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बिजली हादसों पर हाईकोर्ट सख्त: पूछा- जनता की सुरक्षा कागजों में रहेगी या जमीन पर दिखेगी?
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आकाशीय बिजली, नंगे तारों और करंट से हो रही लगातार मौतों पर राज्य सरकार और बिजली कंपनी से जवाब मांगा। कोर्ट ने पूछा कि सुरक्षा के लिए केवल आदेश जारी होंगे या फील्ड में भी ठोस बदलाव दिखाई देंगे।
छत्तीसगढ़ में आकाशीय बिजली, नंगे बिजली के तारों और खेतों तथा बाड़ों में अवैध रूप से दौड़ाए जा रहे करंट के कारण लगातार हो रही मौतों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीडीसीएल) से कई अहम सवाल पूछे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता की सुरक्षा केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसका असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
जनहित याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए जारी किए जा रहे दिशा-निर्देशों और योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन किस स्तर तक हुआ है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि बिजली हादसों को रोकने के लिए तैयार किए जा रहे स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) की वर्तमान स्थिति क्या है और इसे लागू करने की दिशा में अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव और सीएसपीडीसीएल के प्रबंध निदेशक ने अदालत में शपथ पत्र प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया कि बिजली सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से 20 जुलाई 2026 को एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में बिजली कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य के इलेक्ट्रिकल इंस्पेक्टर को भी शामिल किया गया है। समिति का मुख्य उद्देश्य बिजली सुरक्षा से जुड़ा व्यापक एसओपी तैयार करना और सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।
हालांकि सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया। अदालत को बताया गया कि छत्तीसगढ़ स्टेट इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड-2011 के क्लॉज 5.35 के तहत पहले नए लो-टेंशन बिजली कनेक्शन या वायरिंग पूरी होने के बाद लाइसेंसी ठेकेदार की टेस्ट रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य था। लेकिन 2 मार्च 2026 को जारी आदेश के माध्यम से इस अनिवार्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। इस जानकारी पर अदालत ने भी गंभीरता दिखाई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी।
शपथ पत्र में यह भी बताया गया कि राज्य में करंट से होने वाली अधिकांश दुर्घटनाएं बिना सुरक्षा मानकों का पालन किए किए जा रहे निर्माण कार्यों और खेतों या बाड़ों की फेंसिंग में अवैध रूप से बिजली प्रवाहित करने के कारण होती हैं। ऐसे मामलों में लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है और कई बार गंभीर हादसे सामने आते हैं।
बिजली कंपनी ने अदालत को जानकारी दी कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी सेफ्टी रेगुलेशन-2023 और विद्युत अधिनियम-2003 के प्रावधानों के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों और क्षेत्रीय अपर मुख्य अभियंताओं को इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑफिसर नियुक्त किया गया है। इन अधिकारियों की जिम्मेदारी सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना और बिजली संबंधी जोखिमों को कम करना है।
इसके अलावा कंपनी ने बताया कि बिजली चोरी और अवैध हुकिंग रोकने के साथ-साथ सुरक्षित बिजली उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर कार्यशालाएं आयोजित कर लोगों को बिजली सुरक्षा के नियमों की जानकारी भी दी जा रही है।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन दावों पर संतोष व्यक्त करने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल सर्कुलर जारी करना, समितियां बनाना या योजनाएं तैयार करना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि वास्तविक परिणाम तभी माने जाएंगे जब सुरक्षा उपायों का असर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा और बिजली हादसों में कमी आएगी।
डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और बिजली कंपनी को निर्देश दिया कि 18 अगस्त तक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। रिपोर्ट में बताया जाए कि उच्चस्तरीय समिति ने अब तक क्या कार्य किए हैं, एसओपी तैयार करने की प्रक्रिया किस चरण में है और सुरक्षा मानकों को लागू करने के लिए कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठाए गए हैं।
अदालत ने यह भी पूछा कि बिजली के बुनियादी ढांचे की नियमित जांच, मरम्मत और रखरखाव के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा कि नंगे तारों, खराब लाइनों और अन्य जोखिम वाले स्थानों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाने के लिए क्या कार्रवाई की जा रही है।
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बिजली हादसों पर हाईकोर्ट सख्त: पूछा- जनता की सुरक्षा कागजों में रहेगी या जमीन पर दिखेगी?
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में आकाशीय बिजली, नंगे बिजली के तारों और खेतों तथा बाड़ों में अवैध रूप से दौड़ाए जा रहे करंट के कारण लगातार हो रही मौतों को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (सीएसपीडीसीएल) से कई अहम सवाल पूछे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जनता की सुरक्षा केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसका असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।
जनहित याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए जारी किए जा रहे दिशा-निर्देशों और योजनाओं का वास्तविक क्रियान्वयन किस स्तर तक हुआ है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि बिजली हादसों को रोकने के लिए तैयार किए जा रहे स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) की वर्तमान स्थिति क्या है और इसे लागू करने की दिशा में अब तक कौन-कौन से ठोस कदम उठाए गए हैं।
सुनवाई के दौरान ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव और सीएसपीडीसीएल के प्रबंध निदेशक ने अदालत में शपथ पत्र प्रस्तुत किया। इसमें बताया गया कि बिजली सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से 20 जुलाई 2026 को एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में बिजली कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य के इलेक्ट्रिकल इंस्पेक्टर को भी शामिल किया गया है। समिति का मुख्य उद्देश्य बिजली सुरक्षा से जुड़ा व्यापक एसओपी तैयार करना और सुरक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।
हालांकि सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने आया। अदालत को बताया गया कि छत्तीसगढ़ स्टेट इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड-2011 के क्लॉज 5.35 के तहत पहले नए लो-टेंशन बिजली कनेक्शन या वायरिंग पूरी होने के बाद लाइसेंसी ठेकेदार की टेस्ट रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य था। लेकिन 2 मार्च 2026 को जारी आदेश के माध्यम से इस अनिवार्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। इस जानकारी पर अदालत ने भी गंभीरता दिखाई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी।
शपथ पत्र में यह भी बताया गया कि राज्य में करंट से होने वाली अधिकांश दुर्घटनाएं बिना सुरक्षा मानकों का पालन किए किए जा रहे निर्माण कार्यों और खेतों या बाड़ों की फेंसिंग में अवैध रूप से बिजली प्रवाहित करने के कारण होती हैं। ऐसे मामलों में लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है और कई बार गंभीर हादसे सामने आते हैं।
बिजली कंपनी ने अदालत को जानकारी दी कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी सेफ्टी रेगुलेशन-2023 और विद्युत अधिनियम-2003 के प्रावधानों के अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों और क्षेत्रीय अपर मुख्य अभियंताओं को इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑफिसर नियुक्त किया गया है। इन अधिकारियों की जिम्मेदारी सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना और बिजली संबंधी जोखिमों को कम करना है।
इसके अलावा कंपनी ने बताया कि बिजली चोरी और अवैध हुकिंग रोकने के साथ-साथ सुरक्षित बिजली उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। विभिन्न स्थानों पर कार्यशालाएं आयोजित कर लोगों को बिजली सुरक्षा के नियमों की जानकारी भी दी जा रही है।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन दावों पर संतोष व्यक्त करने के बजाय स्पष्ट कहा कि केवल सर्कुलर जारी करना, समितियां बनाना या योजनाएं तैयार करना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने कहा कि वास्तविक परिणाम तभी माने जाएंगे जब सुरक्षा उपायों का असर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा और बिजली हादसों में कमी आएगी।
डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार और बिजली कंपनी को निर्देश दिया कि 18 अगस्त तक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। रिपोर्ट में बताया जाए कि उच्चस्तरीय समिति ने अब तक क्या कार्य किए हैं, एसओपी तैयार करने की प्रक्रिया किस चरण में है और सुरक्षा मानकों को लागू करने के लिए कौन-कौन से व्यावहारिक कदम उठाए गए हैं।
अदालत ने यह भी पूछा कि बिजली के बुनियादी ढांचे की नियमित जांच, मरम्मत और रखरखाव के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा कि नंगे तारों, खराब लाइनों और अन्य जोखिम वाले स्थानों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित बनाने के लिए क्या कार्रवाई की जा रही है।
