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SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर नहीं लागू होगी, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का स्पष्ट रुख
भारत
हलफनामे में सरकार ने कहा- यह व्यवस्था केवल OBC और SEBC के लिए, संसद को ही SC-ST सूची में बदलाव का अधिकार
अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने अदालत में दायर हलफनामे में कहा है कि SC और ST वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। केंद्र ने यह भी कहा कि इस संबंध में दायर जनहित याचिकाएं मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था और स्थापित कानूनों के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। सरकार के अनुसार क्रीमी लेयर की अवधारणा केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) के आरक्षण तक सीमित है और इसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आरक्षण पर लागू करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाओं में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं रखा गया है, जिससे यह साबित हो कि संविधान के तहत किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। सरकार ने अदालत से कहा कि मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों में कहीं भी यह व्यवस्था नहीं है कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू की जाए। ऐसे में न्यायालय से इस तरह का निर्देश देने की मांग न्यायिक और संवैधानिक सीमाओं से बाहर है। केंद्र ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य केवल आर्थिक आधार पर लाभ देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
यह मामला उन जनहित याचिकाओं से जुड़ा है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों से जवाब मांगा था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के भीतर ऐसे परिवार, जिनके सदस्य पहले से उच्च संवैधानिक पदों या वरिष्ठ सरकारी सेवाओं में पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक पहुंचेगा, जो अब भी सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक पिछड़े हैं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि SC-ST वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की अलग उप-श्रेणी बनाई जाए, ताकि शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता मिल सके।
केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा है कि संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान केवल आर्थिक आधार पर नहीं की गई है। सरकार ने अदालत को बताया कि इन वर्गों का निर्धारण ऐतिहासिक भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर किया गया है। इसलिए केवल किसी व्यक्ति या परिवार की आय अथवा सरकारी पद के आधार पर उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
हलफनामे में केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का भी उल्लेख किया है। सरकार ने कहा कि इन प्रावधानों के तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने या किसी जाति अथवा जनजाति को शामिल या बाहर करने का अधिकार केवल संसद के पास है। ऐसे मामलों में अदालत या कार्यपालिका अपने स्तर पर कोई बदलाव नहीं कर सकती। सरकार का कहना है कि याचिकाओं में की गई मांगें अप्रत्यक्ष रूप से संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव का प्रयास करती हैं, जबकि इस प्रकार के निर्णय का अधिकार केवल विधायिका के पास है।
केंद्र ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी (मंडल आयोग) फैसले का भी हवाला दिया है। सरकार ने कहा कि इस निर्णय में क्रीमी लेयर का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए विकसित किया गया था, क्योंकि उस वर्ग की सामाजिक संरचना और संवैधानिक आधार अलग है। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति ऐतिहासिक रूप से अलग रही है और उनके लिए संविधान ने अलग प्रावधान किए हैं। ऐसे में OBC से जुड़े सिद्धांतों को सीधे SC-ST आरक्षण पर लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलें स्थापित न्यायिक सिद्धांतों और पूर्व के फैसलों से मेल नहीं खातीं। हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया है कि SC और ST समुदायों को दिए गए संवैधानिक संरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन समुदायों को प्रतिनिधित्व और अवसर उपलब्ध कराना है, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और वंचना का सामना करना पड़ा। ऐसे में आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर बदलना संविधान की मूल अवधारणा के विपरीत होगा।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के जवाब के साथ याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर भी विचार करेगा। अदालत के सामने यह प्रश्न भी रहेगा कि क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के भीतर किसी प्रकार का वर्गीकरण या क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था संवैधानिक रूप से संभव है या नहीं। फिलहाल केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में साफ कर दिया है कि उसकी राय में ऐसी व्यवस्था लागू करने का कोई संवैधानिक या कानूनी आधार मौजूद नहीं है और इस संबंध में दायर जनहित याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।
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SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर नहीं लागू होगी, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का स्पष्ट रुख
भारत
अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है। सरकार ने अदालत में दायर हलफनामे में कहा है कि SC और ST वर्ग के लिए आरक्षण व्यवस्था में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। केंद्र ने यह भी कहा कि इस संबंध में दायर जनहित याचिकाएं मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था और स्थापित कानूनों के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। सरकार के अनुसार क्रीमी लेयर की अवधारणा केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) के आरक्षण तक सीमित है और इसे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आरक्षण पर लागू करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि याचिकाओं में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं रखा गया है, जिससे यह साबित हो कि संविधान के तहत किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। सरकार ने अदालत से कहा कि मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों में कहीं भी यह व्यवस्था नहीं है कि SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू की जाए। ऐसे में न्यायालय से इस तरह का निर्देश देने की मांग न्यायिक और संवैधानिक सीमाओं से बाहर है। केंद्र ने अपने जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य केवल आर्थिक आधार पर लाभ देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
यह मामला उन जनहित याचिकाओं से जुड़ा है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों से जवाब मांगा था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के भीतर ऐसे परिवार, जिनके सदस्य पहले से उच्च संवैधानिक पदों या वरिष्ठ सरकारी सेवाओं में पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे आरक्षण का लाभ उन परिवारों तक पहुंचेगा, जो अब भी सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक पिछड़े हैं। याचिका में यह भी मांग की गई है कि SC-ST वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की अलग उप-श्रेणी बनाई जाए, ताकि शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में उन्हें प्राथमिकता मिल सके।
केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा है कि संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान केवल आर्थिक आधार पर नहीं की गई है। सरकार ने अदालत को बताया कि इन वर्गों का निर्धारण ऐतिहासिक भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर किया गया है। इसलिए केवल किसी व्यक्ति या परिवार की आय अथवा सरकारी पद के आधार पर उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर करना संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
हलफनामे में केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 का भी उल्लेख किया है। सरकार ने कहा कि इन प्रावधानों के तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने या किसी जाति अथवा जनजाति को शामिल या बाहर करने का अधिकार केवल संसद के पास है। ऐसे मामलों में अदालत या कार्यपालिका अपने स्तर पर कोई बदलाव नहीं कर सकती। सरकार का कहना है कि याचिकाओं में की गई मांगें अप्रत्यक्ष रूप से संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव का प्रयास करती हैं, जबकि इस प्रकार के निर्णय का अधिकार केवल विधायिका के पास है।
केंद्र ने अपने जवाब में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी (मंडल आयोग) फैसले का भी हवाला दिया है। सरकार ने कहा कि इस निर्णय में क्रीमी लेयर का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए विकसित किया गया था, क्योंकि उस वर्ग की सामाजिक संरचना और संवैधानिक आधार अलग है। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति ऐतिहासिक रूप से अलग रही है और उनके लिए संविधान ने अलग प्रावधान किए हैं। ऐसे में OBC से जुड़े सिद्धांतों को सीधे SC-ST आरक्षण पर लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की दलीलें स्थापित न्यायिक सिद्धांतों और पूर्व के फैसलों से मेल नहीं खातीं। हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया है कि SC और ST समुदायों को दिए गए संवैधानिक संरक्षण का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं, बल्कि उन समुदायों को प्रतिनिधित्व और अवसर उपलब्ध कराना है, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और वंचना का सामना करना पड़ा। ऐसे में आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को केवल आय या आर्थिक स्थिति के आधार पर बदलना संविधान की मूल अवधारणा के विपरीत होगा।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के जवाब के साथ याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर भी विचार करेगा। अदालत के सामने यह प्रश्न भी रहेगा कि क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण के भीतर किसी प्रकार का वर्गीकरण या क्रीमी लेयर जैसी व्यवस्था संवैधानिक रूप से संभव है या नहीं। फिलहाल केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में साफ कर दिया है कि उसकी राय में ऐसी व्यवस्था लागू करने का कोई संवैधानिक या कानूनी आधार मौजूद नहीं है और इस संबंध में दायर जनहित याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।
