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आचार्य प्रशांत के विचारों में चेतना, साहस और सत्य पर जोर, बोले— जीवन का उद्देश्य केवल सुख नहीं, आंतरिक स्वतंत्रता है
जीवन के मंत्र
आध्यात्मिक विमर्श में आचार्य प्रशांत ने जागरूकता, निर्भय कर्म और आत्म-खोज को बताया आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी जरूरत
आचार्य प्रशांत के अनुसार जीवन का लक्ष्य केवल भौतिक सुख या उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि चेतना का विकास और आंतरिक स्वतंत्रता है।वे मानते हैं कि सत्य अक्सर कठोर होता है, लेकिन उसी को स्वीकार करने से भ्रम, डर और मानसिक उलझनें समाप्त होती हैं।यदि मन धन, प्रसिद्धि और बाहरी आकर्षणों में फंसा रहे, तो असंतोष बना रहता है।ऊँचे और सार्थक लक्ष्य मन को स्थिरता और स्पष्टता देते हैं।आचार्य प्रशांत कहते हैं कि डर और अनियंत्रित इच्छाएँ जीवन से बचने के तरीके हैं।सच्चा आनंद बाहरी निर्भरता में नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और जीतने में है।
आचार्य प्रशांत के 10 प्रेरक उद्धरण
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“गुरु कोई व्यक्ति या योग्यता नहीं है। गुरु वह मानसिक स्थिति है, जिसमें पूरी तरह डूबकर और ध्यान केंद्रित करके हम सीखने और अनुभव करने की क्षमता विकसित करते हैं। यही गहरा और सचमुच का गुरु है।”
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“आध्यात्मिकता जीवन का त्याग नहीं है, बल्कि इसे पूरी तरह जीने की कला है। यह हमें सिखाती है कि कैसे हर क्षण, हर अनुभव और हर चुनौती को पूरी चेतना के साथ अपनाया जाए।”
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“इस क्षण की गुणवत्ता ही जीवन की गुणवत्ता तय करती है। यदि हम वर्तमान में सजग, सचेत और ईमानदार रह सकते हैं, तो हमारा पूरा जीवन अपने आप संतुलित और अर्थपूर्ण बन जाता है।”
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“जीवन का उद्देश्य क्या है? यह उस बिंदु तक पहुँचना है, जहाँ हम इस प्रश्न की मूर्खता समझ सकें। वास्तविक जीवन की समझ हमें बाहरी लक्ष्य या पहचान की अपेक्षाओं से ऊपर उठना सिखाती है।”
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“सच्चा साथी वह है, जिसमें रहकर आप अकेलेपन का आनंद महसूस कर सकें, शांति और सहजता महसूस कर सकें। उसका साथ आपको मजबूर या बोझिल न बनाए, बल्कि स्वतंत्रता और संतुलन दे।”
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“जीवन एक भूमिका-निर्वाह है। हम जो भी भूमिका निभाते हैं, वह केवल सजगता, समझ और आत्मनिरीक्षण से ही सही तरीके से निभाई जा सकती है। अन्यथा, हम अपने जीवन को अधूरा और बिखरा हुआ महसूस करेंगे।”
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“जीवन आपको सताने, धोखा देने या हराने के लिए नहीं है। यह बस आपके साथ खेल रहा है। इसे समझें और सीखें कि कैसे जीवन के खेल में आप सजग और मज़ेदार ढंग से भाग ले सकते हैं।”
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“यदि अन्य लोग आपकी भविष्यवाणी कर सकते हैं, तो वे आपको नियंत्रित कर सकते हैं। अपनी स्वतंत्रता और सशक्तता बनाए रखने के लिए स्वयं की समझ और सजगता जरूरी है।”
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“सत्य के भीतर जब प्रकाश होता है, तब प्रेम स्वयं ही उसका विकिरण बन जाता है। सच्चा प्रेम किसी अपेक्षा या स्वार्थ के बिना, केवल प्रकाश और जागरूकता से उत्पन्न होता है।”
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“अच्छे शब्द की पहचान यही है कि वह आपको मौन और ध्यान की ओर ले जाए। यह शब्द केवल सुनने वाले को प्रभावित नहीं करता, बल्कि उसे भीतर की शांति और जागरूकता तक पहुँचाता है।”
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