छिंदवाड़ा जहरीला कफ सिरप कांड: हाईकोर्ट में डॉक्टर प्रवीण सोनी ने रखा पक्ष, बोले– दोष दवा कंपनी का, मैं जिम्मेदार नहीं

जबलपुर (म.प्र.)

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25 बच्चों की मौत से जुड़े मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई; कोर्ट ने सुनी आरोपी डॉक्टर की दलील, अगली सुनवाई 20 जनवरी को

छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से 25 मासूम बच्चों की मौत के बहुचर्चित मामले में शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस मामले में गिरफ्तार परासिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर प्रवीण सोनी ने अपनी जमानत याचिका पर अदालत के सामने पक्ष रखा। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों की मौत के लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि यह दवा निर्माता कंपनी की गंभीर लापरवाही का परिणाम है।

हाईकोर्ट ने आरोपी डॉक्टर की दलीलें सुनीं और मामले में अगली सुनवाई की तारीख 20 जनवरी तय की है। अगली सुनवाई में राज्य सरकार और अन्य हस्तक्षेपकर्ताओं का पक्ष रखा जाएगा। उल्लेखनीय है कि डॉक्टर प्रवीण सोनी 6 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में हैं और फिलहाल छिंदवाड़ा जेल में बंद हैं।

क्या है मामला

यह मामला तब सामने आया था, जब छिंदवाड़ा जिले में बच्चों को दिए गए कफ सिरप के सेवन के बाद एक के बाद एक मौतें दर्ज हुईं। जांच में सामने आया कि जिस कफ सिरप का इस्तेमाल किया गया, उसमें जहरीले तत्व मौजूद थे। इस घटना ने प्रदेश भर में स्वास्थ्य व्यवस्था और दवा सप्लाई सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

डॉक्टर का हाईकोर्ट में पक्ष

डॉ. प्रवीण सोनी की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्होंने बच्चों को उपचार के दौरान नियमानुसार दवा लिखी थी। दवा की गुणवत्ता, उसकी संरचना और उसमें किसी भी तरह के जहरीले तत्व की जिम्मेदारी पूरी तरह दवा निर्माता कंपनी की होती है। डॉक्टर ने कहा कि मेडिकल प्रैक्टिस के दौरान यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि हर चिकित्सक दवा की लैब रिपोर्ट या रासायनिक संरचना की व्यक्तिगत जांच करे।

कमीशन के आरोप भी चर्चा में

हालांकि, मामले में जांच एजेंसियों द्वारा लगाए गए आरोप डॉक्टर के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर कफ सिरप लिखने के बदले डॉक्टर को संबंधित फार्मा कंपनी से करीब 10 प्रतिशत कमीशन मिलता था। यह भी सामने आया कि कुछ दवाइयां डॉक्टर के पारिवारिक सदस्यों से जुड़ी मेडिकल दुकानों पर बेची जाती थीं। इन तथ्यों को अभियोजन पक्ष डॉक्टर की भूमिका को संदिग्ध बताने के आधार के रूप में पेश कर रहा है।

जांच का दायरा बढ़ा

सरकारी जांच एजेंसियों ने साफ किया है कि यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या कंपनी तक सीमित नहीं है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की रिपोर्ट के आधार पर दवा के स्टॉकिस्ट, होलसेलर और केमिस्ट की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई गई है। कुछ मामलों में सबूत मिटाने के आरोप भी सामने आए हैं, जिसके चलते आगे और गिरफ्तारियां संभव मानी जा रही हैं।

आगे क्या

हाईकोर्ट में अगली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार बच्चों की मौत में डॉक्टर की भूमिका, कमीशन के आरोप और दवा वितरण श्रृंखला की जिम्मेदारी पर अपना पक्ष रखेगी। यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि पब्लिक इंटरेस्ट स्टोरी के तौर पर भी पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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www.dainikjagranmpcg.com
16 Jan 2026 By Nitin Trivedi

छिंदवाड़ा जहरीला कफ सिरप कांड: हाईकोर्ट में डॉक्टर प्रवीण सोनी ने रखा पक्ष, बोले– दोष दवा कंपनी का, मैं जिम्मेदार नहीं

जबलपुर (म.प्र.)

छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से 25 मासूम बच्चों की मौत के बहुचर्चित मामले में शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस मामले में गिरफ्तार परासिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर प्रवीण सोनी ने अपनी जमानत याचिका पर अदालत के सामने पक्ष रखा। डॉक्टर ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों की मौत के लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि यह दवा निर्माता कंपनी की गंभीर लापरवाही का परिणाम है।

हाईकोर्ट ने आरोपी डॉक्टर की दलीलें सुनीं और मामले में अगली सुनवाई की तारीख 20 जनवरी तय की है। अगली सुनवाई में राज्य सरकार और अन्य हस्तक्षेपकर्ताओं का पक्ष रखा जाएगा। उल्लेखनीय है कि डॉक्टर प्रवीण सोनी 6 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में हैं और फिलहाल छिंदवाड़ा जेल में बंद हैं।

क्या है मामला

यह मामला तब सामने आया था, जब छिंदवाड़ा जिले में बच्चों को दिए गए कफ सिरप के सेवन के बाद एक के बाद एक मौतें दर्ज हुईं। जांच में सामने आया कि जिस कफ सिरप का इस्तेमाल किया गया, उसमें जहरीले तत्व मौजूद थे। इस घटना ने प्रदेश भर में स्वास्थ्य व्यवस्था और दवा सप्लाई सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

डॉक्टर का हाईकोर्ट में पक्ष

डॉ. प्रवीण सोनी की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्होंने बच्चों को उपचार के दौरान नियमानुसार दवा लिखी थी। दवा की गुणवत्ता, उसकी संरचना और उसमें किसी भी तरह के जहरीले तत्व की जिम्मेदारी पूरी तरह दवा निर्माता कंपनी की होती है। डॉक्टर ने कहा कि मेडिकल प्रैक्टिस के दौरान यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि हर चिकित्सक दवा की लैब रिपोर्ट या रासायनिक संरचना की व्यक्तिगत जांच करे।

कमीशन के आरोप भी चर्चा में

हालांकि, मामले में जांच एजेंसियों द्वारा लगाए गए आरोप डॉक्टर के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। पुलिस जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर कफ सिरप लिखने के बदले डॉक्टर को संबंधित फार्मा कंपनी से करीब 10 प्रतिशत कमीशन मिलता था। यह भी सामने आया कि कुछ दवाइयां डॉक्टर के पारिवारिक सदस्यों से जुड़ी मेडिकल दुकानों पर बेची जाती थीं। इन तथ्यों को अभियोजन पक्ष डॉक्टर की भूमिका को संदिग्ध बताने के आधार के रूप में पेश कर रहा है।

जांच का दायरा बढ़ा

सरकारी जांच एजेंसियों ने साफ किया है कि यह मामला सिर्फ एक डॉक्टर या कंपनी तक सीमित नहीं है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की रिपोर्ट के आधार पर दवा के स्टॉकिस्ट, होलसेलर और केमिस्ट की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई गई है। कुछ मामलों में सबूत मिटाने के आरोप भी सामने आए हैं, जिसके चलते आगे और गिरफ्तारियां संभव मानी जा रही हैं।

आगे क्या

हाईकोर्ट में अगली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार बच्चों की मौत में डॉक्टर की भूमिका, कमीशन के आरोप और दवा वितरण श्रृंखला की जिम्मेदारी पर अपना पक्ष रखेगी। यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि पब्लिक इंटरेस्ट स्टोरी के तौर पर भी पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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