Guru Ravidas Jayanti 2026: आज देशभर में श्रद्धा से मनाई जाएगी जयंती

धर्म डेस्क

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संत रविदास की 649वीं जयंती पर देशभर में धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन

उत्तर भारत में सर्दी का असर धीरे-धीरे कम होने के साथ ही आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण दिन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। गुरु रविदास जयंती 2026 इस वर्ष रविवार, 1 फरवरी को मनाई जाएगी। यह दिन 15वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक संत रविदास की 649वीं जयंती के रूप में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाएगा।

माघ पूर्णिमा के शुभ अवसर पर पड़ने वाली यह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय का उत्सव है।

आज के दौर में जब समाज सामाजिक न्याय, समानता और मानसिक शांति की तलाश में है, संत रविदास की शिक्षाएं आधुनिक जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होती हैं। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में एक साधारण परिवार में जन्मे संत रविदास ने अपने समय की कठोर जाति व्यवस्था को चुनौती दी और भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ बने।

उनका प्रसिद्ध कथन —
“मन चंगा तो कठौती में गंगा”
आज भी यह संदेश देता है कि बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण है मन की शुद्धता। संत रविदास ने कर्म, करुणा और चरित्र को ही सच्ची भक्ति का आधार बताया।


2026 में भव्य आयोजन: वाराणसी से जालंधर तक

इस वर्ष गुरु रविदास जयंती के आयोजन विशेष रूप से भव्य होने की संभावना है।

  • वाराणसी: संत रविदास की जन्मस्थली श्री गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर में हजारों श्रद्धालु एकत्र हो रहे हैं।

  • नगर कीर्तन: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में गुरु रविदास के चित्रों के साथ भव्य शोभायात्राएं निकाली जा रही हैं।

  • अमृतबाणी पाठ: रैदासिया समुदाय का पवित्र ग्रंथ दुनियाभर में सामूहिक रूप से पढ़ा जा रहा है।

  • विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी: डेरा सचखंड बल्लां सहित प्रमुख स्थलों पर राजनीतिक और आध्यात्मिक हस्तियों के पहुंचने की संभावना है, जो संत रविदास के सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है।


माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व

गुरु रविदास जयंती का माघ पूर्णिमा पर पड़ना आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन ध्यान, सेवा और सामूहिक प्रार्थना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी दिन संत रविदास की कल्पना की गई ‘बेगमपुरा’ की अवधारणा को स्मरण किया जाता है—एक ऐसा समाज जहां न दुख हो, न भेदभाव, न कर और न ही अन्याय।

गुरु रविदास जयंती केवल श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है।

  • समानता अपनाएं: अपने व्यवहार में भेदभाव छोड़कर सभी को समान सम्मान दें।

  • आंतरिक शुद्धता पर ध्यान दें: कुछ समय आत्मचिंतन और सकारात्मक सोच के लिए निकालें।

  • निस्वार्थ सेवा करें: लंगर, शिक्षा या जरूरतमंदों की सहायता में योगदान दें।


आज गुरु रविदास की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज की शुरुआत व्यक्ति के मन और कर्म से होती है। चाहे गंगा के तट पर हों या अपने घर में, संत रविदास का संदेश आज भी उतना ही स्पष्ट है—सच्ची भक्ति मानवता से प्रेम में है।

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01 Feb 2026 By Nitin Trivedi

Guru Ravidas Jayanti 2026: आज देशभर में श्रद्धा से मनाई जाएगी जयंती

धर्म डेस्क

उत्तर भारत में सर्दी का असर धीरे-धीरे कम होने के साथ ही आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण दिन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। गुरु रविदास जयंती 2026 इस वर्ष रविवार, 1 फरवरी को मनाई जाएगी। यह दिन 15वीं शताब्दी के महान संत, कवि और समाज सुधारक संत रविदास की 649वीं जयंती के रूप में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाएगा।

माघ पूर्णिमा के शुभ अवसर पर पड़ने वाली यह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय का उत्सव है।

आज के दौर में जब समाज सामाजिक न्याय, समानता और मानसिक शांति की तलाश में है, संत रविदास की शिक्षाएं आधुनिक जीवन के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होती हैं। वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में एक साधारण परिवार में जन्मे संत रविदास ने अपने समय की कठोर जाति व्यवस्था को चुनौती दी और भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ बने।

उनका प्रसिद्ध कथन —
“मन चंगा तो कठौती में गंगा”
आज भी यह संदेश देता है कि बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण है मन की शुद्धता। संत रविदास ने कर्म, करुणा और चरित्र को ही सच्ची भक्ति का आधार बताया।


2026 में भव्य आयोजन: वाराणसी से जालंधर तक

इस वर्ष गुरु रविदास जयंती के आयोजन विशेष रूप से भव्य होने की संभावना है।

  • वाराणसी: संत रविदास की जन्मस्थली श्री गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर में हजारों श्रद्धालु एकत्र हो रहे हैं।

  • नगर कीर्तन: पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में गुरु रविदास के चित्रों के साथ भव्य शोभायात्राएं निकाली जा रही हैं।

  • अमृतबाणी पाठ: रैदासिया समुदाय का पवित्र ग्रंथ दुनियाभर में सामूहिक रूप से पढ़ा जा रहा है।

  • विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी: डेरा सचखंड बल्लां सहित प्रमुख स्थलों पर राजनीतिक और आध्यात्मिक हस्तियों के पहुंचने की संभावना है, जो संत रविदास के सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है।


माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व

गुरु रविदास जयंती का माघ पूर्णिमा पर पड़ना आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन ध्यान, सेवा और सामूहिक प्रार्थना का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इसी दिन संत रविदास की कल्पना की गई ‘बेगमपुरा’ की अवधारणा को स्मरण किया जाता है—एक ऐसा समाज जहां न दुख हो, न भेदभाव, न कर और न ही अन्याय।

गुरु रविदास जयंती केवल श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए प्रेरणादायक है।

  • समानता अपनाएं: अपने व्यवहार में भेदभाव छोड़कर सभी को समान सम्मान दें।

  • आंतरिक शुद्धता पर ध्यान दें: कुछ समय आत्मचिंतन और सकारात्मक सोच के लिए निकालें।

  • निस्वार्थ सेवा करें: लंगर, शिक्षा या जरूरतमंदों की सहायता में योगदान दें।


आज गुरु रविदास की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज की शुरुआत व्यक्ति के मन और कर्म से होती है। चाहे गंगा के तट पर हों या अपने घर में, संत रविदास का संदेश आज भी उतना ही स्पष्ट है—सच्ची भक्ति मानवता से प्रेम में है।

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