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CGMSC रिएजेंट मामले में मोक्षित कॉर्पोरेशन को झटका, हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
छत्तीसगढ़
161 करोड़ के रिएजेंट खराब होने के मामले में एफआईआर और चार्जशीट रद्द करने से इनकार, अदालत ने कहा- गंभीर आर्थिक अपराध की होगी ट्रायल में सुनवाई
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) से जुड़े चर्चित रिएजेंट खरीद मामले में मोक्षित कॉर्पोरेशन के निदेशक शशांक चोपड़ा को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एफआईआर, चार्जशीट और उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को समाप्त करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल किसी कारोबारी अनुबंध या भुगतान विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितता, भ्रष्टाचार, मिलीभगत और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। ऐसे मामलों में साक्ष्यों की जांच और तथ्यों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में ही किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसे कई आरोप हैं, जिनकी गहन जांच और न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। अदालत ने माना कि इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करना उचित नहीं होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि मामले में लगाए गए आरोपों की सत्यता या असत्यता का फैसला साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ही करेगा।
पूरा मामला वर्ष 2022 में शुरू हुई हमर लैब योजना से जुड़ा है। इस योजना के तहत राज्य के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में जांच सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से रिएजेंट और मेडिकल उपकरणों की खरीद की गई थी। बाद में जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि निविदा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं और टेंडर की शर्तें इस प्रकार तैयार की गईं कि एक विशेष कंपनी को लाभ मिल सके। जांच में यह भी दावा किया गया कि वास्तविक आवश्यकता और उपलब्ध संसाधनों का समुचित आकलन किए बिना बड़ी मात्रा में रिएजेंट की खरीद कर ली गई।
जांच एजेंसियों के अनुसार, करीब 314 करोड़ रुपये मूल्य के रिएजेंट खरीदे गए थे, लेकिन कई अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में उन्हें सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेशन सिस्टम, यूपीएस और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसके कारण लगभग 161 करोड़ रुपये मूल्य के रिएजेंट उपयोग में आने से पहले ही एक्सपायर हो गए। आरोप है कि इससे सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा और सार्वजनिक धन का प्रभावी उपयोग नहीं हो सका।
याचिकाकर्ता शशांक चोपड़ा की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पूरा विवाद मूल रूप से व्यावसायिक अनुबंध और भुगतान से जुड़ा है। उनका पक्ष था कि कंपनी ने अनुबंध के अनुसार सभी आपूर्ति समय पर पूरी की, लेकिन इसके बदले अब भी सैकड़ों करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी ने जीएसटी और आयकर के रूप में सरकार को बड़ी राशि जमा कराई है, इसलिए अवैध आर्थिक लाभ लेने का आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि कंपनी ने समय-समय पर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक भंडारण सुविधाओं की कमी और रिएजेंट खराब होने की आशंका से अवगत कराया था।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि मामला केवल भुगतान विवाद नहीं है। सरकारी पक्ष का कहना था कि जांच में टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर, आपसी मिलीभगत, भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े गंभीर तथ्य सामने आए हैं। सरकार ने अदालत से कहा कि इस प्रकार के आर्थिक अपराधों की जांच और साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान ही संभव है और शुरुआती चरण में कार्यवाही समाप्त करना न्यायहित में नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने भी इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक धन से जुड़ी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी मामले में आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार या सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं, तो उनका परीक्षण विधि के अनुसार नियमित सुनवाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
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CGMSC रिएजेंट मामले में मोक्षित कॉर्पोरेशन को झटका, हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) से जुड़े चर्चित रिएजेंट खरीद मामले में मोक्षित कॉर्पोरेशन के निदेशक शशांक चोपड़ा को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एफआईआर, चार्जशीट और उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को समाप्त करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल किसी कारोबारी अनुबंध या भुगतान विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितता, भ्रष्टाचार, मिलीभगत और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। ऐसे मामलों में साक्ष्यों की जांच और तथ्यों का परीक्षण ट्रायल कोर्ट में ही किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों में ऐसे कई आरोप हैं, जिनकी गहन जांच और न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। अदालत ने माना कि इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करना उचित नहीं होगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि मामले में लगाए गए आरोपों की सत्यता या असत्यता का फैसला साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ही करेगा।
पूरा मामला वर्ष 2022 में शुरू हुई हमर लैब योजना से जुड़ा है। इस योजना के तहत राज्य के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में जांच सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से रिएजेंट और मेडिकल उपकरणों की खरीद की गई थी। बाद में जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि निविदा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं और टेंडर की शर्तें इस प्रकार तैयार की गईं कि एक विशेष कंपनी को लाभ मिल सके। जांच में यह भी दावा किया गया कि वास्तविक आवश्यकता और उपलब्ध संसाधनों का समुचित आकलन किए बिना बड़ी मात्रा में रिएजेंट की खरीद कर ली गई।
जांच एजेंसियों के अनुसार, करीब 314 करोड़ रुपये मूल्य के रिएजेंट खरीदे गए थे, लेकिन कई अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में उन्हें सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेशन सिस्टम, यूपीएस और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। इसके कारण लगभग 161 करोड़ रुपये मूल्य के रिएजेंट उपयोग में आने से पहले ही एक्सपायर हो गए। आरोप है कि इससे सरकारी खजाने को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा और सार्वजनिक धन का प्रभावी उपयोग नहीं हो सका।
याचिकाकर्ता शशांक चोपड़ा की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पूरा विवाद मूल रूप से व्यावसायिक अनुबंध और भुगतान से जुड़ा है। उनका पक्ष था कि कंपनी ने अनुबंध के अनुसार सभी आपूर्ति समय पर पूरी की, लेकिन इसके बदले अब भी सैकड़ों करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है। उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी ने जीएसटी और आयकर के रूप में सरकार को बड़ी राशि जमा कराई है, इसलिए अवैध आर्थिक लाभ लेने का आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि कंपनी ने समय-समय पर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक भंडारण सुविधाओं की कमी और रिएजेंट खराब होने की आशंका से अवगत कराया था।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि मामला केवल भुगतान विवाद नहीं है। सरकारी पक्ष का कहना था कि जांच में टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर, आपसी मिलीभगत, भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े गंभीर तथ्य सामने आए हैं। सरकार ने अदालत से कहा कि इस प्रकार के आर्थिक अपराधों की जांच और साक्ष्यों का मूल्यांकन ट्रायल के दौरान ही संभव है और शुरुआती चरण में कार्यवाही समाप्त करना न्यायहित में नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने भी इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक धन से जुड़ी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी मामले में आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार या सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए हैं, तो उनका परीक्षण विधि के अनुसार नियमित सुनवाई के माध्यम से किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर और चार्जशीट को रद्द करने की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
