फिल्म ‘वो लड़की’ से डेब्यू कर रहे अभिनेता ‘राही’ की कहानी…

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कुछ पल जीवन में ऐसे आते हैं, जो इंसान की पूरी सोच बदल देते हैं। अभिनेता राही के लिए ऐसा पल तब आया जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म वो लड़की की शूटिंग पूरी की और महसूस किया कि यह सिर्फ डेब्यू नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम है। एक शिक्षक के बेटे और outsider के लिए यह सफर जितना चुनौतीपूर्ण था, उतना ही प्रेरक भी।

राही का जन्म 5 जुलाई 1997 को मुगलसराय गांव, सिरोंज, मध्य प्रदेश में हुआ। उनके पिता, मंगीलाल अहिरवार, सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं और मां कमर बाई अहिरवार एक गृहिणी हैं। राही का परिवार बड़ा था। उनके पिता, मंगीलाल अहिरवार, छह भाई हैं। रोज़ाना अपने स्कूल, जो दूसरे गाँव में था, साइकिल से जाते और शाम को लौटते, जबकि बाकी भाई काम पर चले जाते। घर की सारी जिम्मेदारियाँ उनकी मां, कमर बाई अहिरवार, संभालती थीं—खाना बनाना, बच्चों का ख्याल रखना और घर के सारे काम निपटाना।

इसके बावजूद, राही कभी स्कूल के लिए लेट नहीं हुआ। मां ने अपने काम के बाद भी सुनिश्चित किया कि राही समय पर स्कूल पहुँचे, खाना खाए, सेहत ठीक रहे और पहनावा साफ-सुथरा हो। उन्होंने यह भी ध्यान रखा कि राही गलत संगति में न पड़े, यानी ऐसे बच्चों के संपर्क में न रहे जो बुरा असर डाल सकते थे।

पिता किताबों और सीखने के शौकीन थे, वहीं मां ने घर और बच्चों की देखभाल में perfection दिखाई। यह संयोजन—पिता की curiosity और मां की nurturing careराही को grounded और self-disciplined बनाने वाला रहा। इसके अलावा पिता की आधुनिक gadgets और technology में रुचि ने राही में सीखने और खोजने की उत्सुकता पैदा की, जो आगे चलकर उनके academic और acting journey में काम आई।

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मुगलसराय के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के दौरान राही ने समझा कि शिक्षा और मेहनत ही जीवन की बुनियाद हैं। लेकिन पहली बार achievement का एहसास उन्हें तब हुआ जब उन्होंने JNVST selection test पास किया और 2008 में JNV Vidisha में प्रवेश पाया। उनके गांव में यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी; Navodaya का चयन पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गया क्योंकि राही गांव से Navodaya जाने वाले दूसरे छात्र थे। माता-पिता और आसपास के लोग गर्व महसूस करने लगे।

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“Navodaya में चयन मेरे लिए पहली बार यह एहसास था कि मैं किसी चीज़ के योग्य हूं,” राही बताते हैं। यही पहला पल था जब उन्होंने सच में महसूस किया कि मेहनत का कोई न कोई परिणाम जरूर मिलता है।

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कक्षा 9–10 के दौरान Navodaya में करियर को लेकर गंभीर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं, क्योंकि 11वीं में विषय चयन का फैसला लेना होता है। राही पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन उनका मन किसी एक काम में ठहरता नहीं था। इसी दौरान स्कूल की लाइब्रेरी में उन्हें नाटकों और रंगमंच से जुड़ी एक किताब मिली। उस किताब को पढ़ते-पढ़ते अभिनय का बीज भीतर गहराता चला गया।

राही को लगने लगा कि अभिनय ही ऐसा माध्यम है, जहां इंसान को अलग-अलग जीवन जीने का मौका मिलता है—और शायद यही उनके स्वभाव के सबसे करीब था। कक्षा 10 के बाद छुट्टियों में जब वे घर लौटे, तो उन्होंने अपने पिता के सामने Navodaya छोड़कर मुंबई जाने की इच्छा रखी। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि यह फैसला तुरंत लिया जा सके। पिता ने साफ कहा—पहले 12वीं पूरी करो।

इस टकराव का असर राही पर गहरा पड़ा। Navodaya लौटने के बाद वे कुछ महीनों तक मानसिक रूप से टूटे रहे। इसका प्रभाव उनकी पढ़ाई पर भी पड़ा, लेकिन इसी दौर ने उन्हें यह भी सिखाया कि सपनों का रास्ता अक्सर अकेलापन और धैर्य मांगता है।

Navodaya और स्कूलिंग ने उन्हें अनुशासित और मेहनती बनाया, लेकिन अभिनय की दुनिया में सफर आसान नहीं था। कई सालों तक ऑडिशन देने के बावजूद केवल 1–2 मिनट के छोटे टीवी रोल ही मिले। अवसरों का इंतजार लंबा रहा, और अक्सर लगा कि यह रास्ता बहुत कठिन है। इस दौर में राही के पिता ने कहा कि वे सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन राही की ज़िद के आगे पिता की सलाह भी नहीं चली।

अच्छे रोल न मिलने पर राही ने independent film-making का रास्ता अपनाया। उन्होंने अपनी फिल्म लिखी और खुद ही प्रोड्यूस भी कर दी। 

राही की कहानी यह दिखाती है कि शिक्षा और अनुशासन के साथ-साथ साहस और आत्म-विश्वास ही इंसान को बड़े सपनों तक ले जा सकते हैं।वो लड़कीउनके लिए केवल पहला कदम है; आगे का सफर चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन अब उनके पास अनुभव, आत्मविश्वास और पहचान है।

यह कहानी सिर्फ राही की नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की भी है, जो छोटे गांवों और सामान्य परिवारों से बड़े सपनों की ओर बढ़ रहे हैं।

 

Instagram - https://www.instagram.com/raahi_official_/ 

 

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17 Jan 2026 By दैनिक जागरण

फिल्म ‘वो लड़की’ से डेब्यू कर रहे अभिनेता ‘राही’ की कहानी…

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कुछ पल जीवन में ऐसे आते हैं, जो इंसान की पूरी सोच बदल देते हैं। अभिनेता राही के लिए ऐसा पल तब आया जब उन्होंने अपनी पहली फिल्म वो लड़की की शूटिंग पूरी की और महसूस किया कि यह सिर्फ डेब्यू नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम है। एक शिक्षक के बेटे और outsider के लिए यह सफर जितना चुनौतीपूर्ण था, उतना ही प्रेरक भी।

राही का जन्म 5 जुलाई 1997 को मुगलसराय गांव, सिरोंज, मध्य प्रदेश में हुआ। उनके पिता, मंगीलाल अहिरवार, सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं और मां कमर बाई अहिरवार एक गृहिणी हैं। राही का परिवार बड़ा था। उनके पिता, मंगीलाल अहिरवार, छह भाई हैं। रोज़ाना अपने स्कूल, जो दूसरे गाँव में था, साइकिल से जाते और शाम को लौटते, जबकि बाकी भाई काम पर चले जाते। घर की सारी जिम्मेदारियाँ उनकी मां, कमर बाई अहिरवार, संभालती थीं—खाना बनाना, बच्चों का ख्याल रखना और घर के सारे काम निपटाना।

इसके बावजूद, राही कभी स्कूल के लिए लेट नहीं हुआ। मां ने अपने काम के बाद भी सुनिश्चित किया कि राही समय पर स्कूल पहुँचे, खाना खाए, सेहत ठीक रहे और पहनावा साफ-सुथरा हो। उन्होंने यह भी ध्यान रखा कि राही गलत संगति में न पड़े, यानी ऐसे बच्चों के संपर्क में न रहे जो बुरा असर डाल सकते थे।

पिता किताबों और सीखने के शौकीन थे, वहीं मां ने घर और बच्चों की देखभाल में perfection दिखाई। यह संयोजन—पिता की curiosity और मां की nurturing careराही को grounded और self-disciplined बनाने वाला रहा। इसके अलावा पिता की आधुनिक gadgets और technology में रुचि ने राही में सीखने और खोजने की उत्सुकता पैदा की, जो आगे चलकर उनके academic और acting journey में काम आई।

मुगलसराय के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के दौरान राही ने समझा कि शिक्षा और मेहनत ही जीवन की बुनियाद हैं। लेकिन पहली बार achievement का एहसास उन्हें तब हुआ जब उन्होंने JNVST selection test पास किया और 2008 में JNV Vidisha में प्रवेश पाया। उनके गांव में यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी; Navodaya का चयन पूरे गांव में चर्चा का विषय बन गया क्योंकि राही गांव से Navodaya जाने वाले दूसरे छात्र थे। माता-पिता और आसपास के लोग गर्व महसूस करने लगे।

“Navodaya में चयन मेरे लिए पहली बार यह एहसास था कि मैं किसी चीज़ के योग्य हूं,” राही बताते हैं। यही पहला पल था जब उन्होंने सच में महसूस किया कि मेहनत का कोई न कोई परिणाम जरूर मिलता है।

कक्षा 9–10 के दौरान Navodaya में करियर को लेकर गंभीर चर्चाएं शुरू हो जाती हैं, क्योंकि 11वीं में विषय चयन का फैसला लेना होता है। राही पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन उनका मन किसी एक काम में ठहरता नहीं था। इसी दौरान स्कूल की लाइब्रेरी में उन्हें नाटकों और रंगमंच से जुड़ी एक किताब मिली। उस किताब को पढ़ते-पढ़ते अभिनय का बीज भीतर गहराता चला गया।

राही को लगने लगा कि अभिनय ही ऐसा माध्यम है, जहां इंसान को अलग-अलग जीवन जीने का मौका मिलता है—और शायद यही उनके स्वभाव के सबसे करीब था। कक्षा 10 के बाद छुट्टियों में जब वे घर लौटे, तो उन्होंने अपने पिता के सामने Navodaya छोड़कर मुंबई जाने की इच्छा रखी। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि यह फैसला तुरंत लिया जा सके। पिता ने साफ कहा—पहले 12वीं पूरी करो।

इस टकराव का असर राही पर गहरा पड़ा। Navodaya लौटने के बाद वे कुछ महीनों तक मानसिक रूप से टूटे रहे। इसका प्रभाव उनकी पढ़ाई पर भी पड़ा, लेकिन इसी दौर ने उन्हें यह भी सिखाया कि सपनों का रास्ता अक्सर अकेलापन और धैर्य मांगता है।

Navodaya और स्कूलिंग ने उन्हें अनुशासित और मेहनती बनाया, लेकिन अभिनय की दुनिया में सफर आसान नहीं था। कई सालों तक ऑडिशन देने के बावजूद केवल 1–2 मिनट के छोटे टीवी रोल ही मिले। अवसरों का इंतजार लंबा रहा, और अक्सर लगा कि यह रास्ता बहुत कठिन है। इस दौर में राही के पिता ने कहा कि वे सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन राही की ज़िद के आगे पिता की सलाह भी नहीं चली।

अच्छे रोल न मिलने पर राही ने independent film-making का रास्ता अपनाया। उन्होंने अपनी फिल्म लिखी और खुद ही प्रोड्यूस भी कर दी। 

राही की कहानी यह दिखाती है कि शिक्षा और अनुशासन के साथ-साथ साहस और आत्म-विश्वास ही इंसान को बड़े सपनों तक ले जा सकते हैं।वो लड़कीउनके लिए केवल पहला कदम है; आगे का सफर चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन अब उनके पास अनुभव, आत्मविश्वास और पहचान है।

यह कहानी सिर्फ राही की नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की भी है, जो छोटे गांवों और सामान्य परिवारों से बड़े सपनों की ओर बढ़ रहे हैं।

 

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