रायपुर की फिज़ाओं में दिखा अबाबील का अद्भुत संसार: हवा में सोने-खाने वाला पक्षी महानदी नहर के पुल के नीचे बसा

रायपुर (छ.ग.)

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हजारों किलोमीटर की उड़ान के बाद रायपुर पहुंचा प्रवासी पक्षी, यूरोप या हिमाचल से आने की संभावना; आरंग क्षेत्र में झुंडों ने बनाया स्थायी बसेरा

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों एक अनोखे प्राकृतिक दृश्य की गवाह बन रही है। हवा में उड़ते-उड़ते खाना, पीना और यहां तक कि सोने की क्षमता रखने वाला अबाबील पक्षी हजारों की संख्या में रायपुर जिले के आरंग क्षेत्र में देखा जा रहा है। इन प्रवासी पक्षियों ने आरंग के कुकरा गांव में महानदी मुख्य नहर पर बने पुल के नीचे अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। सुबह-शाम इनके विशाल झुंड आसमान में एक साथ उड़ान भरते नजर आ रहे हैं, जो स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल और आकर्षण का विषय बन गया है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से पुल के नीचे सैकड़ों छोटे-छोटे घोंसले दिखाई देने लगे हैं। सुबह होते ही हजारों अबाबील एक साथ अपने बसेरे से निकलते हैं और सूर्यास्त से पहले उसी स्थान पर लौट आते हैं। इस दौरान वे छोटे-छोटे समूहों में भी बंट जाते हैं, जिससे पूरा आसमान मानो जीवंत हो उठता है। कई लोग इस दृश्य को मोबाइल कैमरों में कैद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं।

प्रकृति और पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक, अबाबील एक अत्यंत विशिष्ट प्रवासी पक्षी है, जिसे स्विफ्ट या स्वेलो भी कहा जाता है। यह पक्षी अपनी असाधारण उड़ान क्षमता के लिए जाना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अबाबील लगभग 10 महीने तक लगातार उड़ान में रह सकती है। यह उड़ते-उड़ते ही कीड़े-मकोड़े खा लेती है, बादलों की नमी या वर्षा की बूंदों से पानी पी लेती है और हवा में ही विश्राम व नींद पूरी कर लेती है।

बर्ड एक्सपर्ट्स का मानना है कि रायपुर पहुंचे ये अबाबील संभवतः यूरोप या भारत के हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे क्षेत्रों से यहां आए हैं। मौसम परिवर्तन और अनुकूल पर्यावरण के चलते छत्तीसगढ़ इनके लिए अस्थायी या स्थायी प्रवास स्थल बनता जा रहा है। पुल, ओवरब्रिज और ऊंची इमारतों के नीचे सामूहिक घोंसले बनाना इस प्रजाति की खास पहचान है। एक ही स्थान पर सैकड़ों घोंसलों की कॉलोनी विकसित होना इनके सामाजिक जीवन का उदाहरण है।

अबाबील आकार में भले ही गौरैया के समान होती है, लेकिन इसकी शारीरिक बनावट इसे अत्यंत दक्ष शिकारी बनाती है। इसके लंबे, नुकीले पंख, दो भागों में बंटी पूंछ और चौड़ा मुंह हवा में उड़ते कीटों को पकड़ने में मदद करता है। नर और मादा के बीच सहयोग और साझेदारी की भावना भी इस प्रजाति को खास बनाती है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि अबाबील जैसे पक्षियों की मौजूदगी पर्यावरण संतुलन का संकेत है। ये कीट नियंत्रण में अहम भूमिका निभाते हैं और जैव विविधता को मजबूत करते हैं। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे इन पक्षियों के घोंसलों को नुकसान न पहुंचाएं और इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखें। रायपुर की फिज़ाओं में अबाबील की उड़ान न केवल प्रकृति की खूबसूरती बढ़ा रही है, बल्कि सामूहिकता और अनुशासन का संदेश भी दे रही है।

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www.dainikjagranmpcg.com
22 Jan 2026 By Nitin Trivedi

रायपुर की फिज़ाओं में दिखा अबाबील का अद्भुत संसार: हवा में सोने-खाने वाला पक्षी महानदी नहर के पुल के नीचे बसा

रायपुर (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों एक अनोखे प्राकृतिक दृश्य की गवाह बन रही है। हवा में उड़ते-उड़ते खाना, पीना और यहां तक कि सोने की क्षमता रखने वाला अबाबील पक्षी हजारों की संख्या में रायपुर जिले के आरंग क्षेत्र में देखा जा रहा है। इन प्रवासी पक्षियों ने आरंग के कुकरा गांव में महानदी मुख्य नहर पर बने पुल के नीचे अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है। सुबह-शाम इनके विशाल झुंड आसमान में एक साथ उड़ान भरते नजर आ रहे हैं, जो स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल और आकर्षण का विषय बन गया है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से पुल के नीचे सैकड़ों छोटे-छोटे घोंसले दिखाई देने लगे हैं। सुबह होते ही हजारों अबाबील एक साथ अपने बसेरे से निकलते हैं और सूर्यास्त से पहले उसी स्थान पर लौट आते हैं। इस दौरान वे छोटे-छोटे समूहों में भी बंट जाते हैं, जिससे पूरा आसमान मानो जीवंत हो उठता है। कई लोग इस दृश्य को मोबाइल कैमरों में कैद कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं।

प्रकृति और पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक, अबाबील एक अत्यंत विशिष्ट प्रवासी पक्षी है, जिसे स्विफ्ट या स्वेलो भी कहा जाता है। यह पक्षी अपनी असाधारण उड़ान क्षमता के लिए जाना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अबाबील लगभग 10 महीने तक लगातार उड़ान में रह सकती है। यह उड़ते-उड़ते ही कीड़े-मकोड़े खा लेती है, बादलों की नमी या वर्षा की बूंदों से पानी पी लेती है और हवा में ही विश्राम व नींद पूरी कर लेती है।

बर्ड एक्सपर्ट्स का मानना है कि रायपुर पहुंचे ये अबाबील संभवतः यूरोप या भारत के हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे क्षेत्रों से यहां आए हैं। मौसम परिवर्तन और अनुकूल पर्यावरण के चलते छत्तीसगढ़ इनके लिए अस्थायी या स्थायी प्रवास स्थल बनता जा रहा है। पुल, ओवरब्रिज और ऊंची इमारतों के नीचे सामूहिक घोंसले बनाना इस प्रजाति की खास पहचान है। एक ही स्थान पर सैकड़ों घोंसलों की कॉलोनी विकसित होना इनके सामाजिक जीवन का उदाहरण है।

अबाबील आकार में भले ही गौरैया के समान होती है, लेकिन इसकी शारीरिक बनावट इसे अत्यंत दक्ष शिकारी बनाती है। इसके लंबे, नुकीले पंख, दो भागों में बंटी पूंछ और चौड़ा मुंह हवा में उड़ते कीटों को पकड़ने में मदद करता है। नर और मादा के बीच सहयोग और साझेदारी की भावना भी इस प्रजाति को खास बनाती है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि अबाबील जैसे पक्षियों की मौजूदगी पर्यावरण संतुलन का संकेत है। ये कीट नियंत्रण में अहम भूमिका निभाते हैं और जैव विविधता को मजबूत करते हैं। विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे इन पक्षियों के घोंसलों को नुकसान न पहुंचाएं और इनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखें। रायपुर की फिज़ाओं में अबाबील की उड़ान न केवल प्रकृति की खूबसूरती बढ़ा रही है, बल्कि सामूहिकता और अनुशासन का संदेश भी दे रही है।

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