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GGU में साहित्यकार के अपमान पर उबाल: कुलपति को हटाने की मांग, राष्ट्रपति के नाम सौंपा गया ज्ञापन
बिलासपुर (छ.ग.)
राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान अतिथि लेखक को मंच से अपमानित करने का आरोप, बिलासपुर सहित देशभर के साहित्यकारों में आक्रोश
बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में आयोजित एक राष्ट्रीय साहित्यिक परिसंवाद के दौरान कथित तौर पर एक वरिष्ठ साहित्यकार के अपमान का मामला अब प्रदेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। घटना के विरोध में बिलासपुर के साहित्यकारों, कथाकारों, लेखकों और प्रबुद्ध नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया और विश्वविद्यालय के कुलपति को पद से हटाने की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने कलेक्टर के माध्यम से राज्यपाल और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर पूरे मामले में हस्तक्षेप और कार्रवाई की मांग की है।
मामला 7 जनवरी का है, जब गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में “समकालीन हिंदी कहानी” विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से साहित्यकारों और शिक्षाविदों को आमंत्रित किया गया था। आरोप है कि कार्यक्रम के दौरान कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल का व्यवहार आमंत्रित अतिथियों के प्रति असंयमित और अपमानजनक रहा, जिससे कार्यक्रम की गरिमा प्रभावित हुई।
प्रत्यक्षदर्शी साहित्यकारों के अनुसार, परिसंवाद के दौरान कुलपति ने विषय से इतर अपने व्यक्तिगत जीवन और अनुभवों पर लंबा वक्तव्य देना शुरू किया। इसी दौरान एक अतिथि कथाकार ने शालीन तरीके से विषय पर चर्चा आगे बढ़ाने का सुझाव दिया। आरोप है कि इस टिप्पणी से कुलपति असहज हो गए और उन्होंने मंच से ही लेखक से तीखे लहजे में सवाल-जवाब किए। इसके बाद कथित तौर पर लेखक को सभा छोड़ने के लिए कहा गया, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।
इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद साहित्य जगत में नाराजगी फैल गई। बिलासपुर के साहित्यकारों का कहना है कि विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थान में विचारों की स्वतंत्रता और संवाद की संस्कृति होनी चाहिए, न कि पद के दंभ में किसी लेखक को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे साहित्य समाज का अपमान है और इससे बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान को ठेस पहुंची है।
ज्ञापन सौंपने पहुंचे लेखकों और बुद्धिजीवियों ने मांग की कि कुलपति के आचरण की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और उन्हें पद से हटाया जाए। उनका कहना है कि इस घटना से विश्वविद्यालय की छवि राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल हुई है। कई साहित्यकारों ने इसे अकादमिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया।
इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई औपचारिक विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक प्रशासन पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजने की तैयारी कर रहा है।
साहित्यकारों ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। उनका कहना है कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि शैक्षणिक और साहित्यिक गरिमा की रक्षा के लिए है।
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