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972 करोड़ के डायल-112 प्रोजेक्ट पर उच्च न्यायालय की सख्ती, लागत पर उठे सवाल
जबलपुर (म.प्र.)
1200 वाहनों की लागत पर अदालत की तीखी टिप्पणी; नए सॉफ्टवेयर टेंडर पर अंतरिम रोक
प्रदेश के 972 करोड़ रुपये के डायल-112 फेज-2 प्रोजेक्ट को लेकर जारी निविदा विवाद पर उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि 1200 वाहनों के संचालन सहित कुल परियोजना लागत 972 करोड़ रुपये है, तो अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या इस सेवा में महंगी लक्जरी गाड़ियां चलाई जा रही हैं। अदालत की यह टिप्पणी परियोजना की लागत और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे प्रश्नों के बीच आई।
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की द्वैध पीठ ने 6 करोड़ 29 लाख रुपये के कंप्यूटर आधारित प्रेषण सॉफ्टवेयर के लिए जारी नए टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पुलिस विभाग से वर्तमान सॉफ्टवेयर की कार्यक्षमता, उपयोगिता और तकनीकी स्थिति पर विस्तृत प्रतिवेदन भी मांगा गया है।
यह मामला ईएमआरआई ग्रीन हेल्थ सर्विसेज नामक कंपनी की याचिका पर सामने आया है। कंपनी का कहना है कि मार्च 2025 में जारी निविदा के तहत उसे सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्य सौंपा गया था। इसके बाद सितंबर 2025 से 1200 वाहनों के साथ डायल-112 सेवा प्रारंभ कर दी गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि दिसंबर 2025 में उसी परियोजना के अंतर्गत कंप्यूटर आधारित प्रेषण सॉफ्टवेयर के लिए अलग से टेंडर जारी करना मूल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है।
राज्य सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि 972 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत में केवल वाहन ही नहीं, बल्कि संचार उपकरण, डाटा सेंटर, तकनीकी अवसंरचना, रखरखाव और अन्य परिचालन व्यवस्थाएं भी शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि मौजूदा सॉफ्टवेयर में तकनीकी कमियां पाई गईं, जिससे सेवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी। इन खामियों को दूर करने के लिए नया टेंडर जारी करना आवश्यक था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन से संचालित किसी भी परियोजना में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन पाया गया तो आवश्यक निर्देश जारी किए जाएंगे।
मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। तब तक राज्य सरकार और संबंधित विभागों को विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। इस प्रकरण पर कानूनी और प्रशासनिक हलकों की नजर बनी हुई है, क्योंकि यह मामला बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स में निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन से जुड़ा है।
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972 करोड़ के डायल-112 प्रोजेक्ट पर उच्च न्यायालय की सख्ती, लागत पर उठे सवाल
जबलपुर (म.प्र.)
प्रदेश के 972 करोड़ रुपये के डायल-112 फेज-2 प्रोजेक्ट को लेकर जारी निविदा विवाद पर उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि 1200 वाहनों के संचालन सहित कुल परियोजना लागत 972 करोड़ रुपये है, तो अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या इस सेवा में महंगी लक्जरी गाड़ियां चलाई जा रही हैं। अदालत की यह टिप्पणी परियोजना की लागत और पारदर्शिता को लेकर उठ रहे प्रश्नों के बीच आई।
मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की द्वैध पीठ ने 6 करोड़ 29 लाख रुपये के कंप्यूटर आधारित प्रेषण सॉफ्टवेयर के लिए जारी नए टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पुलिस विभाग से वर्तमान सॉफ्टवेयर की कार्यक्षमता, उपयोगिता और तकनीकी स्थिति पर विस्तृत प्रतिवेदन भी मांगा गया है।
यह मामला ईएमआरआई ग्रीन हेल्थ सर्विसेज नामक कंपनी की याचिका पर सामने आया है। कंपनी का कहना है कि मार्च 2025 में जारी निविदा के तहत उसे सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में कार्य सौंपा गया था। इसके बाद सितंबर 2025 से 1200 वाहनों के साथ डायल-112 सेवा प्रारंभ कर दी गई। याचिकाकर्ता का आरोप है कि दिसंबर 2025 में उसी परियोजना के अंतर्गत कंप्यूटर आधारित प्रेषण सॉफ्टवेयर के लिए अलग से टेंडर जारी करना मूल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है।
राज्य सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि 972 करोड़ रुपये की कुल परियोजना लागत में केवल वाहन ही नहीं, बल्कि संचार उपकरण, डाटा सेंटर, तकनीकी अवसंरचना, रखरखाव और अन्य परिचालन व्यवस्थाएं भी शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि मौजूदा सॉफ्टवेयर में तकनीकी कमियां पाई गईं, जिससे सेवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी। इन खामियों को दूर करने के लिए नया टेंडर जारी करना आवश्यक था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन से संचालित किसी भी परियोजना में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन पाया गया तो आवश्यक निर्देश जारी किए जाएंगे।
मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। तब तक राज्य सरकार और संबंधित विभागों को विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। इस प्रकरण पर कानूनी और प्रशासनिक हलकों की नजर बनी हुई है, क्योंकि यह मामला बड़े सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स में निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन से जुड़ा है।
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