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दुनिया के सबसे बड़े तेल संकट का असर भारतीय उपभोक्ताओं को क्यों महसूस नहीं हुआ
Digital Desk
पिछले दो महीनों में दुनिया ने दशकों के सबसे गंभीर ऊर्जा संकटों में से एक का सामना किया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ — जहां से दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल और वैश्विक LNG व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा गुजरता है — पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण गंभीर व्यवधान के खतरे के करीब पहुंच गया था।
कुछ ही हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 126 डॉलर तक पहुंच गईं, यानी 72% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। शिपिंग लागत में तेज बढ़ोतरी हुई, LNG आपूर्ति प्रभावित हुई और दुनिया भर की सरकारों ने ईंधन राशनिंग, ऊर्जा बचत सलाह, कम कार्य सप्ताह और सीधे ईंधन मूल्य वृद्धि जैसे आपातकालीन कदम उठाने शुरू कर दिए।
वैश्विक ऊर्जा विशेषज्ञों ने इस स्थिति को गल्फ वॉर के बाद का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट बताया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि होर्मुज़ में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में व्यापक महंगाई की लहर पैदा हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में लगातार यह रेखांकित किया गया कि आयातित ऊर्जा पर निर्भर देशों के सामने आपूर्ति सुरक्षा बनाए रखने और उपभोक्ताओं को बढ़ती महंगाई से बचाने की दोहरी चुनौती होगी।
ऐसे माहौल में भारत की प्रतिक्रिया लचीलापन और दूरदर्शी तैयारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल होने और ऐतिहासिक रूप से लगभग 88% कच्चे तेल की आपूर्ति होर्मुज़ मार्ग से जुड़ी होने के बावजूद, भारत ने आम उपभोक्ताओं के दैनिक जीवन को लगभग पूरी तरह सामान्य बनाए रखा। पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर रहे, देशभर में LPG की आपूर्ति निर्बाध जारी रही और कहीं भी खुले तौर पर कमी, राशनिंग या दैनिक जीवन में व्यवधान देखने को नहीं मिला।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह समन्वित नीतिगत योजना और दीर्घकालिक ऊर्जा तैयारी का परिणाम है, जिसने वैश्विक अस्थिरता का सीधा असर घरों तक पहुंचने से रोका। संकट पर नजर रखने वाले कई अर्थशास्त्रियों ने कहा कि जहां कई देशों ने कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया, वहीं भारत ने स्थिरता बनाए रखने के लिए इस अस्थिरता का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया।
जैसे-जैसे संकट बढ़ा, भारत ने कई मोर्चों पर तेजी से कदम उठाए। रिफाइनरियों को LPG उत्पादन अधिकतम करने के निर्देश दिए गए, जिससे घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को घरेलू उपयोग, सार्वजनिक परिवहन और उर्वरक संयंत्रों के लिए प्राथमिकता दी गई ताकि आवश्यक क्षेत्रों पर असर न पड़े।
साथ ही, भारत ने खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम करते हुए रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई। रणनीतिक भंडार, उच्च रिफाइनरी क्षमता और मजबूत ईंधन वितरण नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि वैश्विक बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में ईंधन आपूर्ति बाधित न हो।
कीमतों के मोर्चे पर भी सरकार ने अहम भूमिका निभाई। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती की गई, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में हुई वृद्धि का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया, बजाय इसके कि उसका पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाए। कच्चे तेल की कीमतें चरम पर पहुंचने के दौरान यह भार पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹30 प्रति लीटर तक बताया गया। इससे वैश्विक बाजार में तेज उछाल के बावजूद खुदरा ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए रखने में मदद मिली।
दुनिया के अन्य देशों की प्रतिक्रियाओं की तुलना में भारत का दृष्टिकोण अलग दिखाई दिया। बांग्लादेश ने ईंधन राशनिंग लागू की। श्रीलंका ने चार दिन का कार्य सप्ताह और ईंधन पास प्रणाली शुरू की। फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित किया, जबकि दक्षिण कोरिया ने दशकों में पहली बार ईंधन मूल्य सीमा लागू की। यूरोप के कई देशों को बढ़ती खुदरा ईंधन
कीमतों के बीच बड़े सब्सिडी पैकेज जारी करने पड़े। वहीं भारत ने बिना किसी बड़े व्यवधान के स्थिरता बनाए रखी।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि आज दिखाई दे रही यह मजबूती कई वर्षों की संरचनात्मक निवेश योजनाओं और नीतिगत सुधारों का परिणाम है। पिछले एक दशक में भारत ने LPG अवसंरचना का विस्तार किया, आयात टर्मिनलों की संख्या दोगुनी की, रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई, कच्चे तेल के स्रोतों को 27 देशों से बढ़ाकर 40 देशों तक विविधीकृत किया, एथेनॉल ब्लेंडिंग को गति दी और स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व विकसित किए। तेल और गैस क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि इन दीर्घकालिक कदमों ने ही आज भारत को दुनिया के सबसे कठिन ऊर्जा संकटों में से एक का सामना करने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
हालांकि यह संकट अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और उपभोक्ताओं को राहत देने की वित्तीय लागत भी काफी बड़ी रही है, फिर भी व्यापक स्तर पर इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश स्पष्ट है। हाल के इतिहास के सबसे बड़े वैश्विक तेल संकटों में से एक के दौरान भारत ने वैश्विक ऊर्जा संकट को घरेलू संकट बनने से रोक दिया। अधिकांश भारतीय उपभोक्ताओं के लिए दैनिक जीवन सामान्य बना रहा, जो देश की ऊर्जा व्यवस्था में दीर्घकालिक योजना, समन्वय और निवेश की मजबूती को दर्शाता है।
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दुनिया के सबसे बड़े तेल संकट का असर भारतीय उपभोक्ताओं को क्यों महसूस नहीं हुआ
Digital Desk
कुछ ही हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 126 डॉलर तक पहुंच गईं, यानी 72% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। शिपिंग लागत में तेज बढ़ोतरी हुई, LNG आपूर्ति प्रभावित हुई और दुनिया भर की सरकारों ने ईंधन राशनिंग, ऊर्जा बचत सलाह, कम कार्य सप्ताह और सीधे ईंधन मूल्य वृद्धि जैसे आपातकालीन कदम उठाने शुरू कर दिए।
वैश्विक ऊर्जा विशेषज्ञों ने इस स्थिति को गल्फ वॉर के बाद का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट बताया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि होर्मुज़ में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है, तो ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में व्यापक महंगाई की लहर पैदा हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में लगातार यह रेखांकित किया गया कि आयातित ऊर्जा पर निर्भर देशों के सामने आपूर्ति सुरक्षा बनाए रखने और उपभोक्ताओं को बढ़ती महंगाई से बचाने की दोहरी चुनौती होगी।
ऐसे माहौल में भारत की प्रतिक्रिया लचीलापन और दूरदर्शी तैयारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल होने और ऐतिहासिक रूप से लगभग 88% कच्चे तेल की आपूर्ति होर्मुज़ मार्ग से जुड़ी होने के बावजूद, भारत ने आम उपभोक्ताओं के दैनिक जीवन को लगभग पूरी तरह सामान्य बनाए रखा। पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर रहे, देशभर में LPG की आपूर्ति निर्बाध जारी रही और कहीं भी खुले तौर पर कमी, राशनिंग या दैनिक जीवन में व्यवधान देखने को नहीं मिला।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह समन्वित नीतिगत योजना और दीर्घकालिक ऊर्जा तैयारी का परिणाम है, जिसने वैश्विक अस्थिरता का सीधा असर घरों तक पहुंचने से रोका। संकट पर नजर रखने वाले कई अर्थशास्त्रियों ने कहा कि जहां कई देशों ने कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया, वहीं भारत ने स्थिरता बनाए रखने के लिए इस अस्थिरता का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया।
जैसे-जैसे संकट बढ़ा, भारत ने कई मोर्चों पर तेजी से कदम उठाए। रिफाइनरियों को LPG उत्पादन अधिकतम करने के निर्देश दिए गए, जिससे घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को घरेलू उपयोग, सार्वजनिक परिवहन और उर्वरक संयंत्रों के लिए प्राथमिकता दी गई ताकि आवश्यक क्षेत्रों पर असर न पड़े।
साथ ही, भारत ने खाड़ी क्षेत्र पर निर्भरता कम करते हुए रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई। रणनीतिक भंडार, उच्च रिफाइनरी क्षमता और मजबूत ईंधन वितरण नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि वैश्विक बाजार में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद देश में ईंधन आपूर्ति बाधित न हो।
कीमतों के मोर्चे पर भी सरकार ने अहम भूमिका निभाई। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती की गई, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में हुई वृद्धि का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया, बजाय इसके कि उसका पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाए। कच्चे तेल की कीमतें चरम पर पहुंचने के दौरान यह भार पेट्रोल पर लगभग ₹24 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹30 प्रति लीटर तक बताया गया। इससे वैश्विक बाजार में तेज उछाल के बावजूद खुदरा ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए रखने में मदद मिली।
दुनिया के अन्य देशों की प्रतिक्रियाओं की तुलना में भारत का दृष्टिकोण अलग दिखाई दिया। बांग्लादेश ने ईंधन राशनिंग लागू की। श्रीलंका ने चार दिन का कार्य सप्ताह और ईंधन पास प्रणाली शुरू की। फिलीपींस ने राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित किया, जबकि दक्षिण कोरिया ने दशकों में पहली बार ईंधन मूल्य सीमा लागू की। यूरोप के कई देशों को बढ़ती खुदरा ईंधन
कीमतों के बीच बड़े सब्सिडी पैकेज जारी करने पड़े। वहीं भारत ने बिना किसी बड़े व्यवधान के स्थिरता बनाए रखी।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि आज दिखाई दे रही यह मजबूती कई वर्षों की संरचनात्मक निवेश योजनाओं और नीतिगत सुधारों का परिणाम है। पिछले एक दशक में भारत ने LPG अवसंरचना का विस्तार किया, आयात टर्मिनलों की संख्या दोगुनी की, रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई, कच्चे तेल के स्रोतों को 27 देशों से बढ़ाकर 40 देशों तक विविधीकृत किया, एथेनॉल ब्लेंडिंग को गति दी और स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व विकसित किए। तेल और गैस क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि इन दीर्घकालिक कदमों ने ही आज भारत को दुनिया के सबसे कठिन ऊर्जा संकटों में से एक का सामना करने के लिए मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
हालांकि यह संकट अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और उपभोक्ताओं को राहत देने की वित्तीय लागत भी काफी बड़ी रही है, फिर भी व्यापक स्तर पर इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश स्पष्ट है। हाल के इतिहास के सबसे बड़े वैश्विक तेल संकटों में से एक के दौरान भारत ने वैश्विक ऊर्जा संकट को घरेलू संकट बनने से रोक दिया। अधिकांश भारतीय उपभोक्ताओं के लिए दैनिक जीवन सामान्य बना रहा, जो देश की ऊर्जा व्यवस्था में दीर्घकालिक योजना, समन्वय और निवेश की मजबूती को दर्शाता है।
