हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बानमोर-मुरैना की 28.19 बीघा भूमि सरकारी घोषित

ग्वालियर (म.प्र.)

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राजस्व अधिकारियों के पुराने आदेश अवैध ठहरे, कलेक्टर को तत्काल कब्जा लेने के निर्देश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मुरैना जिले की बानमोर तहसील स्थित 28.19 बीघा कृषि भूमि को सरकारी घोषित करते हुए जमीन के मालिकाना हक को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद पर अंतिम मुहर लगा दी है। कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दोनों पक्षों की अपील खारिज कर दी और कलेक्टर मुरैना को निर्देश दिए कि वह नियमानुसार भूमि पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित करें।

यह फैसला उस जमीन को लेकर आया है, जिस पर अलग-अलग समय पर निजी व्यक्तियों ने खेती और दस्तावेजों के आधार पर स्वामित्व का दावा किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना या एग्रीमेंट टू सेल जैसे दस्तावेज जमीन के पुख्ता मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माने जा सकते।

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि वर्ष 1992 में नायब तहसीलदार और तहसीलदार द्वारा पारित आदेश बिना पर्याप्त जांच और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दिए गए थे, जो कानूनन टिकाऊ नहीं हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि राजस्व अधिकारियों को ऐसे मामलों में गहन जांच, दस्तावेजों की सत्यता और कानूनी प्रावधानों का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, बानमोर क्षेत्र की इस भूमि पर हरजीत सहित अन्य लोगों ने लंबे समय से खेती करने का दावा किया था। हरजीत का कहना था कि वह कई वर्षों से जमीन पर काबिज है और 1992 के आदेश के बाद उसका नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। वहीं, दूसरे पक्ष ने 1991 के एग्रीमेंट टू सेल और पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर मालिकाना हक जताया।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों की विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि कोई भी पक्ष भूमि के स्वामित्व को लेकर ठोस और कानूनी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी रखने से कोई व्यक्ति स्वतः जमीन का मालिक नहीं बन जाता।

अदालत ने खेती के दावे को भी संदेहास्पद माना। कोर्ट के अनुसार, जिस समय से खेती का दावा किया गया, उस समय संबंधित व्यक्ति की उम्र मात्र आठ वर्ष थी, जिससे खेती करना और पट्टा प्राप्त करना व्यावहारिक रूप से असंभव प्रतीत होता है।

इस फैसले के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। कलेक्टर कार्यालय को भूमि की स्थिति का सत्यापन कर कब्जा प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अदालत के आदेश का पालन नियमानुसार किया जाएगा।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर माना जाएगा, जहां केवल पुराने राजस्व रिकॉर्ड या अधूरे दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन पर दावे किए जाते रहे हैं। यह निर्णय भविष्य में भूमि विवादों के निपटारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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01 Feb 2026 By Nitin Trivedi

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बानमोर-मुरैना की 28.19 बीघा भूमि सरकारी घोषित

ग्वालियर (म.प्र.)

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मुरैना जिले की बानमोर तहसील स्थित 28.19 बीघा कृषि भूमि को सरकारी घोषित करते हुए जमीन के मालिकाना हक को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद पर अंतिम मुहर लगा दी है। कोर्ट ने इस मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दोनों पक्षों की अपील खारिज कर दी और कलेक्टर मुरैना को निर्देश दिए कि वह नियमानुसार भूमि पर सरकारी कब्जा सुनिश्चित करें।

यह फैसला उस जमीन को लेकर आया है, जिस पर अलग-अलग समय पर निजी व्यक्तियों ने खेती और दस्तावेजों के आधार पर स्वामित्व का दावा किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना या एग्रीमेंट टू सेल जैसे दस्तावेज जमीन के पुख्ता मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माने जा सकते।

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि वर्ष 1992 में नायब तहसीलदार और तहसीलदार द्वारा पारित आदेश बिना पर्याप्त जांच और अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दिए गए थे, जो कानूनन टिकाऊ नहीं हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि राजस्व अधिकारियों को ऐसे मामलों में गहन जांच, दस्तावेजों की सत्यता और कानूनी प्रावधानों का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, बानमोर क्षेत्र की इस भूमि पर हरजीत सहित अन्य लोगों ने लंबे समय से खेती करने का दावा किया था। हरजीत का कहना था कि वह कई वर्षों से जमीन पर काबिज है और 1992 के आदेश के बाद उसका नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। वहीं, दूसरे पक्ष ने 1991 के एग्रीमेंट टू सेल और पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर मालिकाना हक जताया।

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों की विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि कोई भी पक्ष भूमि के स्वामित्व को लेकर ठोस और कानूनी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी रखने से कोई व्यक्ति स्वतः जमीन का मालिक नहीं बन जाता।

अदालत ने खेती के दावे को भी संदेहास्पद माना। कोर्ट के अनुसार, जिस समय से खेती का दावा किया गया, उस समय संबंधित व्यक्ति की उम्र मात्र आठ वर्ष थी, जिससे खेती करना और पट्टा प्राप्त करना व्यावहारिक रूप से असंभव प्रतीत होता है।

इस फैसले के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। कलेक्टर कार्यालय को भूमि की स्थिति का सत्यापन कर कब्जा प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। राजस्व विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अदालत के आदेश का पालन नियमानुसार किया जाएगा।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह फैसला उन मामलों के लिए नजीर माना जाएगा, जहां केवल पुराने राजस्व रिकॉर्ड या अधूरे दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन पर दावे किए जाते रहे हैं। यह निर्णय भविष्य में भूमि विवादों के निपटारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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