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महंगाई की नई मार, खाने-पीने और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स होंगे महंगे
Digital Desk
रिपोर्ट के अनुसार, कई कंपनियां पहले ही 3% से 7% तक दाम बढ़ा चुकी हैं और आने वाले महीनों में ‘श्रिंकफ्लेशन’ का असर भी देखने को मिल सकता है।
देशभर में आम लोगों की जेब पर महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अब रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाने-पीने की चीजें और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स भी महंगे होने की तैयारी में हैं। सिस्टेमैटिक्स रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों पर बढ़ती इनपुट कॉस्ट का दबाव तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते FMCG सेक्टर की बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक से दो महीनों के दौरान कई कंपनियों ने अलग-अलग प्रोडक्ट्स की कीमतों में 3% से 7% तक की बढ़ोतरी कर दी है। इसकी मुख्य वजह कच्चे माल, पैकेजिंग सामग्री और क्रूड ऑयल जैसी आवश्यक वस्तुओं की लागत में तेजी से बढ़ोतरी होना है। आने वाले समय में साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, तेल, स्नैक्स, पैकेज्ड फूड और अन्य घरेलू इस्तेमाल के उत्पादों की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर पड़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों की रॉ मटीरियल बास्केट की लागत औसतन करीब 10% तक बढ़ गई है। खास तौर पर पैकेजिंग मटीरियल और खाद्य तेलों की कीमतों में हुई तेज वृद्धि ने कंपनियों की लागत को काफी बढ़ा दिया है।
प्लास्टिक आधारित पैकेजिंग सामग्री HDPE की कीमतों में करीब 56% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। HDPE का इस्तेमाल शैंपू की बोतलों, डिटर्जेंट कंटेनरों और फ्लेक्सिबल पैकेजिंग में किया जाता है। पैकेजिंग लागत बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादों को पुराने दामों पर बेचना मुश्किल होता जा रहा है।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में भी 32% तक की तेजी आई है। वहीं पाम ऑयल के दाम करीब 11% बढ़ गए हैं। चूंकि पाम ऑयल का इस्तेमाल खाने के तेल से लेकर साबुन और कॉस्मेटिक उत्पादों तक में होता है, इसलिए इसका असर कई सेक्टरों में दिखाई देगा।
अप्रैल महीने की रिटेल महंगाई दर बढ़कर 3.48% पर पहुंच गई है। इससे पहले मार्च में यह 3.40% थी। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी इसकी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। फूड इन्फ्लेशन अप्रैल में 4.20% दर्ज की गई, जबकि मार्च में यह 3.87% थी। अगर कच्चे माल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो कंपनियां केवल कीमतें बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेंगी। वे “ग्रामेज कट” या “श्रिंकफ्लेशन” का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसका मतलब है कि प्रोडक्ट की कीमत समान रहेगी लेकिन पैकेट के अंदर मिलने वाले सामान की मात्रा कम कर दी जाएगी।
उदाहरण के तौर पर, पहले जहां किसी स्नैक पैकेट में 100 ग्राम सामान मिलता था, अब वही पैकेट 90 या 85 ग्राम का हो सकता है। इससे ग्राहक को पहली नजर में कीमत बढ़ी हुई महसूस नहीं होती, लेकिन वास्तव में वह कम सामान के लिए उतने ही पैसे चुका रहा होता है। यह तरीका कंपनियों द्वारा लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है, खासकर तब जब लागत तेजी से बढ़ती है और कंपनियां सीधे दाम बढ़ाने से बचना चाहती हैं।
कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का असर कंपनियों के मुनाफे पर भी दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च तिमाही में कई बड़ी FMCG कंपनियों के ग्रॉस मार्जिन में गिरावट दर्ज की गई। सालाना आधार पर मार्जिन करीब 0.50% तक कम हुआ है। वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिलेगा। कंपनियां अपने घाटे को कम करने के लिए कीमतों में बढ़ोतरी कर रही हैं, लेकिन लागत में इतनी तेज वृद्धि हुई है कि मार्जिन पर दबाव बना रहेगा।
हालांकि कंपनियों की आय में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन विशेषज्ञों ने खपत घटने की आशंका भी जताई है। महंगाई बढ़ने के कारण लोग गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर सकते हैं। इसका असर FMCG सेक्टर की कुल बिक्री पर पड़ सकता है। ग्रामीण बाजारों में इसका असर और अधिक दिखाई देने की संभावना है, क्योंकि वहां पहले से ही खर्च करने की क्षमता सीमित है। अगर कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो उपभोक्ता सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार और रिजर्व बैंक को महंगाई पर नजर बनाए रखनी होगी। यदि खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और उपभोक्ता मांग दोनों पर पड़ सकता है।
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महंगाई की नई मार, खाने-पीने और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स होंगे महंगे
Digital Desk
देशभर में आम लोगों की जेब पर महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अब रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाने-पीने की चीजें और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स भी महंगे होने की तैयारी में हैं। सिस्टेमैटिक्स रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, कंपनियों पर बढ़ती इनपुट कॉस्ट का दबाव तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते FMCG सेक्टर की बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रही हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक से दो महीनों के दौरान कई कंपनियों ने अलग-अलग प्रोडक्ट्स की कीमतों में 3% से 7% तक की बढ़ोतरी कर दी है। इसकी मुख्य वजह कच्चे माल, पैकेजिंग सामग्री और क्रूड ऑयल जैसी आवश्यक वस्तुओं की लागत में तेजी से बढ़ोतरी होना है। आने वाले समय में साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, तेल, स्नैक्स, पैकेज्ड फूड और अन्य घरेलू इस्तेमाल के उत्पादों की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर पड़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों की रॉ मटीरियल बास्केट की लागत औसतन करीब 10% तक बढ़ गई है। खास तौर पर पैकेजिंग मटीरियल और खाद्य तेलों की कीमतों में हुई तेज वृद्धि ने कंपनियों की लागत को काफी बढ़ा दिया है।
प्लास्टिक आधारित पैकेजिंग सामग्री HDPE की कीमतों में करीब 56% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। HDPE का इस्तेमाल शैंपू की बोतलों, डिटर्जेंट कंटेनरों और फ्लेक्सिबल पैकेजिंग में किया जाता है। पैकेजिंग लागत बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादों को पुराने दामों पर बेचना मुश्किल होता जा रहा है।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में भी 32% तक की तेजी आई है। वहीं पाम ऑयल के दाम करीब 11% बढ़ गए हैं। चूंकि पाम ऑयल का इस्तेमाल खाने के तेल से लेकर साबुन और कॉस्मेटिक उत्पादों तक में होता है, इसलिए इसका असर कई सेक्टरों में दिखाई देगा।
अप्रैल महीने की रिटेल महंगाई दर बढ़कर 3.48% पर पहुंच गई है। इससे पहले मार्च में यह 3.40% थी। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी इसकी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। फूड इन्फ्लेशन अप्रैल में 4.20% दर्ज की गई, जबकि मार्च में यह 3.87% थी। अगर कच्चे माल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो कंपनियां केवल कीमतें बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेंगी। वे “ग्रामेज कट” या “श्रिंकफ्लेशन” का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसका मतलब है कि प्रोडक्ट की कीमत समान रहेगी लेकिन पैकेट के अंदर मिलने वाले सामान की मात्रा कम कर दी जाएगी।
उदाहरण के तौर पर, पहले जहां किसी स्नैक पैकेट में 100 ग्राम सामान मिलता था, अब वही पैकेट 90 या 85 ग्राम का हो सकता है। इससे ग्राहक को पहली नजर में कीमत बढ़ी हुई महसूस नहीं होती, लेकिन वास्तव में वह कम सामान के लिए उतने ही पैसे चुका रहा होता है। यह तरीका कंपनियों द्वारा लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है, खासकर तब जब लागत तेजी से बढ़ती है और कंपनियां सीधे दाम बढ़ाने से बचना चाहती हैं।
कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का असर कंपनियों के मुनाफे पर भी दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च तिमाही में कई बड़ी FMCG कंपनियों के ग्रॉस मार्जिन में गिरावट दर्ज की गई। सालाना आधार पर मार्जिन करीब 0.50% तक कम हुआ है। वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिलेगा। कंपनियां अपने घाटे को कम करने के लिए कीमतों में बढ़ोतरी कर रही हैं, लेकिन लागत में इतनी तेज वृद्धि हुई है कि मार्जिन पर दबाव बना रहेगा।
हालांकि कंपनियों की आय में कुछ बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन विशेषज्ञों ने खपत घटने की आशंका भी जताई है। महंगाई बढ़ने के कारण लोग गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर सकते हैं। इसका असर FMCG सेक्टर की कुल बिक्री पर पड़ सकता है। ग्रामीण बाजारों में इसका असर और अधिक दिखाई देने की संभावना है, क्योंकि वहां पहले से ही खर्च करने की क्षमता सीमित है। अगर कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो उपभोक्ता सस्ते विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार और रिजर्व बैंक को महंगाई पर नजर बनाए रखनी होगी। यदि खाद्य वस्तुओं और ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और उपभोक्ता मांग दोनों पर पड़ सकता है।
