डार्क टूरिज्म: इतिहास की सीख या त्रासदी को कारोबार बनाने का तरीका?

Priyanka Mathur

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ऑशविट्ज, युद्धक्षेत्र और आपदा स्थलों पर पहुंच रहे पर्यटकों के बीच बहस तेज, कहीं इतिहास समझने का जरिया तो कहीं पीड़ितों के दर्द के व्यावसायीकरण का आरोप

दुनिया में घूमने-फिरने का मतलब हमेशा खूबसूरत जगहें, समुद्र, पहाड़ या ऐतिहासिक इमारतें देखना नहीं रह गया है। अब बड़ी संख्या में लोग उन स्थानों तक भी पहुंच रहे हैं, जहां कभी युद्ध हुआ, हजारों लोगों की जान गई या किसी बड़ी त्रासदी ने पूरे समाज को हिला दिया। ऐसे पर्यटन को ‘डार्क टूरिज्म’ कहा जाता है। इसमें युद्धक्षेत्र, पुराने जेल कैंप, नरसंहार से जुड़े स्मारक, परमाणु हमले के स्थल और बड़ी प्राकृतिक या मानवीय आपदाओं वाली जगहें शामिल हैं। ऑशविट्ज-बिरकेनाउ जैसे पूर्व नाजी कैंप से लेकर दुनिया के अलग-अलग युद्धस्थलों तक हर साल पर्यटक पहुंचते हैं। कुछ लोग इसे इतिहास को करीब से समझने का मौका मानते हैं। उनका कहना है कि किताबों में पढ़ी गई घटनाओं को उस जगह जाकर देखना अलग अनुभव होता है। किसी पुराने जेल परिसर, युद्धभूमि या स्मारक के सामने खड़े होकर वहां हुई घटनाओं को समझने से इतिहास ज्यादा वास्तविक महसूस हो सकता है।

डार्क टूरिज्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका शैक्षणिक पहलू माना जाता है। ऐसे स्थानों पर संग्रहालय, दस्तावेज, पुरानी तस्वीरें, स्मारक और गाइडेड टूर के जरिए पर्यटकों को उस दौर की जानकारी दी जाती है। ऑशविट्ज-बिरकेनाउ इसका बड़ा उदाहरण है, जहां नाजी शासन के दौरान हुए नरसंहार की यादों को संरक्षित रखा गया है। वहां मौजूद इमारतें, बैरक और दूसरी चीजें उस समय की भयावहता को समझने में मदद करती हैं। ऐसे स्थलों पर जाने वाले लोगों के लिए इतिहास सिर्फ तारीखों और आंकड़ों का विषय नहीं रहता, बल्कि सामने मौजूद जगह और उससे जुड़ी कहानियों के जरिए एक मानवीय अनुभव बन जाता है। यही वजह है कि कई शिक्षाविद और इतिहासकार मानते हैं कि जिम्मेदारी के साथ किया गया डार्क टूरिज्म नई पीढ़ी को अतीत समझाने और मानवाधिकारों के महत्व को बताने में उपयोगी हो सकता है। खासकर उन घटनाओं को याद रखना जरूरी माना जाता है, जिनके दोबारा होने का खतरा समाज के लिए गंभीर हो सकता है।

लेकिन यहीं से दूसरी बहस भी शुरू होती है। किसी ऐसी जगह पर जाना जहां हजारों लोगों ने जान गंवाई हो, वहां घूमना और तस्वीरें लेना कितना उचित है? सोशल मीडिया के दौर में यह सवाल और बड़ा हो गया है। कई बार लोग स्मारकों या त्रासदी वाले स्थानों पर सेल्फी लेते, वीडियो बनाते या ऐसी तस्वीरें खींचते नजर आते हैं, जिन्हें वहां की गंभीरता के हिसाब से असंवेदनशील माना जाता है। ऑशविट्ज जैसे स्मारक पर आगंतुकों के व्यवहार को लेकर स्पष्ट नियम हैं। वहां लोगों से पीड़ितों की गरिमा बनाए रखने और जगह की संवेदनशीलता का सम्मान करने की अपील की जाती है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी त्रासदी की जगह को सिर्फ सोशल मीडिया कंटेंट, रोमांच या मनोरंजन के नजरिए से देखा जाने लगे। किसी हादसे या नरसंहार से जुड़े स्थान को ‘दिलचस्प टूरिस्ट स्पॉट’ के रूप में पेश करना उन लोगों के लिए बेहद तकलीफदेह हो सकता है, जिनके परिवार सीधे उस घटना से प्रभावित रहे हैं।

डार्क टूरिज्म का एक आर्थिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्यटकों के आने से स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी, गाइड, संग्रहालय और छोटे कारोबारों को रोजगार मिलता है। कई जगहों पर टिकट और पर्यटन से मिलने वाली आय का इस्तेमाल स्मारकों के रखरखाव और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण में भी किया जाता है। लेकिन अगर किसी त्रासदी से जुड़ी जगह की लोकप्रियता को सिर्फ कमाई का जरिया बना दिया जाए तो नैतिक सवाल उठना स्वाभाविक है। स्थानीय लोगों की भावनाओं और पीड़ित परिवारों की संवेदनाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। मसलन, किसी पुराने युद्धक्षेत्र को सिर्फ रोमांचक एडवेंचर की तरह प्रचारित करना वहां हुई मौतों और पीड़ा की गंभीरता को कम कर सकता है। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि डार्क टूरिज्म में कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि उस जगह की कहानी किस तरह बताई जा रही है और पर्यटकों को वहां से क्या समझ मिल रही है।

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एक और बड़ी चुनौती इन स्थलों के संरक्षण की है। लोकप्रिय स्मारकों पर लगातार बढ़ती भीड़ से पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक वस्तुओं पर दबाव पड़ सकता है। बड़ी संख्या में पर्यटकों को संभालने के लिए प्रशासन को सुरक्षा, संरक्षण और आगंतुकों की सुविधा के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। कई जगहों पर गाइडेड टूर, सीमित प्रवेश और फोटोग्राफी से जुड़े नियम इसी वजह से बनाए जाते हैं। दूसरी ओर, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित इलाकों में स्थानीय लोगों की जिंदगी सामान्य होने से पहले पर्यटन शुरू कर देना भी संवेदनशील मुद्दा है। किसी हादसे के तुरंत बाद वहां पर्यटकों की भीड़ पहुंचने लगे तो राहत और पुनर्वास का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए डार्क टूरिज्म के लिए समय, स्थान और व्यवहार तीनों का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि कोई जगह पर्यटकों के लिए खुली है या नहीं, यह भी देखना पड़ता है कि वहां जाना उस समय उचित है या नहीं।

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डार्क टूरिज्म को लेकर यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है कि इसे इतिहास की जिम्मेदार याद के रूप में देखा जाए या पर्यटन के नए बाजार के तौर पर। जवाब शायद इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यटक वहां किस उद्देश्य से जाता है और उस जगह को संचालित करने वाले लोग इतिहास को किस तरह सामने रखते हैं। अगर यात्रा का उद्देश्य पीड़ितों को याद करना, घटना को समझना और उससे सीख लेना है तो यह एक प्रभावी शैक्षणिक अनुभव बन सकता है। लेकिन अगर त्रासदी को सिर्फ फोटो, रोमांच या मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो वही पर्यटन शोषण का रूप ले सकता है। युद्ध और नरसंहार से जुड़े स्थलों पर जाने वाले पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। इतिहास को जीवित रखने और उसे बाजार का हिस्सा बनाने के बीच की सीमा बेहद संवेदनशील है।

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15 Aug 2026 By Priyanka

डार्क टूरिज्म: इतिहास की सीख या त्रासदी को कारोबार बनाने का तरीका?

Priyanka Mathur

दुनिया में घूमने-फिरने का मतलब हमेशा खूबसूरत जगहें, समुद्र, पहाड़ या ऐतिहासिक इमारतें देखना नहीं रह गया है। अब बड़ी संख्या में लोग उन स्थानों तक भी पहुंच रहे हैं, जहां कभी युद्ध हुआ, हजारों लोगों की जान गई या किसी बड़ी त्रासदी ने पूरे समाज को हिला दिया। ऐसे पर्यटन को ‘डार्क टूरिज्म’ कहा जाता है। इसमें युद्धक्षेत्र, पुराने जेल कैंप, नरसंहार से जुड़े स्मारक, परमाणु हमले के स्थल और बड़ी प्राकृतिक या मानवीय आपदाओं वाली जगहें शामिल हैं। ऑशविट्ज-बिरकेनाउ जैसे पूर्व नाजी कैंप से लेकर दुनिया के अलग-अलग युद्धस्थलों तक हर साल पर्यटक पहुंचते हैं। कुछ लोग इसे इतिहास को करीब से समझने का मौका मानते हैं। उनका कहना है कि किताबों में पढ़ी गई घटनाओं को उस जगह जाकर देखना अलग अनुभव होता है। किसी पुराने जेल परिसर, युद्धभूमि या स्मारक के सामने खड़े होकर वहां हुई घटनाओं को समझने से इतिहास ज्यादा वास्तविक महसूस हो सकता है।

डार्क टूरिज्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका शैक्षणिक पहलू माना जाता है। ऐसे स्थानों पर संग्रहालय, दस्तावेज, पुरानी तस्वीरें, स्मारक और गाइडेड टूर के जरिए पर्यटकों को उस दौर की जानकारी दी जाती है। ऑशविट्ज-बिरकेनाउ इसका बड़ा उदाहरण है, जहां नाजी शासन के दौरान हुए नरसंहार की यादों को संरक्षित रखा गया है। वहां मौजूद इमारतें, बैरक और दूसरी चीजें उस समय की भयावहता को समझने में मदद करती हैं। ऐसे स्थलों पर जाने वाले लोगों के लिए इतिहास सिर्फ तारीखों और आंकड़ों का विषय नहीं रहता, बल्कि सामने मौजूद जगह और उससे जुड़ी कहानियों के जरिए एक मानवीय अनुभव बन जाता है। यही वजह है कि कई शिक्षाविद और इतिहासकार मानते हैं कि जिम्मेदारी के साथ किया गया डार्क टूरिज्म नई पीढ़ी को अतीत समझाने और मानवाधिकारों के महत्व को बताने में उपयोगी हो सकता है। खासकर उन घटनाओं को याद रखना जरूरी माना जाता है, जिनके दोबारा होने का खतरा समाज के लिए गंभीर हो सकता है।

लेकिन यहीं से दूसरी बहस भी शुरू होती है। किसी ऐसी जगह पर जाना जहां हजारों लोगों ने जान गंवाई हो, वहां घूमना और तस्वीरें लेना कितना उचित है? सोशल मीडिया के दौर में यह सवाल और बड़ा हो गया है। कई बार लोग स्मारकों या त्रासदी वाले स्थानों पर सेल्फी लेते, वीडियो बनाते या ऐसी तस्वीरें खींचते नजर आते हैं, जिन्हें वहां की गंभीरता के हिसाब से असंवेदनशील माना जाता है। ऑशविट्ज जैसे स्मारक पर आगंतुकों के व्यवहार को लेकर स्पष्ट नियम हैं। वहां लोगों से पीड़ितों की गरिमा बनाए रखने और जगह की संवेदनशीलता का सम्मान करने की अपील की जाती है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी त्रासदी की जगह को सिर्फ सोशल मीडिया कंटेंट, रोमांच या मनोरंजन के नजरिए से देखा जाने लगे। किसी हादसे या नरसंहार से जुड़े स्थान को ‘दिलचस्प टूरिस्ट स्पॉट’ के रूप में पेश करना उन लोगों के लिए बेहद तकलीफदेह हो सकता है, जिनके परिवार सीधे उस घटना से प्रभावित रहे हैं।

डार्क टूरिज्म का एक आर्थिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पर्यटकों के आने से स्थानीय होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी, गाइड, संग्रहालय और छोटे कारोबारों को रोजगार मिलता है। कई जगहों पर टिकट और पर्यटन से मिलने वाली आय का इस्तेमाल स्मारकों के रखरखाव और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण में भी किया जाता है। लेकिन अगर किसी त्रासदी से जुड़ी जगह की लोकप्रियता को सिर्फ कमाई का जरिया बना दिया जाए तो नैतिक सवाल उठना स्वाभाविक है। स्थानीय लोगों की भावनाओं और पीड़ित परिवारों की संवेदनाओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है। मसलन, किसी पुराने युद्धक्षेत्र को सिर्फ रोमांचक एडवेंचर की तरह प्रचारित करना वहां हुई मौतों और पीड़ा की गंभीरता को कम कर सकता है। इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि डार्क टूरिज्म में कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि उस जगह की कहानी किस तरह बताई जा रही है और पर्यटकों को वहां से क्या समझ मिल रही है।

एक और बड़ी चुनौती इन स्थलों के संरक्षण की है। लोकप्रिय स्मारकों पर लगातार बढ़ती भीड़ से पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक वस्तुओं पर दबाव पड़ सकता है। बड़ी संख्या में पर्यटकों को संभालने के लिए प्रशासन को सुरक्षा, संरक्षण और आगंतुकों की सुविधा के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। कई जगहों पर गाइडेड टूर, सीमित प्रवेश और फोटोग्राफी से जुड़े नियम इसी वजह से बनाए जाते हैं। दूसरी ओर, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित इलाकों में स्थानीय लोगों की जिंदगी सामान्य होने से पहले पर्यटन शुरू कर देना भी संवेदनशील मुद्दा है। किसी हादसे के तुरंत बाद वहां पर्यटकों की भीड़ पहुंचने लगे तो राहत और पुनर्वास का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए डार्क टूरिज्म के लिए समय, स्थान और व्यवहार तीनों का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि कोई जगह पर्यटकों के लिए खुली है या नहीं, यह भी देखना पड़ता है कि वहां जाना उस समय उचित है या नहीं।

डार्क टूरिज्म को लेकर यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है कि इसे इतिहास की जिम्मेदार याद के रूप में देखा जाए या पर्यटन के नए बाजार के तौर पर। जवाब शायद इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यटक वहां किस उद्देश्य से जाता है और उस जगह को संचालित करने वाले लोग इतिहास को किस तरह सामने रखते हैं। अगर यात्रा का उद्देश्य पीड़ितों को याद करना, घटना को समझना और उससे सीख लेना है तो यह एक प्रभावी शैक्षणिक अनुभव बन सकता है। लेकिन अगर त्रासदी को सिर्फ फोटो, रोमांच या मुनाफे के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो वही पर्यटन शोषण का रूप ले सकता है। युद्ध और नरसंहार से जुड़े स्थलों पर जाने वाले पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है। इतिहास को जीवित रखने और उसे बाजार का हिस्सा बनाने के बीच की सीमा बेहद संवेदनशील है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/opinion/lessons-from-dark-tourism-history-or-how-to-turn-tragedy/article-61541

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