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तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में ‘धीरे जीना’ क्यों अब ज़रूरत बन चुका है
लाइफस्टाइल डेस्क
तेज़ रफ्तार दुनिया में धीरे जीना अब विकल्प नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिए जरूरी कदम बन चुका है। रुककर सोचना, सीमाएं तय करना और वर्तमान में जीना—यही भविष्य की सेहत की कुंजी मानी जा रही है।
काम की डेडलाइन, मोबाइल नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया और 24×7 कनेक्टेड रहने की आदत ने ज़िंदगी की रफ्तार को पहले से कहीं ज्यादा तेज कर दिया है। इसी तेज़ी के बीच अब “धीरे जीने” यानी Slow Living की अवधारणा पर चर्चा बढ़ रही है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सामाजिक शोधकर्ता और डॉक्टर मानते हैं कि मौजूदा समय में धीरे जीना कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखने की जरूरत बन चुका है।
क्या है ‘धीरे जीने’ की अवधारणा
धीरे जीने का मतलब काम छोड़ देना या जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। इसका आशय है—काम, रिश्तों और रोजमर्रा की गतिविधियों को सोच-समझकर, सीमाओं के साथ और तनाव कम करते हुए करना। यह ट्रेंड खासतौर पर शहरी भारत में तेजी से उभर रहा है, जहां तनाव, अनिद्रा और चिंता के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
क्यों जरूरी हो गया है धीमा जीवन
विश्व स्वास्थ्य संगठनों और भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की रिपोर्टें बताती हैं कि तनाव से जुड़ी बीमारियां अब युवाओं तक सीमित नहीं रहीं। लगातार भागदौड़, मल्टीटास्किंग और “हर समय उपलब्ध रहने” की मानसिकता लोगों को थकान, चिड़चिड़ापन और बर्नआउट की ओर धकेल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, धीमा जीवन अपनाने से व्यक्ति अपने शरीर और मन के संकेतों को समझ पाता है।
कामकाज की संस्कृति में बदलाव की मांग
कॉरपोरेट सेक्टर में लंबे वर्किंग ऑवर्स और डिजिटल प्रेशर ने धीरे जीने की जरूरत को और स्पष्ट किया है। कई कंपनियां अब वर्क-लाइफ बैलेंस पर जोर दे रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर काम की गति नियंत्रित न की जाए, तो उत्पादकता के बजाय स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है।
रिश्तों और सामाजिक जीवन पर असर
तेज़ जीवनशैली का असर सिर्फ शरीर पर नहीं, बल्कि रिश्तों पर भी दिख रहा है। परिवार के साथ समय की कमी, बातचीत में जल्दबाजी और ध्यान की कमी रिश्तों को कमजोर कर रही है। धीरे जीने की आदत लोगों को सुनने, समझने और साथ समय बिताने का मौका देती है, जिससे सामाजिक जुड़ाव मजबूत होता है।
कैसे अपनाया जा रहा है स्लो लिविंग
शहरों में लोग अब छोटे बदलावों से शुरुआत कर रहे हैं—जैसे बिना मोबाइल के भोजन करना, रोज कुछ समय अकेले बिताना, जरूरत से ज्यादा काम न लेना और नींद को प्राथमिकता देना। योग, ध्यान और वॉक जैसी गतिविधियां भी इस दिशा में मददगार मानी जा रही हैं।
विशेषज्ञों की राय
मनोचिकित्सकों का कहना है कि धीरे जीने से निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है और तनाव हार्मोन का स्तर कम होता है। इससे न सिर्फ मानसिक शांति मिलती है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता भी सुधरती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में Slow Living केवल लाइफस्टाइल ट्रेंड नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा अहम मुद्दा बनेगा। स्कूलों, दफ्तरों और समाज में संतुलित जीवनशैली को बढ़ावा देने की जरूरत होगी।
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