दिल्ली हाईकोर्ट ने SEBI नियमों में ‘ब्लाइंड स्पॉट’ पर जताई चिंता, Pakka Ltd के शेयरों में अस्थिरता से बढ़ा अलार्म

डिजिटल डेस्क

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Pakka Limited में संदिग्ध ट्रेडिंग पैटर्न और CFO के कथित गैर-प्रकटीकरण पर कोर्ट ने बाजार नियामक को नियमों की समीक्षा का निर्देश दिया

नई दिल्ली — कॉरपोरेट पारदर्शिता की मौजूदा स्थिति पर कड़ी टिप्पणी करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाजार नियामक SEBI को वरिष्ठ अधिकारियों के लिए प्रकटीकरण (डिस्क्लोज़र) ढांचे की समीक्षा और उसमें सुधार करने का निर्देश दिया है। यह हस्तक्षेप Pakka Limited (NSE: PAKKA) में “चिंताजनक” ट्रेडिंग पैटर्न और कंपनी की मुख्य वित्त अधिकारी (CFO) नीतिका सूर्यवंशी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के कथित गैर-प्रकटीकरण को उजागर करने वाली याचिका के बाद आया है।
22 जनवरी 2026 को पारित आदेश में अदालत ने SEBI को वस्तुतः नोटिस देते हुए यह जांच करने को कहा है कि क्या मौजूदा कानून “की मैनेजरियल पर्सनल” (KMPs) को अपने पूर्व कानूनी मामलों को खुदरा निवेशकों से छिपाने की अनुमति देते हैं।

‘Pakka’ सहसंबंध: कार्यकारी आवागमन बनाम मार्केट कैप
न्यायिक जांच का केंद्र उस “निरंतर पैटर्न” पर है, जिसे याचिकाकर्ता ने कार्यकारी अधिकारियों के आने-जाने और कंपनी के शेयर प्रदर्शन के बीच संबंध के रूप में प्रस्तुत किया है।
Pakka Ltd की CFO नीतिका सूर्यवंशी 2019 से 2025 के बीच तीन अलग-अलग कार्यकालों में कंपनी से जुड़ी रहीं। अदालत के समक्ष प्रस्तुत बाजार आंकड़े एक स्पष्ट सहसंबंध दिखाते हैं

तेजी: 2020 में Pakka का शेयर लगभग ₹20 पर कारोबार कर रहा था। 2024-25 की अवधि में—जो सूर्यवंशी के कार्यकाल से मेल खाती है—यह 375 के उच्च स्तर तक पहुंच गया।

सुधार/गिरावट: मार्च 2025 में उनकी नवीनतम पुनर्नियुक्ति के बाद शेयर ₹240 तक गया, फिर गिरकर वर्तमान में ₹80–₹88 के स्तर पर आ गया।

हालांकि अदालत ने बाजार में हेरफेर के आरोपों पर तटस्थ रुख अपनाया, लेकिन उसने कहा कि ऐसे “अस्पष्ट उतार-चढ़ाव” और प्रकटीकरण में खामियां गंभीर नियामकीय चेतावनी संकेत हैं।

आपराधिक कार्यवाहियां और पेशेवर आचरण पर सवाल
बाजार अस्थिरता से आगे बढ़ते हुए, याचिका ने Pakka Ltd के नेतृत्व की सत्यनिष्ठा पर भी गंभीर प्रश्न उठाए। अदालत को बताया गया कि नीतिका सूर्यवंशी भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत कई आपराधिक मामलों का सामना कर रही हैं और फिलहाल जमानत पर हैं।

महत्वपूर्ण यह कि ये तथ्य—साथ ही इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (ICAI) के समक्ष ICAI अधिनियम की अनुसूची  और  के तहत लंबित शिकायतें—कथित तौर पर उनकी नियुक्तियों के दौरान शेयरधारकों को कभी प्रकट नहीं की गईं।

‘नियामकीय ब्लाइंड स्पॉट’
मौजूदा SEBI (LODR) विनियमों के तहत कंपनियों पर केवल उन्हीं आपराधिक मामलों के प्रकटीकरण की बाध्यता है जो किसी अधिकारी के वर्तमान कार्यकाल के दौरान उत्पन्न हों। याचिकाकर्ता ने दलील दी—और अदालत ने भी संकेत दिया—कि इससे एक “ब्लाइंड स्पॉट” बनता है, जहां किसी कार्यकारी का पूर्व आपराधिक इतिहास या पेशेवर कदाचार छिपा रह जाता है, जबकि वे सार्वजनिक धन से जुड़े अहम पद संभालते हैं।

पीठ ने अपने ratio decidendi में कहा, “उठाए गए मुद्दे नियामकीय प्रकृति के हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। निवेशक संरक्षण को तकनीकी खामियों की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता।”
हाईकोर्ट के निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने SEBI को निम्नलिखित करने का निर्देश दिया है:

प्रकटीकरण की पर्याप्तता की जांच: यह निर्धारित करना कि क्या मौजूदा मानदंड कानूनी/नियामकीय इतिहास वाले अधिकारियों के सूचीबद्ध कंपनियों में पदभार ग्रहण करने पर निवेशकों की पर्याप्त सुरक्षा करते हैं।

सुधारात्मक कार्रवाई: Pakka Limited के ट्रेडिंग पैटर्न और CFO नीतिका सूर्यवंशी व CEO यश पक्का की भूमिकाओं की समीक्षा।

नीतिगत सुधार: KMPs के लिए नए दिशानिर्देशों पर विचार, ताकि “वर्तमान आचरण” की तरह “पूर्व इतिहास” भी पारदर्शी हो।

अदालत ने याचिकाकर्ता को SEBI की समीक्षा पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। Pakka Ltd और उसके नेतृत्व के लिए यह आदेश एक उच्च-दांव वाली नियामकीय जांच की शुरुआत है, जो भारत में कॉरपोरेट जवाबदेही की परिभाषा को नया रूप दे सकती है।

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