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मध्य प्रदेश में बाघों की मौत पर बढ़ी चिंता, 6 दिन में 3 शावकों की मौत
जबलपुर(म.प्र.)
भुखमरी और प्रबंधन पर उठे सवाल, चार महीनों में 23 बाघों की मौत; विशेषज्ञों ने जताई गहरी चिंता
मध्यप्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने राज्य की ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला कान्हा टाइगर रिजर्व का है, जहां एक ही बाघिन के तीन शावकों की छह दिनों के भीतर मौत हो गई। इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण की स्थिति और प्रबंधन प्रणाली पर बहस तेज कर दी है।
वन विभाग के अनुसार, अमाही क्षेत्र की बाघिन टी-141 के तीसरे शावक का शव शनिवार शाम सरही जोन में मिला। इससे पहले 21 और 24 अप्रैल को इसी बाघिन के दो अन्य शावकों की मौत हो चुकी थी। प्रारंभिक जांच में दो शावकों की मौत का कारण भुखमरी बताया गया है, जबकि तीसरे शावक के शव को विस्तृत परीक्षण के लिए जबलपुर स्थित वन्यजीव फॉरेंसिक प्रयोगशाला भेजा गया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश में जनवरी से अप्रैल के बीच बाघों की मौत का आंकड़ा 23 तक पहुंच चुका है। इनमें टेरिटोरियल संघर्ष, बीमारी, प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतें भी शामिल हैं। अकेले अप्रैल में कान्हा और आसपास के क्षेत्रों में चार बाघों की मौत दर्ज की गई है।
मध्यप्रदेश, जो 785 बाघों के साथ देश में शीर्ष स्थान पर रहा है, अब संरक्षण के मोर्चे पर चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं—2021 में 34, 2022 में 43, 2023 में 45, 2024 में 46 और 2025 में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। छह वर्षों में कुल 269 बाघों की मौत इस बात का संकेत है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी खतरे कम नहीं हुए हैं।
वन विभाग का कहना है कि सभी मामलों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है और हर घटना की जांच की जा रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल, चौथे शावक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और विभागीय कदमों से यह तय होगा कि मध्यप्रदेश अपनी ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान बरकरार रख पाएगा या नहीं।
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मध्य प्रदेश में बाघों की मौत पर बढ़ी चिंता, 6 दिन में 3 शावकों की मौत
जबलपुर(म.प्र.)
मध्यप्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने राज्य की ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला कान्हा टाइगर रिजर्व का है, जहां एक ही बाघिन के तीन शावकों की छह दिनों के भीतर मौत हो गई। इस घटना ने वन्यजीव संरक्षण की स्थिति और प्रबंधन प्रणाली पर बहस तेज कर दी है।
वन विभाग के अनुसार, अमाही क्षेत्र की बाघिन टी-141 के तीसरे शावक का शव शनिवार शाम सरही जोन में मिला। इससे पहले 21 और 24 अप्रैल को इसी बाघिन के दो अन्य शावकों की मौत हो चुकी थी। प्रारंभिक जांच में दो शावकों की मौत का कारण भुखमरी बताया गया है, जबकि तीसरे शावक के शव को विस्तृत परीक्षण के लिए जबलपुर स्थित वन्यजीव फॉरेंसिक प्रयोगशाला भेजा गया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश में जनवरी से अप्रैल के बीच बाघों की मौत का आंकड़ा 23 तक पहुंच चुका है। इनमें टेरिटोरियल संघर्ष, बीमारी, प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतें भी शामिल हैं। अकेले अप्रैल में कान्हा और आसपास के क्षेत्रों में चार बाघों की मौत दर्ज की गई है।
मध्यप्रदेश, जो 785 बाघों के साथ देश में शीर्ष स्थान पर रहा है, अब संरक्षण के मोर्चे पर चुनौती का सामना कर रहा है। पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं—2021 में 34, 2022 में 43, 2023 में 45, 2024 में 46 और 2025 में 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। छह वर्षों में कुल 269 बाघों की मौत इस बात का संकेत है कि संरक्षित क्षेत्रों में भी खतरे कम नहीं हुए हैं।
वन विभाग का कहना है कि सभी मामलों में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है और हर घटना की जांच की जा रही है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
फिलहाल, चौथे शावक की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और विभागीय कदमों से यह तय होगा कि मध्यप्रदेश अपनी ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान बरकरार रख पाएगा या नहीं।
