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MP-CG स्वतंत्रता संग्राम: भुला दी गईं वीरांगनाओं की कहानी
Digital Desk
MP-CG स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान जानिए। राधाबाई, केकती बाई, दया बाई, रुखमणी बाई और विद्यावती की कहानी पढ़ें।
राधाबाई, केकती बाई, दया बाई, रुखमणी बाई और विद्यावती चतुर्वेदी जैसी स्थानीय महिलाओं ने सत्याग्रह, जेल और सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी कहानियां मुख्यधारा के इतिहास में कम दिखाई देती हैं।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान केवल कुछ प्रसिद्ध चेहरों तक सीमित नहीं था। गांवों और कस्बों में कई महिलाओं ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, सत्याग्रह, जंगल आंदोलनों, भारत छोड़ो आंदोलन और सामाजिक सुधार अभियानों में हिस्सा लिया।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के आजादी का अमृत महोत्सव डिजिटल अभिलेख में छत्तीसगढ़ की राधाबाई, केकती बाई बघेल, दया बाई और रुखमणी बाई क्षेत्रपाल जैसी महिलाओं के योगदान दर्ज हैं। मध्य प्रदेश के अभिलेखों में विद्यावती चतुर्वेदी और रानी अवंतीबाई लोधी जैसी महिलाओं की भूमिका भी दर्ज है।
इन नामों को सामने लाना इसलिए जरूरी है क्योंकि स्थानीय स्तर पर लड़ा गया संघर्ष राष्ट्रीय आंदोलन की ही एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
राधाबाई ने महिलाओं को जोड़ा
रायपुर की डॉ. राधाबाई पेशे से दाई थीं। 1920 में महात्मा गांधी के रायपुर दौरे के बाद वह राष्ट्रीय आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ीं।
उन्होंने महिलाओं का सत्याग्रही समूह बनाया। महिलाएं चरखा चलातीं, बुनाई सीखतीं और घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुंचाती थीं। राधाबाई ने शराब की दुकानों के सामने विरोध प्रदर्शन और अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान भी चलाया।
1930 में जब गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रायपुर लाया गया, तब राधाबाई और अन्य महिलाओं ने हाथों में तिरंगा लेकर उनका स्वागत किया। ब्रिटिश कलेक्टर के आदेश पर महिलाओं पर लाठीचार्ज हुआ।
13 जून 1932 को दूसरे सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जुलूस का नेतृत्व करने पर राधाबाई को 20 अन्य महिला सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार किया गया।
केकती बाई ने जेल झेली
केकती बाई बघेल ने पति की मृत्यु के बाद अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और अपने बच्चों में राष्ट्रवादी विचार विकसित किए।
उनका परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुआ। 5 फरवरी 1932 को केकती बाई अपनी बहू राजकुंवर बघेल के साथ रायपुर में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं। दोनों को गिरफ्तार किया गया और अगले दिन रिहा कर दिया गया।
लेकिन केकती बाई पीछे नहीं हटीं। उन्होंने जेल जाने की मांग को लेकर भोजन तक छोड़ दिया। बाद में उन्हें छह महीने की जेल और 25 रुपये के जुर्माने की सजा मिली।
उन्होंने 1933 में गांधीजी के रायपुर दौरे की तैयारी में भी सहयोग किया और अस्पृश्यता उन्मूलन के काम से जुड़ी रहीं।
दया बाई का संघर्ष
रायपुर की दया बाई ने 1932 में जंगल सत्याग्रह और नशाबंदी आंदोलन में हिस्सा लिया। वह ग्रामीण महिलाओं के साथ मिलकर शराबबंदी गतिविधियों में शामिल होती थीं। कई बार इन गतिविधियों को उन्होंने भूमिगत तरीके से भी आगे बढ़ाया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उन्होंने सत्याग्रहियों के लिए भोजन की व्यवस्था की। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र की महिलाओं को संगठित किया।
जुलूस में शामिल होने, भाषण देने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ नारे लगाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उन्हें छह महीने की जेल की सजा दी। रायपुर सेंट्रल जेल में भी उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।
रुखमणी बाई की शहादत
रुखमणी बाई क्षेत्रपाल की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन में स्थानीय महिलाओं द्वारा झेली गई कीमत को सामने लाती है।
1885 में महासमुंद के एक वन ग्राम में जन्मी रुखमणी बाई सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जंगल सत्याग्रह से जुड़ीं। तमोरा जंगल सत्याग्रह में उनकी भागीदारी दर्ज है। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और एक वर्ष की जेल की सजा सुनाई।
सरकारी डिजिटल अभिलेख के अनुसार, आंदोलन और जेल के दौरान उन्हें मारपीट और अत्याचार का सामना करना पड़ा। 1933 में जेल पहुंचने के करीब तीन महीने के भीतर उनकी मृत्यु हो गई।
विद्यावती ने भी मोर्चा संभाला
मध्य प्रदेश में विद्यावती चतुर्वेदी का नाम भी स्थानीय महिला स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में महत्वपूर्ण है।
1941 में एक विजयादशमी कार्यक्रम में महिला शिक्षा पर भाषण के दौरान उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच हुए संघर्ष का उल्लेख किया। इसके बाद सरकार ने उनसे जवाब मांगा। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रसेवा को प्राथमिकता दी।
मैहर में प्रजामंडल के जिम्मेदार शासन की मांग वाले आंदोलन में उन्होंने अपने पति के साथ भाग लिया और जेल की यातनाएं झेलीं।
आजादी के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन जारी रहा। उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा के साथ-साथ राज्यसभा और लोकसभा में भी प्रतिनिधित्व किया।
अवंतीबाई की विरासत
मध्य प्रदेश की रानी अवंतीबाई लोधी का नाम स्थानीय इतिहास में 1857 के विद्रोह से जुड़ा है। वह रामगढ़ की रानी थीं और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों का विरोध करते हुए सशस्त्र प्रतिरोध में उतरीं।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अभिलेख के अनुसार, उन्होंने विद्रोह के दौरान करीब 4,000 सैनिकों का नेतृत्व किया और मंडला के पास खेरी में ब्रिटिश सेना का सामना किया। 1858 में देवहारगढ़ के युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी जान दे दी।
उनका योगदान बताता है कि मध्य भारत में महिलाओं का प्रतिरोध 20वीं सदी के कांग्रेस आंदोलनों तक सीमित नहीं था।
नाम बचाने की जिम्मेदारी
इन महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन घरों, गांवों और स्थानीय बाजारों तक पहुंचा था। महिलाओं ने केवल पुरुष नेताओं का साथ नहीं दिया; कई जगह उन्होंने स्वयं जुलूसों, बहिष्कार अभियानों और सत्याग्रहों का नेतृत्व किया।
आज चुनौती इन कहानियों को केवल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दोहराने की नहीं, बल्कि स्थायी ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने की है। पुराने दस्तावेज, परिवारों के पास मौजूद तस्वीरें, जेल रिकॉर्ड और स्थानीय स्मृतियां डिजिटल रूप में सुरक्षित की जा सकती हैं।
MP-CG स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान भारतीय स्वतंत्रता की उस व्यापक कहानी का हिस्सा है जिसमें राधाबाई, केकती बाई, दया बाई, रुखमणी बाई और विद्यावती चतुर्वेदी जैसी महिलाओं ने अपने स्तर पर संघर्ष किया। उन्हें याद करना इतिहास में नए नाम जोड़ना नहीं, बल्कि इतिहास को पूरा पढ़ना है।
MP-CG स्वतंत्रता संग्राम: भुला दी गईं वीरांगनाओं की कहानी
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राधाबाई, केकती बाई, दया बाई, रुखमणी बाई और विद्यावती चतुर्वेदी जैसी स्थानीय महिलाओं ने सत्याग्रह, जेल और सामाजिक आंदोलनों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी कहानियां मुख्यधारा के इतिहास में कम दिखाई देती हैं।
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान केवल कुछ प्रसिद्ध चेहरों तक सीमित नहीं था। गांवों और कस्बों में कई महिलाओं ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, सत्याग्रह, जंगल आंदोलनों, भारत छोड़ो आंदोलन और सामाजिक सुधार अभियानों में हिस्सा लिया।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के आजादी का अमृत महोत्सव डिजिटल अभिलेख में छत्तीसगढ़ की राधाबाई, केकती बाई बघेल, दया बाई और रुखमणी बाई क्षेत्रपाल जैसी महिलाओं के योगदान दर्ज हैं। मध्य प्रदेश के अभिलेखों में विद्यावती चतुर्वेदी और रानी अवंतीबाई लोधी जैसी महिलाओं की भूमिका भी दर्ज है।
इन नामों को सामने लाना इसलिए जरूरी है क्योंकि स्थानीय स्तर पर लड़ा गया संघर्ष राष्ट्रीय आंदोलन की ही एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
राधाबाई ने महिलाओं को जोड़ा
रायपुर की डॉ. राधाबाई पेशे से दाई थीं। 1920 में महात्मा गांधी के रायपुर दौरे के बाद वह राष्ट्रीय आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ीं।
उन्होंने महिलाओं का सत्याग्रही समूह बनाया। महिलाएं चरखा चलातीं, बुनाई सीखतीं और घर-घर जाकर स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश पहुंचाती थीं। राधाबाई ने शराब की दुकानों के सामने विरोध प्रदर्शन और अस्पृश्यता के खिलाफ अभियान भी चलाया।
1930 में जब गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रायपुर लाया गया, तब राधाबाई और अन्य महिलाओं ने हाथों में तिरंगा लेकर उनका स्वागत किया। ब्रिटिश कलेक्टर के आदेश पर महिलाओं पर लाठीचार्ज हुआ।
13 जून 1932 को दूसरे सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जुलूस का नेतृत्व करने पर राधाबाई को 20 अन्य महिला सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार किया गया।
केकती बाई ने जेल झेली
केकती बाई बघेल ने पति की मृत्यु के बाद अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और अपने बच्चों में राष्ट्रवादी विचार विकसित किए।
उनका परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुआ। 5 फरवरी 1932 को केकती बाई अपनी बहू राजकुंवर बघेल के साथ रायपुर में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं। दोनों को गिरफ्तार किया गया और अगले दिन रिहा कर दिया गया।
लेकिन केकती बाई पीछे नहीं हटीं। उन्होंने जेल जाने की मांग को लेकर भोजन तक छोड़ दिया। बाद में उन्हें छह महीने की जेल और 25 रुपये के जुर्माने की सजा मिली।
उन्होंने 1933 में गांधीजी के रायपुर दौरे की तैयारी में भी सहयोग किया और अस्पृश्यता उन्मूलन के काम से जुड़ी रहीं।
दया बाई का संघर्ष
रायपुर की दया बाई ने 1932 में जंगल सत्याग्रह और नशाबंदी आंदोलन में हिस्सा लिया। वह ग्रामीण महिलाओं के साथ मिलकर शराबबंदी गतिविधियों में शामिल होती थीं। कई बार इन गतिविधियों को उन्होंने भूमिगत तरीके से भी आगे बढ़ाया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उन्होंने सत्याग्रहियों के लिए भोजन की व्यवस्था की। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र की महिलाओं को संगठित किया।
जुलूस में शामिल होने, भाषण देने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ नारे लगाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया। अदालत ने उन्हें छह महीने की जेल की सजा दी। रायपुर सेंट्रल जेल में भी उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।
रुखमणी बाई की शहादत
रुखमणी बाई क्षेत्रपाल की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन में स्थानीय महिलाओं द्वारा झेली गई कीमत को सामने लाती है।
1885 में महासमुंद के एक वन ग्राम में जन्मी रुखमणी बाई सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान जंगल सत्याग्रह से जुड़ीं। तमोरा जंगल सत्याग्रह में उनकी भागीदारी दर्ज है। बाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और एक वर्ष की जेल की सजा सुनाई।
सरकारी डिजिटल अभिलेख के अनुसार, आंदोलन और जेल के दौरान उन्हें मारपीट और अत्याचार का सामना करना पड़ा। 1933 में जेल पहुंचने के करीब तीन महीने के भीतर उनकी मृत्यु हो गई।
विद्यावती ने भी मोर्चा संभाला
मध्य प्रदेश में विद्यावती चतुर्वेदी का नाम भी स्थानीय महिला स्वतंत्रता सेनानियों की सूची में महत्वपूर्ण है।
1941 में एक विजयादशमी कार्यक्रम में महिला शिक्षा पर भाषण के दौरान उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच हुए संघर्ष का उल्लेख किया। इसके बाद सरकार ने उनसे जवाब मांगा। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रसेवा को प्राथमिकता दी।
मैहर में प्रजामंडल के जिम्मेदार शासन की मांग वाले आंदोलन में उन्होंने अपने पति के साथ भाग लिया और जेल की यातनाएं झेलीं।
आजादी के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन जारी रहा। उन्होंने मध्य प्रदेश विधानसभा के साथ-साथ राज्यसभा और लोकसभा में भी प्रतिनिधित्व किया।
अवंतीबाई की विरासत
मध्य प्रदेश की रानी अवंतीबाई लोधी का नाम स्थानीय इतिहास में 1857 के विद्रोह से जुड़ा है। वह रामगढ़ की रानी थीं और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों का विरोध करते हुए सशस्त्र प्रतिरोध में उतरीं।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अभिलेख के अनुसार, उन्होंने विद्रोह के दौरान करीब 4,000 सैनिकों का नेतृत्व किया और मंडला के पास खेरी में ब्रिटिश सेना का सामना किया। 1858 में देवहारगढ़ के युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी जान दे दी।
उनका योगदान बताता है कि मध्य भारत में महिलाओं का प्रतिरोध 20वीं सदी के कांग्रेस आंदोलनों तक सीमित नहीं था।
नाम बचाने की जिम्मेदारी
इन महिलाओं की कहानियां बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन घरों, गांवों और स्थानीय बाजारों तक पहुंचा था। महिलाओं ने केवल पुरुष नेताओं का साथ नहीं दिया; कई जगह उन्होंने स्वयं जुलूसों, बहिष्कार अभियानों और सत्याग्रहों का नेतृत्व किया।
आज चुनौती इन कहानियों को केवल स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दोहराने की नहीं, बल्कि स्थायी ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने की है। पुराने दस्तावेज, परिवारों के पास मौजूद तस्वीरें, जेल रिकॉर्ड और स्थानीय स्मृतियां डिजिटल रूप में सुरक्षित की जा सकती हैं।
MP-CG स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का योगदान भारतीय स्वतंत्रता की उस व्यापक कहानी का हिस्सा है जिसमें राधाबाई, केकती बाई, दया बाई, रुखमणी बाई और विद्यावती चतुर्वेदी जैसी महिलाओं ने अपने स्तर पर संघर्ष किया। उन्हें याद करना इतिहास में नए नाम जोड़ना नहीं, बल्कि इतिहास को पूरा पढ़ना है।
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