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इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल: छोटे कदम, बड़ा असर
लाइफस्टाइल डेस्क
शहरों से गांवों तक बढ़ रही जागरूकता, रोजमर्रा की आदतों से बदल रही पर्यावरण की तस्वीर
जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण और घटते प्राकृतिक संसाधनों के बीच इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बनती जा रही है। देश के बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक लोग अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यक्तिगत स्तर पर अपनाई गई हर हरित आदत सामूहिक रूप से बड़ा असर डाल सकती है।
क्या है इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल?
इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल का अर्थ है ऐसी जीवनशैली अपनाना, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव कम से कम पड़े। इसमें प्लास्टिक का सीमित उपयोग, ऊर्जा की बचत, पानी का संरक्षण, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और कचरे का सही प्रबंधन शामिल है। यह बदलाव किसी बड़े निवेश से नहीं, बल्कि सोच और आदतों से शुरू होता है।
क्यों बढ़ रही है इसकी जरूरत?
सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। शहरों में वायु गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुंच रही है, जबकि जल संकट भी गहराता जा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जीवनशैली नहीं बदली गई, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।
कैसे बदल रही हैं लोगों की आदतें?
आज कई परिवार सिंगल-यूज प्लास्टिक छोड़कर कपड़े या जूट के बैग अपना रहे हैं। LED बल्ब, सोलर लाइट और ऊर्जा कुशल उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ा है। अपार्टमेंट्स में रेन वाटर हार्वेस्टिंग और किचन वेस्ट से कम्पोस्ट बनाने की पहल हो रही है। स्कूलों और ऑफिसों में भी ‘ग्रीन प्रैक्टिस’ को बढ़ावा दिया जा रहा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, “अगर हर व्यक्ति दिन में सिर्फ एक प्लास्टिक बोतल का इस्तेमाल छोड़ दे, तो लाखों टन प्लास्टिक कचरा कम हो सकता है।” उनका कहना है कि इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल अपनाने से न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षित होता है, बल्कि स्वास्थ्य और आर्थिक लाभ भी मिलते हैं।
सरकार और संस्थानों की भूमिका
केंद्र और राज्य सरकारें स्वच्छ भारत मिशन, सिंगल-यूज प्लास्टिक बैन और इलेक्ट्रिक व्हीकल नीति जैसी योजनाओं के जरिए हरित जीवनशैली को प्रोत्साहित कर रही हैं। कई नगर निगम गीला-सूखा कचरा अलग करने को अनिवार्य बना चुके हैं। वहीं, स्टार्टअप्स और सामाजिक संगठन भी सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल तभी सफल होगी जब यह अभियान नहीं, बल्कि आदत बने। छोटे कदम—जैसे पानी की बर्बादी रोकना, लोकल और मौसमी चीजें खरीदना, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल—धीरे-धीरे बड़े बदलाव की नींव रख सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण अब केवल नीतियों का विषय नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी बन चुका है।
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