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रूसी तेल पर अमेरिका की छूट खत्म, भारत की ऊर्जा रणनीति पर असर
बिजनेस न्यूज
US ने जनरल लाइसेंस रिन्यू करने से किया इनकार; 11 अप्रैल के बाद रूस से तेल आयात पर बढ़ी अनिश्चितता
अमेरिका ने रूस और ईरान से कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही अस्थायी छूट को समाप्त करने का फैसला किया है, जिससे भारत सहित कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है। यह छूट 11 अप्रैल तक सीमित थी और अब इसे आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया गया है। इस फैसले के बाद रूस से तेल आयात को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई है।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह राहत केवल उन तेल खेपों के लिए थी जो निर्धारित अवधि से पहले समुद्र में भेजी जा चुकी थीं। अब नई खेपों पर किसी भी प्रकार की छूट लागू नहीं होगी। इस कदम का सीधा असर उन देशों पर पड़ेगा, जो प्रतिबंधों के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीद रहे थे।
मार्च की शुरुआत में तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी को देखते हुए कुछ देशों को सीमित अवधि के लिए राहत दी गई थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं। सप्लाई बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह अस्थायी कदम उठाया गया था।
भारत, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ने हाल के महीनों में रूस से तेल खरीद में तेजी लाई थी। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में रूस से आयात करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था, जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर रहा। हालांकि अप्रैल में इसमें कुछ गिरावट दर्ज की गई, जिसे विशेषज्ञ अस्थायी मान रहे हैं।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि मध्य-पूर्व में जारी तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं के चलते भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता और प्रमुख समुद्री मार्गों पर जोखिम ने वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया है।
भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल उपभोक्ताओं में शामिल है और अपनी जरूरतों का लगभग 85-90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय नीति बदलाव का सीधा असर घरेलू बाजार और ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
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रूसी तेल पर अमेरिका की छूट खत्म, भारत की ऊर्जा रणनीति पर असर
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अमेरिका ने रूस और ईरान से कच्चे तेल की खरीद पर दी जा रही अस्थायी छूट को समाप्त करने का फैसला किया है, जिससे भारत सहित कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है। यह छूट 11 अप्रैल तक सीमित थी और अब इसे आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया गया है। इस फैसले के बाद रूस से तेल आयात को लेकर नई अनिश्चितता पैदा हो गई है।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह राहत केवल उन तेल खेपों के लिए थी जो निर्धारित अवधि से पहले समुद्र में भेजी जा चुकी थीं। अब नई खेपों पर किसी भी प्रकार की छूट लागू नहीं होगी। इस कदम का सीधा असर उन देशों पर पड़ेगा, जो प्रतिबंधों के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीद रहे थे।
मार्च की शुरुआत में तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी को देखते हुए कुछ देशों को सीमित अवधि के लिए राहत दी गई थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं। सप्लाई बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह अस्थायी कदम उठाया गया था।
भारत, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ने हाल के महीनों में रूस से तेल खरीद में तेजी लाई थी। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में रूस से आयात करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था, जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर रहा। हालांकि अप्रैल में इसमें कुछ गिरावट दर्ज की गई, जिसे विशेषज्ञ अस्थायी मान रहे हैं।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि मध्य-पूर्व में जारी तनाव और सप्लाई चेन में बाधाओं के चलते भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता और प्रमुख समुद्री मार्गों पर जोखिम ने वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया है।
भारत दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल उपभोक्ताओं में शामिल है और अपनी जरूरतों का लगभग 85-90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय नीति बदलाव का सीधा असर घरेलू बाजार और ईंधन कीमतों पर पड़ता है।
