी वित्तीय गोपनीयता का है। जब हर भुगतान डिजिटल माध्यम से होगा तो व्यक्ति की खरीदारी, यात्रा, इलाज, खान-पान और आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे यह सवाल उठता है कि इस डेटा तक किसकी पहुंच होगी और इसका उपयोग किस तरह किया जाएगा। डिजिटल अधिकारों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डेटा सुरक्षा मजबूत नहीं होगी तो लोगों की निजी आर्थिक जानकारी का दुरुपयोग भी हो सकता है। यही वजह है कि कई देशों में डेटा प्रोटेक्शन कानूनों को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

दूसरी ओर तकनीकी विशेषज्ञों का तर्क है कि डिजिटल भुगतान पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो चुका है। बैंक अब मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, एन्क्रिप्शन और फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति का मोबाइल खो भी जाए तो बैंक खाते को तुरंत ब्लॉक किया जा सकता है, जबकि Cash चोरी होने या खो जाने पर उसे वापस पाना लगभग असंभव होता है। इसलिए उनके अनुसार तकनीक के साथ सुरक्षा भी लगातार मजबूत हो रही है।

हालांकि साइबर अपराधों में भी तेजी आई है। फर्जी कस्टमर केयर नंबर, फिशिंग लिंक, QR कोड स्कैम, स्क्रीन शेयरिंग ऐप, OTP फ्रॉड और बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। डिजिटल भुगतान जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से साइबर अपराधियों ने भी नए तरीके विकसित किए हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल साक्षरता और साइबर जागरूकता बढ़ाना अब सरकारों और बैंकिंग संस्थानों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है।

दुनिया के कई देशों में अब यह चर्चा भी चल रही है कि क्या नागरिकों को हमेशा Cash में भुगतान करने का अधिकार मिलना चाहिए। स्वीडन और नॉर्वे जैसे देशों में डिजिटल भुगतान का प्रतिशत दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन वहां भी कई विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन यह मांग कर रहे हैं कि Cash का विकल्प पूरी तरह समाप्त नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि आपातकालीन परिस्थितियों में Cash सबसे विश्वसनीय माध्यम साबित होता है।

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां करोड़ों लोग अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में रहते हैं। शहरों में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है, लेकिन गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी Cash का महत्व बना हुआ है। कई छोटे व्यापारी दोनों विकल्प रखते हैं ताकि ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार भुगतान कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत पूरी तरह Cashless बनने की बजाय "Less Cash Economy" की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जहां डिजिटल भुगतान प्रमुख होगा लेकिन Cash की भूमिका भी बनी रहेगी।

केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) जैसे नए प्रयोग भी इसी बदलाव का हिस्सा माने जा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक अपनी डिजिटल मुद्रा विकसित कर रहे हैं ताकि भुगतान प्रणाली और अधिक तेज, सुरक्षित और पारदर्शी बन सके। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल करेंसी आने के बाद भी Cash की उपयोगिता पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, क्योंकि यह केवल तकनीक का नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और व्यक्तिगत पसंद का भी विषय है।

आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां यह बहस केवल भुगतान के तरीके तक सीमित नहीं रह गई है। यह नागरिकों की स्वतंत्रता, वित्तीय समानता, डेटा सुरक्षा और तकनीकी पहुंच से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुकी है। एक तरफ डिजिटल भुगतान से सुविधा, पारदर्शिता और तेज लेनदेन का रास्ता खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह चिंता भी बनी हुई है कि कहीं तकनीकी बदलाव की इस दौड़ में समाज का कमजोर वर्ग पीछे न छूट जाए। यही वजह है कि नीति निर्माता, अर्थशास्त्री और तकनीकी विशेषज्ञ अब ऐसे मॉडल की तलाश में हैं जिसमें डिजिटल प्रगति भी जारी रहे और Cash का विकल्प भी पूरी तरह खत्म न हो।

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https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/is-the-era-of-cash-coming-to-an-end-new/article-58015

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