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Village as a Classroom: उज्ज्वला वाडेकर ने गांव को बनाया पाठशाला, बढ़ई की दुकान से गणित और गैराज से विज्ञान सीख रहे बच्चे
Digital Desk
महाराष्ट्र के जलगांव की शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर बच्चों को किताबों से बाहर निकालकर गांव के कामकाज से जोड़ रही हैं
महाराष्ट्र के जलगांव जिले में सरकारी स्कूल की शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर ने पढ़ाई का ऐसा तरीका अपनाया है, जिसमें स्कूल की चारदीवारी से बाहर पूरा गांव बच्चों के लिए क्लासरूम बन जाता है। कभी छात्र बढ़ई की दुकान पर पहुंचकर लंबाई-चौड़ाई और ज्यामिति समझते हैं, तो कभी ऑटो गैराज में मशीनों और औजारों को देखकर विज्ञान के सवालों के जवाब खोजते हैं। दर्जी की दुकान, खेत, पेट्रोल पंप और फायर स्टेशन जैसी आम जगहें भी उनकी पढ़ाई का हिस्सा बनती हैं। जिला परिषद स्कूल से जुड़ी वाडेकर तीन दशक से ज्यादा समय से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उनका जोर इस बात पर रहा है कि ग्रामीण बच्चों को केवल किताब में लिखी जानकारी याद न कराई जाए, बल्कि उन्हें यह भी दिखाया जाए कि वही गणित, विज्ञान और भाषा रोजमर्रा की जिंदगी में कहां और कैसे इस्तेमाल होती है। उनके इस प्रयोग को ‘Village as a Classroom’ यानी ‘गांव ही कक्षा’ जैसे मॉडल के रूप में पहचान मिली है।
इस तरीके में बच्चों को किसी विषय की जानकारी देने के लिए हमेशा ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तक पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मान लीजिए गणित में माप, क्षेत्रफल या ज्यामितीय आकृतियां पढ़ानी हैं। सामान्य कक्षा में शिक्षक स्केल से बोर्ड पर आकृति बनाकर समझाते हैं, लेकिन वाडेकर बच्चों को स्थानीय बढ़ई के पास ले जाती हैं। वहां छात्र देखते हैं कि लकड़ी काटने से पहले उसकी लंबाई कैसे मापी जाती है, कोण क्यों जरूरी है और छोटी-सी गणना गलत होने पर तैयार होने वाले फर्नीचर पर क्या असर पड़ सकता है। बच्चों के सामने सेंटीमीटर, मीटर, कोण और आकार अचानक किताब के अध्याय नहीं रहते। वे उन्हें वास्तविक काम में इस्तेमाल होते देखते हैं। बढ़ई के हाथ में फीता और औजार बच्चों के लिए उसी गणित का व्यावहारिक रूप बन जाते हैं जिसे वे स्कूल में पढ़ते हैं।
विज्ञान की पढ़ाई में भी आसपास की जगहों का इसी तरह इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को फायर स्टेशन ले जाकर आग बुझाने की व्यवस्था, पानी के दबाव, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया समझने का मौका मिलता है। पेट्रोल पंप पर ईंधन की माप, मशीनों की कार्यप्रणाली और सुरक्षा नियमों को देखा जा सकता है। ऑटो गैराज में इंजन, पहिए, हवा का दबाव, घर्षण, लीवर और अलग-अलग उपकरण बच्चों के सामने मौजूद होते हैं। जिस मशीन या प्रक्रिया को किताब में केवल तस्वीर के जरिए समझना मुश्किल लगता है, उसे सामने चलते हुए देखकर सवाल अपने आप निकलने लगते हैं। शिक्षक का काम यहां केवल जानकारी सुनाना नहीं रहता, बल्कि बच्चों को देखने, पूछने और चीजों के बीच संबंध समझने के लिए प्रेरित करना होता है।
ग्रामीण क्षेत्र में इस मॉडल की खासियत यह भी है कि इसके लिए हर बार महंगी स्मार्ट लैब या अत्याधुनिक उपकरण जरूरी नहीं होते। गांव में पहले से मौजूद संसाधन ही सीखने की सामग्री बन जाते हैं। खेत में मिट्टी, बीज, फसल और सिंचाई है। दर्जी के पास कपड़े की नाप और कटिंग है। मोची के काम में डिजाइन, सामग्री और माप दिखाई देता है। दुकानदार के पास जोड़-घटाव, वजन और पैसे का हिसाब है। किसान मौसम, मिट्टी और पौधों के बारे में अपने अनुभव से बहुत कुछ बता सकता है। बच्चे जब इन लोगों से सीधे बातचीत करते हैं तो उन्हें पाठ्यक्रम के साथ उस स्थानीय ज्ञान का भी अनुभव मिलता है, जो पीढ़ियों से काम के जरिए आगे बढ़ता आया है।
उज्ज्वला वाडेकर के शिक्षण प्रयोग में भाषा सीखने को भी रोजमर्रा के जीवन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। बच्चों को किसी स्थानीय कामगार से सवाल पूछना हो तो पहले यह तय करना पड़ता है कि क्या पूछें और कैसे पूछें। जवाब ध्यान से सुनना होता है, फिर उसे अपने शब्दों में बताना या लिखना पड़ता है। इस छोटी-सी गतिविधि में सुनना, बोलना, समझना और लिखना चारों कौशल साथ जुड़ जाते हैं। गांव के ऐसे बच्चे जो सामान्य कक्षा में बोलने से झिझकते हैं, बाहर निकलने पर कई बार ज्यादा सवाल पूछते हैं क्योंकि सामने मौजूद चीज उनके लिए जानी-पहचानी होती है। कोई बच्चा किसान परिवार से है तो खेती के बारे में पहले से कुछ जानता है, जबकि किसी दूसरे बच्चे ने अपने घर के आसपास बढ़ई या मैकेनिक को काम करते देखा होता है। यही परिचित माहौल बातचीत की शुरुआत आसान कर देता है।
‘Village as a Classroom’ की सोच पारंपरिक पढ़ाई को पूरी तरह हटाने की नहीं, बल्कि किताब में मौजूद जानकारी और वास्तविक दुनिया के बीच संबंध बनाने की है। स्कूल में किसी अवधारणा को पढ़ने के बाद बच्चे बाहर जाकर उसका इस्तेमाल देखते हैं। वापस कक्षा में आने पर उसी अनुभव पर चर्चा की जा सकती है। उदाहरण के लिए बढ़ई की दुकान से लौटे बच्चों से अलग-अलग वस्तुओं का माप निकालने को कहा जा सकता है। खेत देखकर लौटने वाले छात्र फसल चक्र, पानी या मिट्टी पर लिख सकते हैं। ऑटो गैराज की यात्रा के बाद मशीनों और ऊर्जा से जुड़े सवालों पर बातचीत हो सकती है। इस तरह बाहर का अनुभव अगली कक्षा के लिए सामग्री बन जाता है।
इस मॉडल का एक और पहलू बच्चों में काम और कामगारों के प्रति नजरिया बदलना है। आम तौर पर स्कूल में पेशों के बारे में अध्याय पढ़ाया जाता है, लेकिन यहां छात्र सीधे उन लोगों से मिलते हैं जो रोज अपने हाथ और कौशल से काम करते हैं। दर्जी कपड़े को नापकर आकार देता है, बढ़ई कच्ची लकड़ी से उपयोगी वस्तु बनाता है, मैकेनिक मशीन की खराबी पहचानता है और किसान मौसम तथा जमीन की स्थिति देखकर फैसले करता है। बच्चे यह समझते हैं कि इन कामों के पीछे भी गणना, अनुभव, निर्णय और तकनीकी समझ होती है। स्थानीय कामगार इस प्रक्रिया में केवल देखने की वस्तु नहीं रहते, बल्कि कुछ समय के लिए बच्चों के शिक्षक जैसी भूमिका निभाते हैं।
तीन दशक से अधिक के शिक्षण अनुभव के दौरान वाडेकर ने ग्रामीण बच्चों की जरूरतों को करीब से देखा है। ग्रामीण स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चों के आसपास सीखने के संसाधन मौजूद होते हुए भी उन्हें औपचारिक शिक्षा का हिस्सा नहीं माना जाता। खेत सिर्फ खेती की जगह समझा जाता है, दुकान केवल सामान खरीदने की जगह और गैराज वाहन ठीक कराने की जगह। इस मॉडल में इन्हीं स्थानों को अलग नजर से देखा जाता है। एक पेट्रोल पंप गणित और विज्ञान दोनों सिखा सकता है। बाजार आर्थिक समझ विकसित कर सकता है। पंचायत या डाकघर नागरिक व्यवस्था समझने का माध्यम बन सकता है। सीखने की जगह बदलते ही बच्चे का सवाल भी बदलता है—‘यह पाठ परीक्षा में आएगा?’ की जगह ‘यह मशीन काम कैसे करती है?’ जैसे सवाल सामने आने लगते हैं।
इस तरह की गतिविधियों में शिक्षक को पहले से योजना बनानी पड़ती है। बच्चों को किसी कार्यस्थल पर ले जाने से पहले सुरक्षा, अनुमति और सीखने के उद्देश्य स्पष्ट रखना जरूरी होता है। फायर स्टेशन या गैराज जैसी जगहों पर बच्चों को सुरक्षित दूरी और नियमों का पालन कराना भी अहम है। हर जगह केवल भ्रमण करा देना experiential learning नहीं बनता। वहां देखी गई चीजों को पाठ्यक्रम से जोड़ना, बच्चों से सवाल करवाना और वापस स्कूल में उस अनुभव पर काम कराना जरूरी है। वाडेकर के मॉडल की चर्चा इसी वजह से होती है कि स्थानीय जीवन को पढ़ाई के साथ व्यवस्थित रूप से जोड़ने की कोशिश की गई।
यह तरीका बच्चों के आत्मविश्वास पर भी असर डाल सकता है। जब छात्र किसी दुकानदार से खुद सवाल करता है, किसी कारीगर से प्रक्रिया समझता है या खेत में देखकर अपनी जानकारी साझा करता है तो वह केवल सुनने वाला विद्यार्थी नहीं रहता। उसकी भूमिका सक्रिय हो जाती है। उसे लगता है कि सवाल पूछना भी सीखने का हिस्सा है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों के लिए यह अनुभव खास हो सकता है, क्योंकि उनके अपने गांव और परिवार का ज्ञान भी स्कूल की पढ़ाई में जगह पाता है। घर में माता-पिता खेती या किसी हुनर से जुड़े हैं तो बच्चे पहली बार उस काम को अकादमिक विषयों के साथ जोड़कर देख सकते हैं।
उज्ज्वला वाडेकर की पहल शिक्षा से जुड़े उस पुराने सवाल को भी सामने रखती है कि बच्चे जो पढ़ रहे हैं, उसका अपनी जिंदगी से रिश्ता कितना समझ पा रहे हैं। गणित सिर्फ कॉपी में हल किए गए सवालों तक रहे तो वह कई बच्चों को मुश्किल लग सकता है, लेकिन वही गणित जब लकड़ी नापने, कपड़े की कटिंग या दुकान के हिसाब में दिखाई देता है तो उसका अर्थ बदल जाता है। विज्ञान केवल परिभाषाओं में सीमित रहने के बजाय इंजन, खेत, पानी और आग बुझाने की तकनीक में दिखाई देता है। भाषा केवल परीक्षा के उत्तर लिखने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि किसी अनजान व्यक्ति से सवाल पूछने और उसकी बात समझने का जरिया बनती है।
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महाराष्ट्र के जलगांव जिले में सरकारी स्कूल की शिक्षिका उज्ज्वला वाडेकर ने पढ़ाई का ऐसा तरीका अपनाया है, जिसमें स्कूल की चारदीवारी से बाहर पूरा गांव बच्चों के लिए क्लासरूम बन जाता है। कभी छात्र बढ़ई की दुकान पर पहुंचकर लंबाई-चौड़ाई और ज्यामिति समझते हैं, तो कभी ऑटो गैराज में मशीनों और औजारों को देखकर विज्ञान के सवालों के जवाब खोजते हैं। दर्जी की दुकान, खेत, पेट्रोल पंप और फायर स्टेशन जैसी आम जगहें भी उनकी पढ़ाई का हिस्सा बनती हैं। जिला परिषद स्कूल से जुड़ी वाडेकर तीन दशक से ज्यादा समय से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। उनका जोर इस बात पर रहा है कि ग्रामीण बच्चों को केवल किताब में लिखी जानकारी याद न कराई जाए, बल्कि उन्हें यह भी दिखाया जाए कि वही गणित, विज्ञान और भाषा रोजमर्रा की जिंदगी में कहां और कैसे इस्तेमाल होती है। उनके इस प्रयोग को ‘Village as a Classroom’ यानी ‘गांव ही कक्षा’ जैसे मॉडल के रूप में पहचान मिली है।
इस तरीके में बच्चों को किसी विषय की जानकारी देने के लिए हमेशा ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तक पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मान लीजिए गणित में माप, क्षेत्रफल या ज्यामितीय आकृतियां पढ़ानी हैं। सामान्य कक्षा में शिक्षक स्केल से बोर्ड पर आकृति बनाकर समझाते हैं, लेकिन वाडेकर बच्चों को स्थानीय बढ़ई के पास ले जाती हैं। वहां छात्र देखते हैं कि लकड़ी काटने से पहले उसकी लंबाई कैसे मापी जाती है, कोण क्यों जरूरी है और छोटी-सी गणना गलत होने पर तैयार होने वाले फर्नीचर पर क्या असर पड़ सकता है। बच्चों के सामने सेंटीमीटर, मीटर, कोण और आकार अचानक किताब के अध्याय नहीं रहते। वे उन्हें वास्तविक काम में इस्तेमाल होते देखते हैं। बढ़ई के हाथ में फीता और औजार बच्चों के लिए उसी गणित का व्यावहारिक रूप बन जाते हैं जिसे वे स्कूल में पढ़ते हैं।
विज्ञान की पढ़ाई में भी आसपास की जगहों का इसी तरह इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को फायर स्टेशन ले जाकर आग बुझाने की व्यवस्था, पानी के दबाव, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया समझने का मौका मिलता है। पेट्रोल पंप पर ईंधन की माप, मशीनों की कार्यप्रणाली और सुरक्षा नियमों को देखा जा सकता है। ऑटो गैराज में इंजन, पहिए, हवा का दबाव, घर्षण, लीवर और अलग-अलग उपकरण बच्चों के सामने मौजूद होते हैं। जिस मशीन या प्रक्रिया को किताब में केवल तस्वीर के जरिए समझना मुश्किल लगता है, उसे सामने चलते हुए देखकर सवाल अपने आप निकलने लगते हैं। शिक्षक का काम यहां केवल जानकारी सुनाना नहीं रहता, बल्कि बच्चों को देखने, पूछने और चीजों के बीच संबंध समझने के लिए प्रेरित करना होता है।
ग्रामीण क्षेत्र में इस मॉडल की खासियत यह भी है कि इसके लिए हर बार महंगी स्मार्ट लैब या अत्याधुनिक उपकरण जरूरी नहीं होते। गांव में पहले से मौजूद संसाधन ही सीखने की सामग्री बन जाते हैं। खेत में मिट्टी, बीज, फसल और सिंचाई है। दर्जी के पास कपड़े की नाप और कटिंग है। मोची के काम में डिजाइन, सामग्री और माप दिखाई देता है। दुकानदार के पास जोड़-घटाव, वजन और पैसे का हिसाब है। किसान मौसम, मिट्टी और पौधों के बारे में अपने अनुभव से बहुत कुछ बता सकता है। बच्चे जब इन लोगों से सीधे बातचीत करते हैं तो उन्हें पाठ्यक्रम के साथ उस स्थानीय ज्ञान का भी अनुभव मिलता है, जो पीढ़ियों से काम के जरिए आगे बढ़ता आया है।
उज्ज्वला वाडेकर के शिक्षण प्रयोग में भाषा सीखने को भी रोजमर्रा के जीवन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। बच्चों को किसी स्थानीय कामगार से सवाल पूछना हो तो पहले यह तय करना पड़ता है कि क्या पूछें और कैसे पूछें। जवाब ध्यान से सुनना होता है, फिर उसे अपने शब्दों में बताना या लिखना पड़ता है। इस छोटी-सी गतिविधि में सुनना, बोलना, समझना और लिखना चारों कौशल साथ जुड़ जाते हैं। गांव के ऐसे बच्चे जो सामान्य कक्षा में बोलने से झिझकते हैं, बाहर निकलने पर कई बार ज्यादा सवाल पूछते हैं क्योंकि सामने मौजूद चीज उनके लिए जानी-पहचानी होती है। कोई बच्चा किसान परिवार से है तो खेती के बारे में पहले से कुछ जानता है, जबकि किसी दूसरे बच्चे ने अपने घर के आसपास बढ़ई या मैकेनिक को काम करते देखा होता है। यही परिचित माहौल बातचीत की शुरुआत आसान कर देता है।
‘Village as a Classroom’ की सोच पारंपरिक पढ़ाई को पूरी तरह हटाने की नहीं, बल्कि किताब में मौजूद जानकारी और वास्तविक दुनिया के बीच संबंध बनाने की है। स्कूल में किसी अवधारणा को पढ़ने के बाद बच्चे बाहर जाकर उसका इस्तेमाल देखते हैं। वापस कक्षा में आने पर उसी अनुभव पर चर्चा की जा सकती है। उदाहरण के लिए बढ़ई की दुकान से लौटे बच्चों से अलग-अलग वस्तुओं का माप निकालने को कहा जा सकता है। खेत देखकर लौटने वाले छात्र फसल चक्र, पानी या मिट्टी पर लिख सकते हैं। ऑटो गैराज की यात्रा के बाद मशीनों और ऊर्जा से जुड़े सवालों पर बातचीत हो सकती है। इस तरह बाहर का अनुभव अगली कक्षा के लिए सामग्री बन जाता है।
इस मॉडल का एक और पहलू बच्चों में काम और कामगारों के प्रति नजरिया बदलना है। आम तौर पर स्कूल में पेशों के बारे में अध्याय पढ़ाया जाता है, लेकिन यहां छात्र सीधे उन लोगों से मिलते हैं जो रोज अपने हाथ और कौशल से काम करते हैं। दर्जी कपड़े को नापकर आकार देता है, बढ़ई कच्ची लकड़ी से उपयोगी वस्तु बनाता है, मैकेनिक मशीन की खराबी पहचानता है और किसान मौसम तथा जमीन की स्थिति देखकर फैसले करता है। बच्चे यह समझते हैं कि इन कामों के पीछे भी गणना, अनुभव, निर्णय और तकनीकी समझ होती है। स्थानीय कामगार इस प्रक्रिया में केवल देखने की वस्तु नहीं रहते, बल्कि कुछ समय के लिए बच्चों के शिक्षक जैसी भूमिका निभाते हैं।
तीन दशक से अधिक के शिक्षण अनुभव के दौरान वाडेकर ने ग्रामीण बच्चों की जरूरतों को करीब से देखा है। ग्रामीण स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चों के आसपास सीखने के संसाधन मौजूद होते हुए भी उन्हें औपचारिक शिक्षा का हिस्सा नहीं माना जाता। खेत सिर्फ खेती की जगह समझा जाता है, दुकान केवल सामान खरीदने की जगह और गैराज वाहन ठीक कराने की जगह। इस मॉडल में इन्हीं स्थानों को अलग नजर से देखा जाता है। एक पेट्रोल पंप गणित और विज्ञान दोनों सिखा सकता है। बाजार आर्थिक समझ विकसित कर सकता है। पंचायत या डाकघर नागरिक व्यवस्था समझने का माध्यम बन सकता है। सीखने की जगह बदलते ही बच्चे का सवाल भी बदलता है—‘यह पाठ परीक्षा में आएगा?’ की जगह ‘यह मशीन काम कैसे करती है?’ जैसे सवाल सामने आने लगते हैं।
इस तरह की गतिविधियों में शिक्षक को पहले से योजना बनानी पड़ती है। बच्चों को किसी कार्यस्थल पर ले जाने से पहले सुरक्षा, अनुमति और सीखने के उद्देश्य स्पष्ट रखना जरूरी होता है। फायर स्टेशन या गैराज जैसी जगहों पर बच्चों को सुरक्षित दूरी और नियमों का पालन कराना भी अहम है। हर जगह केवल भ्रमण करा देना experiential learning नहीं बनता। वहां देखी गई चीजों को पाठ्यक्रम से जोड़ना, बच्चों से सवाल करवाना और वापस स्कूल में उस अनुभव पर काम कराना जरूरी है। वाडेकर के मॉडल की चर्चा इसी वजह से होती है कि स्थानीय जीवन को पढ़ाई के साथ व्यवस्थित रूप से जोड़ने की कोशिश की गई।
यह तरीका बच्चों के आत्मविश्वास पर भी असर डाल सकता है। जब छात्र किसी दुकानदार से खुद सवाल करता है, किसी कारीगर से प्रक्रिया समझता है या खेत में देखकर अपनी जानकारी साझा करता है तो वह केवल सुनने वाला विद्यार्थी नहीं रहता। उसकी भूमिका सक्रिय हो जाती है। उसे लगता है कि सवाल पूछना भी सीखने का हिस्सा है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों के लिए यह अनुभव खास हो सकता है, क्योंकि उनके अपने गांव और परिवार का ज्ञान भी स्कूल की पढ़ाई में जगह पाता है। घर में माता-पिता खेती या किसी हुनर से जुड़े हैं तो बच्चे पहली बार उस काम को अकादमिक विषयों के साथ जोड़कर देख सकते हैं।
उज्ज्वला वाडेकर की पहल शिक्षा से जुड़े उस पुराने सवाल को भी सामने रखती है कि बच्चे जो पढ़ रहे हैं, उसका अपनी जिंदगी से रिश्ता कितना समझ पा रहे हैं। गणित सिर्फ कॉपी में हल किए गए सवालों तक रहे तो वह कई बच्चों को मुश्किल लग सकता है, लेकिन वही गणित जब लकड़ी नापने, कपड़े की कटिंग या दुकान के हिसाब में दिखाई देता है तो उसका अर्थ बदल जाता है। विज्ञान केवल परिभाषाओं में सीमित रहने के बजाय इंजन, खेत, पानी और आग बुझाने की तकनीक में दिखाई देता है। भाषा केवल परीक्षा के उत्तर लिखने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि किसी अनजान व्यक्ति से सवाल पूछने और उसकी बात समझने का जरिया बनती है।
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