CSVTU में पीएचडी फीस घोटाले का खुलासा: शोधार्थियों से वसूले गए 9.44 लाख, फर्जी रसीदें थमाने का आरोप

दुर्ग-भिलाई (छ.ग.)

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पीएचडी सब्मिशन के नाम पर 30 छात्रों से ली गई 30-30 हजार की राशि, कनिष्ठ सलाहकार पर नेवई थाने में FIR

छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (CSVTU), भिलाई में पीएचडी पाठ्यक्रम से जुड़ा एक गंभीर वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थियों से सब्मिशन फीस के नाम पर वसूली गई राशि को संस्थान के खाते में जमा न कर व्यक्तिगत स्तर पर गबन किए जाने का आरोप लगा है। इस मामले में पीएचडी शाखा में पदस्थ कनिष्ठ सलाहकार सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ नेवई थाना पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि वर्ष 2024–25 के दौरान पीएचडी सब्मिशन प्रक्रिया के तहत करीब 30 शोधार्थियों से प्रति छात्र 30 हजार रुपये की दर से फीस ली गई। आरोप है कि छात्रों को विश्वविद्यालय की ओर से जारी की गई बताकर जो रसीदें दी गईं, वे फर्जी थीं और संबंधित राशि विश्वविद्यालय के आधिकारिक खाते में जमा ही नहीं की गई। अब तक जांच में 9 लाख 44 हजार 500 रुपये के गबन की पुष्टि हुई है।

मामले का खुलासा तब हुआ, जब कई शोधार्थियों ने नई नियुक्त कुलपति से व्यक्तिगत रूप से शिकायत की। छात्रों का कहना था कि उन्होंने नियमानुसार फीस जमा की, लेकिन बाद में विश्वविद्यालय रिकॉर्ड में उनकी राशि दर्ज नहीं पाई गई। शिकायतों की संख्या बढ़ने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आंतरिक जांच का निर्णय लिया।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने दो सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसने दस्तावेजों, रसीदों और बैंक लेन-देन की जांच की। समिति की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि छात्रों को दी गई कई रसीदें विश्वविद्यालय के अधिकृत सिस्टम से जारी नहीं की गई थीं। कुछ मामलों में छात्रों से नकद राशि ली गई, जबकि कुछ शोधार्थियों से फीस सीधे आरोपी के निजी बैंक खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर करवाई गई।

सीएसवीटीयू के कुलपति डॉ. अंकित अरोरा ने बताया कि पीएचडी सब्मिशन फीस की निर्धारित प्रक्रिया है और यह राशि सीधे विश्वविद्यालय के खाते में जमा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक जांच में करीब 10 लाख रुपये के गबन के संकेत मिले हैं और आगे की जांच में यह राशि बढ़ भी सकती है। विश्वविद्यालय इस पूरे प्रकरण में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगा।

जांच के दौरान सुनील कुमार प्रसाद ने लिखित बयान में दावा किया कि वह शोधार्थियों से प्राप्त राशि तत्कालीन प्रभारी कुलसचिव को सौंप देता था और उसके बदले रसीदें दी जाती थीं। हालांकि, वह अपने इस दावे के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। जांच समिति ने उसके बयान को असंतोषजनक माना है।

22 जनवरी 2026 को आयोजित विश्वविद्यालय की कार्य परिषद की बैठक में सर्वसम्मति से आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का निर्णय लिया गया। इसके बाद प्रभारी कुलसचिव द्वारा 27 जनवरी को नेवई थाना पुलिस को औपचारिक शिकायत सौंपी गई। पुलिस अधिकारियों ने विश्वविद्यालय पहुंचकर दस्तावेजों की जांच की और संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए।

नेवई थाना पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है। यदि जांच के दौरान अन्य कर्मचारियों या अधिकारियों की भूमिका सामने आती है, तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह मामला विश्वविद्यालयों में वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

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