भोजशाला विवाद: इंदौर से जबलपुर मुख्यपीठ स्थानांतरित, आज मुख्य न्यायाधीश की पीठ में सुनवाई

जबलपुर (म.प्र.)

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पूजा अधिकार और नमाज अनुमति को लेकर संवैधानिक प्रश्नों पर उच्च न्यायालय करेगा विचार

मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ा बहुचर्चित विवाद अब उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ से जबलपुर स्थित मुख्यपीठ में स्थानांतरित कर दिया गया है। पूजा के अधिकार और नमाज की अनुमति से जुड़े इस संवेदनशील प्रकरण पर बुधवार को मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा तथा न्यायमूर्ति विनय सराफ की द्वैध पीठ सुनवाई करेगी। संभावना है कि मामला दोपहर बाद लिया जाएगा।

यह प्रकरण धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भोजशाला मूलतः देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और प्राचीन शिक्षा केंद्र था। उनके अनुसार 1010 से 1055 ईस्वी के बीच राजा भोज ने इसका निर्माण कराया था, जहां वेद, शास्त्र, ज्योतिष और खगोल जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था। याचिका में परिसर को सनातन परंपराओं से जुड़ा आदर्श गुरुकुल बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि बाद के मुस्लिम शासकों के काल में परिसर को क्षति पहुंचाई गई, किंतु उसकी मूल धार्मिक पहचान समाप्त नहीं हुई। उनका कहना है कि हिंदू समुदाय निरंतर वहां पूजा करता रहा। ब्रिटिश शासनकाल में इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रचारित किए जाने को भी याचिका में तथ्यों के विपरीत बताया गया है।

विवाद का प्रमुख बिंदु वर्ष 2003 का वह आदेश है, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी थी, जबकि हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर कुछ सीमाएं तय की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही अनुच्छेद 29 के अंतर्गत सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा अनुच्छेद 49 के तहत ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा संबंधी राज्य की जिम्मेदारी का भी हवाला दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इससे संबंधित एक अपील वर्ष 2006 से लंबित है। सोमवार को इंदौर खंडपीठ में यह प्रकरण सूचीबद्ध था, लेकिन वकीलों के प्रतिवाद दिवस के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के 22 जनवरी के आदेश पर विचार करते हुए पीठ ने पाया कि लंबित अपील के मद्देनजर मामले को मुख्यपीठ भेजा जाना उचित होगा, ताकि प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश आवश्यक निर्देश दे सकें।

अब भोजशाला विवाद से संबंधित सभी पांच याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली द्वैध पीठ के समक्ष रखी गई हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस मामले में न्यायालय का निर्णय धार्मिक अधिकारों और ऐतिहासिक स्थलों के प्रबंधन से जुड़े भविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।

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18 Feb 2026 By Nitin Trivedi

भोजशाला विवाद: इंदौर से जबलपुर मुख्यपीठ स्थानांतरित, आज मुख्य न्यायाधीश की पीठ में सुनवाई

जबलपुर (म.प्र.)

मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ा बहुचर्चित विवाद अब उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ से जबलपुर स्थित मुख्यपीठ में स्थानांतरित कर दिया गया है। पूजा के अधिकार और नमाज की अनुमति से जुड़े इस संवेदनशील प्रकरण पर बुधवार को मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा तथा न्यायमूर्ति विनय सराफ की द्वैध पीठ सुनवाई करेगी। संभावना है कि मामला दोपहर बाद लिया जाएगा।

यह प्रकरण धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भोजशाला मूलतः देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और प्राचीन शिक्षा केंद्र था। उनके अनुसार 1010 से 1055 ईस्वी के बीच राजा भोज ने इसका निर्माण कराया था, जहां वेद, शास्त्र, ज्योतिष और खगोल जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता था। याचिका में परिसर को सनातन परंपराओं से जुड़ा आदर्श गुरुकुल बताया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि बाद के मुस्लिम शासकों के काल में परिसर को क्षति पहुंचाई गई, किंतु उसकी मूल धार्मिक पहचान समाप्त नहीं हुई। उनका कहना है कि हिंदू समुदाय निरंतर वहां पूजा करता रहा। ब्रिटिश शासनकाल में इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रचारित किए जाने को भी याचिका में तथ्यों के विपरीत बताया गया है।

विवाद का प्रमुख बिंदु वर्ष 2003 का वह आदेश है, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी थी, जबकि हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर कुछ सीमाएं तय की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही अनुच्छेद 29 के अंतर्गत सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा अनुच्छेद 49 के तहत ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा संबंधी राज्य की जिम्मेदारी का भी हवाला दिया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इससे संबंधित एक अपील वर्ष 2006 से लंबित है। सोमवार को इंदौर खंडपीठ में यह प्रकरण सूचीबद्ध था, लेकिन वकीलों के प्रतिवाद दिवस के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के 22 जनवरी के आदेश पर विचार करते हुए पीठ ने पाया कि लंबित अपील के मद्देनजर मामले को मुख्यपीठ भेजा जाना उचित होगा, ताकि प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश आवश्यक निर्देश दे सकें।

अब भोजशाला विवाद से संबंधित सभी पांच याचिकाएं मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली द्वैध पीठ के समक्ष रखी गई हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस मामले में न्यायालय का निर्णय धार्मिक अधिकारों और ऐतिहासिक स्थलों के प्रबंधन से जुड़े भविष्य के मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।

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