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कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल पर लौटा, पेट्रोल-डीजल में राहत के लिए करना होगा इंतजार
बिजनेस डेस्क
ईरान तनाव कम होने के बाद वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल सस्ता हुआ, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी आने में अभी करीब ढाई महीने का समय लग सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर उस स्तर पर पहुंच गई हैं, जहां वे ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने से पहले थीं। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। यह लगभग वही स्तर है, जो युद्ध जैसे हालात बनने से पहले दर्ज किया गया था। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने से उम्मीद जरूर बढ़ी है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को इसका फायदा तुरंत मिलने वाला नहीं है। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होना माना जा रहा है। हाल के दिनों में हुई बातचीत के बाद ईरानी तेल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही फिर बढ़ने लगी है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। जहाजों की संख्या बढ़ने से बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कम हुई और इसका असर सीधे कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला।
अभी भी जहाजों की आवाजाही पहले जैसी सामान्य नहीं हुई है। युद्ध से पहले जहां प्रतिदिन 100 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या उससे कुछ कम बनी हुई है। इसके बावजूद बाजार को यह भरोसा मिला है कि आने वाले समय में तेल की आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने का असर सीधे पेट्रोल पंपों पर नहीं दिखता। इसकी सबसे बड़ी वजह तेल की खरीद और सप्लाई की लंबी प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल जिन पेट्रोल और डीजल उत्पादों की बिक्री हो रही है, वे उस कच्चे तेल से तैयार किए गए हैं, जिसे उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें काफी अधिक थीं। ऐसे में वर्तमान में सस्ता हुआ कच्चा तेल अभी उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लेगा।
किसी भी देश से खरीदा गया कच्चा तेल पहले वहां के बंदरगाहों तक पहुंचता है और फिर जहाजों में लोड किया जाता है। इसके बाद समुद्री रास्ते से भारत आने में लगभग दो महीने तक का समय लग सकता है। भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने के बाद तेल को रिफाइनरियों में भेजा जाता है, जहां उससे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके बाद यह ईंधन देशभर के डिपो और पेट्रोल पंपों तक पहुंचता है। पूरी प्रक्रिया में करीब 75 से 80 दिन लग जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने के बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है। अगर मौजूदा स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर बनी रहती हैं तो अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत से कुछ असर दिखाई देना शुरू हो सकता है। वहीं पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वास्तविक राहत दशहरे के आसपास मिलने की संभावना जताई जा रही है।
एक और महत्वपूर्ण कारण तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी है। कंपनियां पिछले कुछ समय से पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान झेल रही हैं। इसके अलावा सरकार ने पहले उत्पाद शुल्क में भी कटौती की थी, जिससे राजस्व पर असर पड़ा। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमतें कम बनी रहती हैं तो शुरुआती अवधि में कंपनियां अपने नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर सकती हैं। इसके बाद ही खुदरा कीमतों में कटौती का फैसला लिया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां पहले की तुलना में काफी स्थिर दिखाई दे रही हैं। यदि पश्चिम एशिया में दोबारा कोई बड़ा तनाव नहीं बढ़ता और तेल आपूर्ति सामान्य रहती है तो निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आने की संभावना कम है। इससे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों को राहत मिल सकती है और महंगाई पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।
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कच्चा तेल 72 डॉलर प्रति बैरल पर लौटा, पेट्रोल-डीजल में राहत के लिए करना होगा इंतजार
बिजनेस डेस्क
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर उस स्तर पर पहुंच गई हैं, जहां वे ईरान से जुड़े तनाव शुरू होने से पहले थीं। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखाई दिया। यह लगभग वही स्तर है, जो युद्ध जैसे हालात बनने से पहले दर्ज किया गया था। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने से उम्मीद जरूर बढ़ी है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ताओं को इसका फायदा तुरंत मिलने वाला नहीं है। तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होना माना जा रहा है। हाल के दिनों में हुई बातचीत के बाद ईरानी तेल के निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही फिर बढ़ने लगी है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। जहाजों की संख्या बढ़ने से बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता कम हुई और इसका असर सीधे कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला।
अभी भी जहाजों की आवाजाही पहले जैसी सामान्य नहीं हुई है। युद्ध से पहले जहां प्रतिदिन 100 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते थे, वहीं अब यह संख्या उससे कुछ कम बनी हुई है। इसके बावजूद बाजार को यह भरोसा मिला है कि आने वाले समय में तेल की आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने का असर सीधे पेट्रोल पंपों पर नहीं दिखता। इसकी सबसे बड़ी वजह तेल की खरीद और सप्लाई की लंबी प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि फिलहाल जिन पेट्रोल और डीजल उत्पादों की बिक्री हो रही है, वे उस कच्चे तेल से तैयार किए गए हैं, जिसे उस समय खरीदा गया था जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें काफी अधिक थीं। ऐसे में वर्तमान में सस्ता हुआ कच्चा तेल अभी उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लेगा।
किसी भी देश से खरीदा गया कच्चा तेल पहले वहां के बंदरगाहों तक पहुंचता है और फिर जहाजों में लोड किया जाता है। इसके बाद समुद्री रास्ते से भारत आने में लगभग दो महीने तक का समय लग सकता है। भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने के बाद तेल को रिफाइनरियों में भेजा जाता है, जहां उससे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके बाद यह ईंधन देशभर के डिपो और पेट्रोल पंपों तक पहुंचता है। पूरी प्रक्रिया में करीब 75 से 80 दिन लग जाते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें घटने के बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है। अगर मौजूदा स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें स्थिर बनी रहती हैं तो अगस्त के आखिर या सितंबर की शुरुआत से कुछ असर दिखाई देना शुरू हो सकता है। वहीं पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वास्तविक राहत दशहरे के आसपास मिलने की संभावना जताई जा रही है।
एक और महत्वपूर्ण कारण तेल विपणन कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी है। कंपनियां पिछले कुछ समय से पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर नुकसान झेल रही हैं। इसके अलावा सरकार ने पहले उत्पाद शुल्क में भी कटौती की थी, जिससे राजस्व पर असर पड़ा। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमतें कम बनी रहती हैं तो शुरुआती अवधि में कंपनियां अपने नुकसान की भरपाई करने की कोशिश कर सकती हैं। इसके बाद ही खुदरा कीमतों में कटौती का फैसला लिया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां पहले की तुलना में काफी स्थिर दिखाई दे रही हैं। यदि पश्चिम एशिया में दोबारा कोई बड़ा तनाव नहीं बढ़ता और तेल आपूर्ति सामान्य रहती है तो निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी तेजी आने की संभावना कम है। इससे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों को राहत मिल सकती है और महंगाई पर भी सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।
