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रीवा में मनरेगा घोटाले का खुलासा, RTI कार्यकर्ता के नाम फर्जी मस्टर रोल जारी
रीवा,(म.प्र.)
बिना तालाब निर्माण और मजदूरी के खाते में भुगतान दर्शाया गया, जांच में सचिव, उपयंत्री और सहायक यंत्री दोषी पाए गए
रीवा जिले में मनरेगा योजना के तहत कथित फर्जीवाड़े का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ग्रामीण विकास योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गंगेव जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले कैथा गांव में एक आरटीआई कार्यकर्ता के नाम पर बिना उसकी जानकारी और सहमति के फर्जी मस्टर रोल जारी कर रोजगार दर्शाने का मामला उजागर हुआ है। जांच में सामने आया कि जिस व्यक्ति के नाम पर मजदूरी दिखाई गई, उसके खेत में स्वीकृत कार्य शुरू तक नहीं हुआ था। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में उसे रोजगार प्राप्त होना और भुगतान दर्ज कर दिया गया। मामले के सामने आने के बाद जिला पंचायत स्तर पर जांच कराई गई, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं।
ग्राम कैथा निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने इस मामले को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई। जानकारी के अनुसार वर्ष 2023-24 में उनके खेत में तालाब निर्माण के लिए करीब 3.85 लाख रुपए की तकनीकी स्वीकृति दी गई थी। योजना के तहत खेत तालाब का निर्माण होना था, लेकिन लंबे समय तक कोई काम शुरू नहीं हुआ। निर्माण कार्य नहीं होने से परेशान होकर उन्होंने 21 मई 2025 को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई और काम शुरू कराने की मांग की। बताया जा रहा है कि शिकायत के बाद निर्माण कार्य प्रारंभ करने के बजाय पंचायत स्तर पर एक अलग ही रास्ता अपनाया गया। आरोप है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों ने शिकायत का निराकरण दिखाने के लिए हितग्राही के नाम पर ही फर्जी मस्टर रोल तैयार कर दिए और रिकॉर्ड में रोजगार दर्शा दिया।
जिला पंचायत की मनरेगा शाखा द्वारा कराई गई जांच में यह सामने आया कि मनरेगा पोर्टल पर शिवानंद द्विवेदी का नाम कई मस्टर रोल में दर्ज किया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें करीब 20 दिनों तक रोजगार प्राप्त होना दर्शाया गया। हैरानी की बात यह रही कि उनके जॉब कार्ड पर मजदूरी भुगतान का विवरण भी दर्ज कर दिया गया था। दस्तावेजों में एक राशि का भुगतान और कुछ राशि बकाया होना भी प्रदर्शित किया गया। जबकि शिकायतकर्ता का कहना था कि उन्होंने न तो किसी प्रकार की मजदूरी की और न ही उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया गया। जब जांच टीम ने पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण किया तो कई विसंगतियां सामने आईं।
प्रारंभिक जांच के बाद जिला पंचायत के मनरेगा लेखाधिकारी ने संबंधित दस्तावेजों और पोर्टल की प्रविष्टियों का मिलान किया। इस दौरान पाया गया कि जिस निर्माण कार्य के नाम पर मजदूरी दर्शाई गई, उस स्थल पर वास्तविक रूप से कोई कार्य ही नहीं हुआ था। जब तत्कालीन ग्राम पंचायत सचिव से मजदूरी के प्रमाण मांगे गए तो वे कोई संतोषजनक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। न तो कार्यस्थल की तस्वीरें उपलब्ध कराई जा सकीं और न ही मजदूरी मांगने से जुड़े कोई आवेदन या हस्ताक्षरयुक्त मस्टर रोल प्रस्तुत किए गए। इससे जांच अधिकारियों का संदेह और गहरा गया।
मामले में सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि बिना काम हुए ही तकनीकी स्तर पर कार्य का मूल्यांकन और सत्यापन भी कर दिया गया था। जांच रिपोर्ट के अनुसार उपयंत्री और सहायक यंत्री द्वारा ई-एमबी प्रणाली में ऑनलाइन सत्यापन किया गया, जबकि मौके पर कोई निर्माण कार्य नहीं मिला। अधिकारियों का मानना है कि यदि स्थल पर काम नहीं हुआ था तो उसका मूल्यांकन और ऑनलाइन प्रमाणन कैसे किया गया, यह अपने आप में गंभीर अनियमितता का संकेत है। जांच में इसे केवल लापरवाही नहीं बल्कि वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में माना गया है।
पूरे मामले की विस्तृत जांच के बाद ग्राम पंचायत कैथा के सचिव महेश पटेल, तत्कालीन उपयंत्री प्रवीण पाण्डेय और तत्कालीन सहायक यंत्री निखिल मिश्रा को जिम्मेदार माना गया है। 31 पन्नों की जांच रिपोर्ट तैयार कर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को भेज दी गई है। रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और वैधानिक कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है। बताया जा रहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर पर भी इसकी समीक्षा की जा रही है।
इस खुलासे के बाद जिले के मनरेगा विभाग में हलचल तेज हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित विकास कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शिकायतकर्ता स्वयं आरटीआई कार्यकर्ता नहीं होता तो शायद यह मामला कभी सामने नहीं आता। वहीं प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी और दोषियों के खिलाफ नियमों के अनुसार कदम उठाए जाएंगे।
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रीवा में मनरेगा घोटाले का खुलासा, RTI कार्यकर्ता के नाम फर्जी मस्टर रोल जारी
रीवा,(म.प्र.)
रीवा जिले में मनरेगा योजना के तहत कथित फर्जीवाड़े का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने ग्रामीण विकास योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गंगेव जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाले कैथा गांव में एक आरटीआई कार्यकर्ता के नाम पर बिना उसकी जानकारी और सहमति के फर्जी मस्टर रोल जारी कर रोजगार दर्शाने का मामला उजागर हुआ है। जांच में सामने आया कि जिस व्यक्ति के नाम पर मजदूरी दिखाई गई, उसके खेत में स्वीकृत कार्य शुरू तक नहीं हुआ था। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में उसे रोजगार प्राप्त होना और भुगतान दर्ज कर दिया गया। मामले के सामने आने के बाद जिला पंचायत स्तर पर जांच कराई गई, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं।
ग्राम कैथा निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने इस मामले को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई। जानकारी के अनुसार वर्ष 2023-24 में उनके खेत में तालाब निर्माण के लिए करीब 3.85 लाख रुपए की तकनीकी स्वीकृति दी गई थी। योजना के तहत खेत तालाब का निर्माण होना था, लेकिन लंबे समय तक कोई काम शुरू नहीं हुआ। निर्माण कार्य नहीं होने से परेशान होकर उन्होंने 21 मई 2025 को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई और काम शुरू कराने की मांग की। बताया जा रहा है कि शिकायत के बाद निर्माण कार्य प्रारंभ करने के बजाय पंचायत स्तर पर एक अलग ही रास्ता अपनाया गया। आरोप है कि संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों ने शिकायत का निराकरण दिखाने के लिए हितग्राही के नाम पर ही फर्जी मस्टर रोल तैयार कर दिए और रिकॉर्ड में रोजगार दर्शा दिया।
जिला पंचायत की मनरेगा शाखा द्वारा कराई गई जांच में यह सामने आया कि मनरेगा पोर्टल पर शिवानंद द्विवेदी का नाम कई मस्टर रोल में दर्ज किया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें करीब 20 दिनों तक रोजगार प्राप्त होना दर्शाया गया। हैरानी की बात यह रही कि उनके जॉब कार्ड पर मजदूरी भुगतान का विवरण भी दर्ज कर दिया गया था। दस्तावेजों में एक राशि का भुगतान और कुछ राशि बकाया होना भी प्रदर्शित किया गया। जबकि शिकायतकर्ता का कहना था कि उन्होंने न तो किसी प्रकार की मजदूरी की और न ही उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया गया। जब जांच टीम ने पूरे रिकॉर्ड का परीक्षण किया तो कई विसंगतियां सामने आईं।
प्रारंभिक जांच के बाद जिला पंचायत के मनरेगा लेखाधिकारी ने संबंधित दस्तावेजों और पोर्टल की प्रविष्टियों का मिलान किया। इस दौरान पाया गया कि जिस निर्माण कार्य के नाम पर मजदूरी दर्शाई गई, उस स्थल पर वास्तविक रूप से कोई कार्य ही नहीं हुआ था। जब तत्कालीन ग्राम पंचायत सचिव से मजदूरी के प्रमाण मांगे गए तो वे कोई संतोषजनक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। न तो कार्यस्थल की तस्वीरें उपलब्ध कराई जा सकीं और न ही मजदूरी मांगने से जुड़े कोई आवेदन या हस्ताक्षरयुक्त मस्टर रोल प्रस्तुत किए गए। इससे जांच अधिकारियों का संदेह और गहरा गया।
मामले में सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि बिना काम हुए ही तकनीकी स्तर पर कार्य का मूल्यांकन और सत्यापन भी कर दिया गया था। जांच रिपोर्ट के अनुसार उपयंत्री और सहायक यंत्री द्वारा ई-एमबी प्रणाली में ऑनलाइन सत्यापन किया गया, जबकि मौके पर कोई निर्माण कार्य नहीं मिला। अधिकारियों का मानना है कि यदि स्थल पर काम नहीं हुआ था तो उसका मूल्यांकन और ऑनलाइन प्रमाणन कैसे किया गया, यह अपने आप में गंभीर अनियमितता का संकेत है। जांच में इसे केवल लापरवाही नहीं बल्कि वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में माना गया है।
पूरे मामले की विस्तृत जांच के बाद ग्राम पंचायत कैथा के सचिव महेश पटेल, तत्कालीन उपयंत्री प्रवीण पाण्डेय और तत्कालीन सहायक यंत्री निखिल मिश्रा को जिम्मेदार माना गया है। 31 पन्नों की जांच रिपोर्ट तैयार कर जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को भेज दी गई है। रिपोर्ट में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और वैधानिक कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है। बताया जा रहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर पर भी इसकी समीक्षा की जा रही है।
इस खुलासे के बाद जिले के मनरेगा विभाग में हलचल तेज हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित विकास कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शिकायतकर्ता स्वयं आरटीआई कार्यकर्ता नहीं होता तो शायद यह मामला कभी सामने नहीं आता। वहीं प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी और दोषियों के खिलाफ नियमों के अनुसार कदम उठाए जाएंगे।
