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‘आईपैड किड’ जेनरेशन: क्या स्क्रीन की आदत बच्चों की सीखने की क्षमता और शिक्षा के भविष्य को बदल रही है?
Priyanka Mathur
2020 के बाद जन्मे बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम, कम ध्यान अवधि और डिजिटल निर्भरता पर विशेषज्ञों की चिंता
2020 के दशक में जन्म लेने वाले बच्चों की एक नई पहचान सोशल मीडिया और इंटरनेट पर चर्चा का विषय बनी हुई है—‘आईपैड किड’। यह शब्द उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनका बचपन मोबाइल, टैबलेट और डिजिटल स्क्रीन के बीच गुजर रहा है।
आज कई छोटे बच्चे पढ़ाई, मनोरंजन और खेल के लिए डिजिटल डिवाइस पर निर्भर हो गए हैं। ऑनलाइन क्लास, एजुकेशनल ऐप और वीडियो कंटेंट ने बच्चों के सीखने के तरीके बदले हैं, लेकिन लगातार स्क्रीन इस्तेमाल को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक अपने आप में समस्या नहीं है, बल्कि उसका इस्तेमाल किस तरह और कितनी देर किया जा रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। कम उम्र में बिना नियंत्रण के स्क्रीन टाइम बच्चों की आदतों और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
बढ़ता स्क्रीन टाइम और ध्यान की समस्या
कई माता-पिता की शिकायत रहती है कि बच्चे लंबे समय तक स्क्रीन देखने के बाद किताब पढ़ने, बातचीत करने या किसी एक गतिविधि पर ध्यान लगाने में कम रुचि दिखाते हैं। छोटे वीडियो और तेज गति वाले डिजिटल कंटेंट बच्चों के दिमाग को लगातार नए उत्तेजनाओं के लिए तैयार करते हैं। इससे कुछ बच्चों को लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान बनाए रखने में कठिनाई महसूस हो सकती है। हालांकि, हर बच्चे पर इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होता। बच्चे का वातावरण, परिवार की भूमिका, पढ़ाई का तरीका और स्क्रीन इस्तेमाल का उद्देश्य भी काफी मायने रखता है।
क्या डिजिटल शिक्षा पर भी असर पड़ेगा?
शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल टूल्स ने पढ़ाई को आसान और ज्यादा इंटरैक्टिव बनाया है। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल माध्यम को पारंपरिक सीखने के तरीकों का विकल्प नहीं बल्कि सहयोगी माध्यम बनाना जरूरी है। किताब पढ़ना, लिखना, चर्चा करना, खेलना और सामाजिक गतिविधियां बच्चों के संपूर्ण विकास में अहम भूमिका निभाती हैं।
माता-पिता की भूमिका सबसे अहम
विशेषज्ञ बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करने की सलाह देते हैं। साथ ही यह भी जरूरी है कि माता-पिता खुद डिजिटल डिवाइस के इस्तेमाल में संतुलन दिखाएं। बच्चों को आउटडोर खेल, रचनात्मक गतिविधियों, बातचीत और पढ़ने की आदतों से जोड़ना उनकी सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
तकनीक से दूरी नहीं, संतुलन जरूरी
डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर रहना आज के समय में संभव नहीं है। बच्चे भविष्य में तकनीक के साथ ही आगे बढ़ेंगे, इसलिए जरूरी है कि उन्हें इसका सही इस्तेमाल सिखाया जाए। शिक्षा और तकनीक के बीच संतुलन बनाकर बच्चों को डिजिटल दुनिया के फायदे भी दिए जा सकते हैं और इसके संभावित नुकसान से भी बचाया जा सकता है। ‘आईपैड किड’ शब्द जहां एक नई डिजिटल पीढ़ी की ओर इशारा करता है, वहीं यह सवाल भी उठाता है कि आने वाले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था बच्चों की बदलती आदतों के साथ किस तरह खुद को तैयार करेगी।
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