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भारत समेत 17 देशों पर अमेरिका का नया 10% टैरिफ, जबरन मजदूरी से जुड़े व्यापार पर ट्रंप प्रशासन की सख्ती
Digital Desk
Section 301 के तहत अमेरिकी प्रशासन की नई कार्रवाई; भारत के लिए पहले 12.5% शुल्क प्रस्तावित था, बातचीत के बाद 10% स्लैब में रखा गया
अमेरिका ने अपनी व्यापार नीति में एक और बड़ा बदलाव करते हुए भारत समेत 17 देशों से आने वाले सामान पर 10 प्रतिशत का नया अतिरिक्त टैरिफ लागू किया है। यह कार्रवाई जबरन मजदूरी यानी Forced Labor से जुड़े सामान के व्यापार को रोकने के लिए की गई अमेरिकी जांच के बाद सामने आई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने Trade Act of 1974 के Section 301 के तहत कई अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की जांच की थी। भारत को इस कार्रवाई में अपेक्षाकृत कम 10 प्रतिशत वाले टैरिफ स्लैब में रखा गया है।
भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की संभावना थी। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच श्रम मानकों तथा जबरन मजदूरी से तैयार उत्पादों के व्यापार को रोकने के उपायों पर हुई बातचीत के बाद भारत को 10 प्रतिशत वाले निचले स्लैब में जगह मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय पक्ष की ओर से उठाए गए कदमों और बातचीत में हुई प्रगति ने टैरिफ दर कम रखने में भूमिका निभाई।
अमेरिकी प्रशासन का यह कदम सामान्य आयात शुल्क से अलग Section 301 की कार्रवाई का हिस्सा है। USTR ने मार्च 2026 में करीब 60 अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ जांच शुरू की थी। जांच का केंद्र यह था कि संबंधित देश जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम उठा रहे हैं या नहीं। जून में USTR ने अपनी जांच से जुड़े निष्कर्ष जारी किए और इसके बाद जुलाई में टैरिफ कार्रवाई की घोषणा की गई।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने इस फैसले को जबरन मजदूरी के खिलाफ अमेरिकी नीति से जोड़ा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका में लंबे समय से जबरन श्रम से तैयार वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध है और उसके व्यापारिक साझेदारों को भी ऐसी वस्तुओं को अपनी सप्लाई चेन में प्रवेश करने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए। USTR का कहना है कि कमजोर प्रवर्तन से उन कंपनियों और देशों को अनुचित व्यापारिक लाभ मिल सकता है जहां श्रम मानकों का पालन नहीं किया जाता।
भारत अकेला देश नहीं है जिस पर 10 प्रतिशत की दर लागू की गई है। कुल 60 व्यापारिक साझेदारों पर 10 या 12.5 प्रतिशत की दर से नई ड्यूटी लगाने की कार्रवाई की गई है। भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें कम 10 प्रतिशत वाले स्लैब में रखा गया है। इस समूह में कनाडा, ब्रिटेन, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल बताए गए हैं, जबकि कई अन्य व्यापारिक साझेदारों पर 12.5 प्रतिशत की दर लागू की गई है।
नए टैरिफ का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में प्रवेश करने वाला हर भारतीय उत्पाद एक समान तरीके से प्रभावित होगा। कुछ वस्तुएं और श्रेणियां इस कार्रवाई से बाहर रखी गई हैं। तेल, गैस, उर्वरक और कुछ खाद्य उत्पादों सहित कई वस्तुओं को छूट दी गई है। इसके अलावा पहले से अलग सेक्टोरल टैरिफ व्यवस्था के तहत आने वाली कुछ वस्तुओं पर भी नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए भारतीय निर्यात पर वास्तविक प्रभाव उत्पाद और लागू अमेरिकी शुल्क व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होगा।
नई अमेरिकी व्यापार नीति का असर भारतीय निर्यातकों की लागत और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है। जिन भारतीय उत्पादों पर नया अतिरिक्त शुल्क प्रभावी होगा, वे अमेरिकी आयातकों के लिए पहले की तुलना में महंगे पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को कीमतों, मार्जिन और सप्लाई चेन से जुड़े फैसलों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। हालांकि भारत को प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत की जगह 10 प्रतिशत वाले स्लैब में रखा जाना तुलनात्मक रूप से कुछ राहत देता है।
इस फैसले की पृष्ठभूमि अमेरिका की व्यापक टैरिफ नीति से भी जुड़ी है। 2026 में अमेरिकी व्यापार नीति में कई बड़े कानूनी और नीतिगत बदलाव हुए हैं। अब Section 301 का इस्तेमाल जबरन मजदूरी से जुड़े व्यापारिक मुद्दों पर कार्रवाई के लिए किया जा रहा है। नई ड्यूटी ऐसे समय लागू की गई है जब पहले से लागू अस्थायी वैश्विक टैरिफ व्यवस्था की अवधि समाप्त हो रही है।
भारत के लिए अब महत्वपूर्ण मुद्दा यह रहेगा कि नया शुल्क किन निर्यात क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर डालता है और दोनों देशों के बीच आगे की व्यापार वार्ता में इस मुद्दे को किस तरह उठाया जाता है। भारत-अमेरिका के बीच वस्तुओं और सेवाओं का बड़ा व्यापारिक संबंध है, इसलिए अतिरिक्त शुल्क का असर केवल निर्यातकों तक सीमित न रहकर सप्लाई चेन, अमेरिकी खरीदारों और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता तक पहुंच सकता है।
USTR की कार्रवाई में जबरन मजदूरी से बने उत्पादों को वैश्विक सप्लाई चेन से बाहर करने पर जोर दिया गया है। इसके चलते निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए अपने कच्चे माल के स्रोत, श्रम व्यवस्था और सप्लाई चेन से संबंधित रिकॉर्ड की पारदर्शिता और महत्वपूर्ण हो सकती है। अमेरिकी बाजार में कारोबार करने वाली कंपनियों को नए शुल्क के साथ अनुपालन से जुड़े नियमों पर भी नजर रखनी होगी।
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भारत समेत 17 देशों पर अमेरिका का नया 10% टैरिफ, जबरन मजदूरी से जुड़े व्यापार पर ट्रंप प्रशासन की सख्ती
Digital Desk
अमेरिका ने अपनी व्यापार नीति में एक और बड़ा बदलाव करते हुए भारत समेत 17 देशों से आने वाले सामान पर 10 प्रतिशत का नया अतिरिक्त टैरिफ लागू किया है। यह कार्रवाई जबरन मजदूरी यानी Forced Labor से जुड़े सामान के व्यापार को रोकने के लिए की गई अमेरिकी जांच के बाद सामने आई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने Trade Act of 1974 के Section 301 के तहत कई अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों और व्यवस्थाओं की जांच की थी। भारत को इस कार्रवाई में अपेक्षाकृत कम 10 प्रतिशत वाले टैरिफ स्लैब में रखा गया है।
भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती प्रस्ताव में 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की संभावना थी। हालांकि भारत और अमेरिका के बीच श्रम मानकों तथा जबरन मजदूरी से तैयार उत्पादों के व्यापार को रोकने के उपायों पर हुई बातचीत के बाद भारत को 10 प्रतिशत वाले निचले स्लैब में जगह मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय पक्ष की ओर से उठाए गए कदमों और बातचीत में हुई प्रगति ने टैरिफ दर कम रखने में भूमिका निभाई।
अमेरिकी प्रशासन का यह कदम सामान्य आयात शुल्क से अलग Section 301 की कार्रवाई का हिस्सा है। USTR ने मार्च 2026 में करीब 60 अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ जांच शुरू की थी। जांच का केंद्र यह था कि संबंधित देश जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम उठा रहे हैं या नहीं। जून में USTR ने अपनी जांच से जुड़े निष्कर्ष जारी किए और इसके बाद जुलाई में टैरिफ कार्रवाई की घोषणा की गई।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने इस फैसले को जबरन मजदूरी के खिलाफ अमेरिकी नीति से जोड़ा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका में लंबे समय से जबरन श्रम से तैयार वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध है और उसके व्यापारिक साझेदारों को भी ऐसी वस्तुओं को अपनी सप्लाई चेन में प्रवेश करने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए। USTR का कहना है कि कमजोर प्रवर्तन से उन कंपनियों और देशों को अनुचित व्यापारिक लाभ मिल सकता है जहां श्रम मानकों का पालन नहीं किया जाता।
भारत अकेला देश नहीं है जिस पर 10 प्रतिशत की दर लागू की गई है। कुल 60 व्यापारिक साझेदारों पर 10 या 12.5 प्रतिशत की दर से नई ड्यूटी लगाने की कार्रवाई की गई है। भारत उन 17 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है जिन्हें कम 10 प्रतिशत वाले स्लैब में रखा गया है। इस समूह में कनाडा, ब्रिटेन, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल बताए गए हैं, जबकि कई अन्य व्यापारिक साझेदारों पर 12.5 प्रतिशत की दर लागू की गई है।
नए टैरिफ का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में प्रवेश करने वाला हर भारतीय उत्पाद एक समान तरीके से प्रभावित होगा। कुछ वस्तुएं और श्रेणियां इस कार्रवाई से बाहर रखी गई हैं। तेल, गैस, उर्वरक और कुछ खाद्य उत्पादों सहित कई वस्तुओं को छूट दी गई है। इसके अलावा पहले से अलग सेक्टोरल टैरिफ व्यवस्था के तहत आने वाली कुछ वस्तुओं पर भी नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए भारतीय निर्यात पर वास्तविक प्रभाव उत्पाद और लागू अमेरिकी शुल्क व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होगा।
नई अमेरिकी व्यापार नीति का असर भारतीय निर्यातकों की लागत और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है। जिन भारतीय उत्पादों पर नया अतिरिक्त शुल्क प्रभावी होगा, वे अमेरिकी आयातकों के लिए पहले की तुलना में महंगे पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में निर्यातकों को कीमतों, मार्जिन और सप्लाई चेन से जुड़े फैसलों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। हालांकि भारत को प्रस्तावित 12.5 प्रतिशत की जगह 10 प्रतिशत वाले स्लैब में रखा जाना तुलनात्मक रूप से कुछ राहत देता है।
इस फैसले की पृष्ठभूमि अमेरिका की व्यापक टैरिफ नीति से भी जुड़ी है। 2026 में अमेरिकी व्यापार नीति में कई बड़े कानूनी और नीतिगत बदलाव हुए हैं। अब Section 301 का इस्तेमाल जबरन मजदूरी से जुड़े व्यापारिक मुद्दों पर कार्रवाई के लिए किया जा रहा है। नई ड्यूटी ऐसे समय लागू की गई है जब पहले से लागू अस्थायी वैश्विक टैरिफ व्यवस्था की अवधि समाप्त हो रही है।
भारत के लिए अब महत्वपूर्ण मुद्दा यह रहेगा कि नया शुल्क किन निर्यात क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर डालता है और दोनों देशों के बीच आगे की व्यापार वार्ता में इस मुद्दे को किस तरह उठाया जाता है। भारत-अमेरिका के बीच वस्तुओं और सेवाओं का बड़ा व्यापारिक संबंध है, इसलिए अतिरिक्त शुल्क का असर केवल निर्यातकों तक सीमित न रहकर सप्लाई चेन, अमेरिकी खरीदारों और द्विपक्षीय व्यापार वार्ता तक पहुंच सकता है।
USTR की कार्रवाई में जबरन मजदूरी से बने उत्पादों को वैश्विक सप्लाई चेन से बाहर करने पर जोर दिया गया है। इसके चलते निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए अपने कच्चे माल के स्रोत, श्रम व्यवस्था और सप्लाई चेन से संबंधित रिकॉर्ड की पारदर्शिता और महत्वपूर्ण हो सकती है। अमेरिकी बाजार में कारोबार करने वाली कंपनियों को नए शुल्क के साथ अनुपालन से जुड़े नियमों पर भी नजर रखनी होगी।
