- Hindi News
- राज्य
- मध्य प्रदेश
- दतिया उपचुनाव में स्टार प्रचारकों की दूरी बनी चर्चा का विषय, बीजेपी-कांग्रेस के कई दिग्गज अब तक मैदा...
दतिया उपचुनाव में स्टार प्रचारकों की दूरी बनी चर्चा का विषय, बीजेपी-कांग्रेस के कई दिग्गज अब तक मैदान से बाहर
दतिया (म.प्र.)
कांग्रेस से कमलनाथ, अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया प्रचार में नहीं पहुंचे; बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान, कैलाश विजयवर्गीय और राजेंद्र शुक्ला जैसे बड़े नेताओं की भी अब तक दूरी
दतिया उपचुनाव में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के साथ प्रचार अभियान तेज हो रहा है, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस के कई बड़े चेहरों की चुनावी मैदान से दूरी चर्चा का विषय बनी हुई है। दोनों दलों ने अपने-अपने स्तर पर चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार की है और स्थानीय नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाल रखा है, लेकिन प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई प्रमुख नेता अब तक दतिया में प्रचार करते नजर नहीं आए हैं। चुनावी मुकाबले के महत्वपूर्ण दौर में स्टार प्रचारकों की सीमित मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है।
कांग्रेस की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और वरिष्ठ आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया समेत पार्टी के कई प्रमुख चेहरे अब तक दतिया के चुनाव प्रचार में नहीं पहुंचे हैं। ये नेता मध्य प्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख प्रचारकों में गिने जाते रहे हैं और पिछले चुनावों में अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में सभाएं तथा जनसंपर्क करते दिखाई दिए थे। दतिया में फिलहाल स्थानीय और क्षेत्रीय नेतृत्व पर प्रचार की बड़ी जिम्मेदारी दिखाई दे रही है।
बीजेपी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय, उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला सहित कई बड़े नेता अब तक दतिया में सक्रिय चुनाव प्रचार करते नजर नहीं आए हैं। इन नेताओं की चुनावी सभाओं और रोड शो का पार्टी के प्रचार अभियान पर बड़ा प्रभाव माना जाता है। इसके बावजूद उपचुनाव के प्रचार में उनकी अब तक गैरमौजूदगी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
दतिया की राजनीति में स्थानीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, जातीय समीकरण, ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन की सक्रियता और बूथ स्तर का नेटवर्क चुनावी नतीजे को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहते हैं। यही कारण है कि दोनों दल फिलहाल स्थानीय कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने पर जोर दे रहे हैं। घर-घर संपर्क, छोटी सभाएं, कार्यकर्ता सम्मेलन और बूथ स्तर की बैठकों के माध्यम से चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।
बीजेपी के लिए दतिया राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। पार्टी यहां अपने संगठनात्मक नेटवर्क के सहारे मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। स्थानीय पदाधिकारियों को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है और बूथ स्तर पर मतदाताओं से संपर्क बढ़ाया जा रहा है। पार्टी का फोकस केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा विकास कार्यों को मतदाताओं के बीच ले जाने पर है। वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति के बीच स्थानीय संगठन की क्षमता भी इस चुनाव में कसौटी पर है।
दूसरी ओर कांग्रेस स्थानीय मुद्दों के जरिए बीजेपी को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी के स्थानीय नेता मतदाताओं के बीच क्षेत्र से जुड़े सवाल उठा रहे हैं और सरकार की नीतियों को लेकर अपना पक्ष रख रहे हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती अपने समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने के साथ उन वोटरों को साधने की भी है, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। बड़े नेताओं की सीमित मौजूदगी के कारण स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
स्टार प्रचारकों की चुनाव में भूमिका केवल बड़ी सभाएं करने तक सीमित नहीं रहती। किसी बड़े नेता के पहुंचने से कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ती है, मीडिया और मतदाताओं का ध्यान चुनावी क्षेत्र की ओर जाता है और पार्टी को अपने राजनीतिक संदेश को बड़े स्तर पर पहुंचाने का मौका मिलता है। खास तौर पर उपचुनाव में, जहां पूरा चुनाव एक सीमित क्षेत्र में केंद्रित होता है, बड़े नेताओं की एक सभा या रोड शो भी प्रचार की दिशा बदल सकता है। ऐसे में दोनों दलों के कई चर्चित चेहरों का अब तक मैदान में नहीं उतरना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े कर रहा है।
हालांकि बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी के पीछे अलग-अलग राजनीतिक और व्यस्तता से जुड़े कारण हो सकते हैं। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में पार्टियां अक्सर अपने प्रमुख चेहरों की सभाएं रणनीतिक तरीके से तय करती हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में बीजेपी और कांग्रेस अपने स्टार प्रचारकों को दतिया के मैदान में उतार सकती हैं। प्रचार के आखिरी दिनों में बड़ी सभाओं, रोड शो और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए माहौल बनाने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
दतिया उपचुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है। उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट के गणित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसे सरकार और विपक्ष की राजनीतिक ताकत के संकेत के रूप में भी देखा जाता है। इसी वजह से बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही संगठनात्मक स्तर पर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेंगी। फिलहाल चुनावी मैदान में स्थानीय चेहरे ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं और अब नजर इस बात पर है कि प्रचार के निर्णायक दौर में कौन-कौन से बड़े नेता दतिया पहुंचकर अपने दल के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।
-----------------
हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनल: https://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुक: Dainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम: @dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूब: Dainik Jagran MPCG Digital
📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए
दतिया उपचुनाव में स्टार प्रचारकों की दूरी बनी चर्चा का विषय, बीजेपी-कांग्रेस के कई दिग्गज अब तक मैदान से बाहर
दतिया (म.प्र.)
दतिया उपचुनाव में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ने के साथ प्रचार अभियान तेज हो रहा है, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस के कई बड़े चेहरों की चुनावी मैदान से दूरी चर्चा का विषय बनी हुई है। दोनों दलों ने अपने-अपने स्तर पर चुनाव प्रचार की रणनीति तैयार की है और स्थानीय नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने मोर्चा संभाल रखा है, लेकिन प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई प्रमुख नेता अब तक दतिया में प्रचार करते नजर नहीं आए हैं। चुनावी मुकाबले के महत्वपूर्ण दौर में स्टार प्रचारकों की सीमित मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया है।
कांग्रेस की बात करें तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और वरिष्ठ आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया समेत पार्टी के कई प्रमुख चेहरे अब तक दतिया के चुनाव प्रचार में नहीं पहुंचे हैं। ये नेता मध्य प्रदेश में कांग्रेस के प्रमुख प्रचारकों में गिने जाते रहे हैं और पिछले चुनावों में अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में सभाएं तथा जनसंपर्क करते दिखाई दिए थे। दतिया में फिलहाल स्थानीय और क्षेत्रीय नेतृत्व पर प्रचार की बड़ी जिम्मेदारी दिखाई दे रही है।
बीजेपी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय, उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला सहित कई बड़े नेता अब तक दतिया में सक्रिय चुनाव प्रचार करते नजर नहीं आए हैं। इन नेताओं की चुनावी सभाओं और रोड शो का पार्टी के प्रचार अभियान पर बड़ा प्रभाव माना जाता है। इसके बावजूद उपचुनाव के प्रचार में उनकी अब तक गैरमौजूदगी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है।
दतिया की राजनीति में स्थानीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, जातीय समीकरण, ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन की सक्रियता और बूथ स्तर का नेटवर्क चुनावी नतीजे को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहते हैं। यही कारण है कि दोनों दल फिलहाल स्थानीय कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने पर जोर दे रहे हैं। घर-घर संपर्क, छोटी सभाएं, कार्यकर्ता सम्मेलन और बूथ स्तर की बैठकों के माध्यम से चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।
बीजेपी के लिए दतिया राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। पार्टी यहां अपने संगठनात्मक नेटवर्क के सहारे मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। स्थानीय पदाधिकारियों को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई है और बूथ स्तर पर मतदाताओं से संपर्क बढ़ाया जा रहा है। पार्टी का फोकस केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा विकास कार्यों को मतदाताओं के बीच ले जाने पर है। वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति के बीच स्थानीय संगठन की क्षमता भी इस चुनाव में कसौटी पर है।
दूसरी ओर कांग्रेस स्थानीय मुद्दों के जरिए बीजेपी को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी के स्थानीय नेता मतदाताओं के बीच क्षेत्र से जुड़े सवाल उठा रहे हैं और सरकार की नीतियों को लेकर अपना पक्ष रख रहे हैं। कांग्रेस के लिए चुनौती अपने समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक पहुंचाने के साथ उन वोटरों को साधने की भी है, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। बड़े नेताओं की सीमित मौजूदगी के कारण स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
स्टार प्रचारकों की चुनाव में भूमिका केवल बड़ी सभाएं करने तक सीमित नहीं रहती। किसी बड़े नेता के पहुंचने से कार्यकर्ताओं में सक्रियता बढ़ती है, मीडिया और मतदाताओं का ध्यान चुनावी क्षेत्र की ओर जाता है और पार्टी को अपने राजनीतिक संदेश को बड़े स्तर पर पहुंचाने का मौका मिलता है। खास तौर पर उपचुनाव में, जहां पूरा चुनाव एक सीमित क्षेत्र में केंद्रित होता है, बड़े नेताओं की एक सभा या रोड शो भी प्रचार की दिशा बदल सकता है। ऐसे में दोनों दलों के कई चर्चित चेहरों का अब तक मैदान में नहीं उतरना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े कर रहा है।
हालांकि बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी के पीछे अलग-अलग राजनीतिक और व्यस्तता से जुड़े कारण हो सकते हैं। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में पार्टियां अक्सर अपने प्रमुख चेहरों की सभाएं रणनीतिक तरीके से तय करती हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में बीजेपी और कांग्रेस अपने स्टार प्रचारकों को दतिया के मैदान में उतार सकती हैं। प्रचार के आखिरी दिनों में बड़ी सभाओं, रोड शो और जनसंपर्क कार्यक्रमों के जरिए माहौल बनाने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
दतिया उपचुनाव दोनों प्रमुख दलों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है। उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट के गणित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसे सरकार और विपक्ष की राजनीतिक ताकत के संकेत के रूप में भी देखा जाता है। इसी वजह से बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही संगठनात्मक स्तर पर कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेंगी। फिलहाल चुनावी मैदान में स्थानीय चेहरे ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रहे हैं और अब नजर इस बात पर है कि प्रचार के निर्णायक दौर में कौन-कौन से बड़े नेता दतिया पहुंचकर अपने दल के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करते हैं।
