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छत्तीसगढ़ में UCC की तैयारी तेज, विवाह से उत्तराधिकार तक नियमों पर मंथन; उच्चस्तरीय समिति की पहली बैठक आज
छत्तीसगढ़
पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में रायपुर में जुटेगी 5 सदस्यीय समिति, कानूनी प्रावधानों के अध्ययन के साथ जनता और विशेषज्ञों से सुझाव लेकर तैयार होगा प्रस्तावित ढांचा
छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर राज्य सरकार की कवायद अब अगले चरण में पहुंच रही है। UCC से जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन करने तथा सरकार को सुझाव देने के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति की पहली बैठक आज, 24 जुलाई 2026 को रायपुर में प्रस्तावित है। बैठक दोपहर 12 बजे मुख्य सचिव विकास शील के कक्ष में आयोजित की जानी है। इसमें राज्य में समान नागरिक संहिता की संभावनाओं, मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों और प्रस्तावित कानूनी ढांचे से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर शुरुआती चर्चा होने की बात कही गई है।
समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है। उनके अलावा उत्तराखंड के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, छत्तीसगढ़ के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एमके रावत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार और सेवानिवृत्त प्राचार्य ज्योति रानी सिंह को समिति में शामिल किया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े सदस्यों की मौजूदगी के जरिए सरकार कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए UCC पर व्यापक अध्ययन कराना चाहती है।
बैठक में सबसे पहले छत्तीसगढ़ में लागू मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं और अलग-अलग समुदायों से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन किए जाने की रूपरेखा पर चर्चा हो सकती है। समान नागरिक संहिता का दायरा मुख्य रूप से नागरिक मामलों से जुड़ा होता है। ऐसे में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषय समिति के अध्ययन के प्रमुख बिंदुओं में शामिल रहेंगे। हालांकि इन नियमों में क्या बदलाव होंगे, यह अभी तय नहीं है। समिति के अध्ययन, परामर्श और सिफारिशों के बाद ही प्रस्तावित प्रावधानों की तस्वीर स्पष्ट होगी।
UCC को लेकर समिति के सामने छत्तीसगढ़ की सामाजिक और जनजातीय विविधता भी एक महत्वपूर्ण विषय रहने की संभावना है। प्रदेश में बड़ी आदिवासी आबादी निवास करती है और कई समुदायों की अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्थाएं तथा रीति-रिवाज हैं। ऐसे में प्रस्तावित कानूनी ढांचे का अध्ययन करते समय विभिन्न समुदायों की परंपराओं, संवैधानिक प्रावधानों और मौजूदा कानूनों के बीच संतुलन जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है।
राज्य सरकार ने समिति को केवल कानूनी प्रावधानों का अध्ययन करने तक सीमित नहीं रखा है। उसे आम नागरिकों, सामाजिक और सामुदायिक संगठनों, कानून के जानकारों तथा अन्य संबंधित पक्षों से राय और सुझाव लेने की जिम्मेदारी भी दी गई है। इस प्रक्रिया के जरिए अलग-अलग वर्गों की चिंताओं और अपेक्षाओं को समझने का प्रयास किया जाएगा। समिति इन सुझावों का अध्ययन करने के बाद उन्हें अपनी सिफारिशों और प्रस्तावित मसौदे में शामिल करने पर विचार कर सकती है।
दूसरे राज्यों के अनुभव भी छत्तीसगढ़ की इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। समिति उन राज्यों की कानूनी व्यवस्था और प्रक्रिया का अध्ययन करेगी, जहां समान नागरिक संहिता लागू की गई है या इसे लेकर पहल आगे बढ़ाई गई है। इससे कानून तैयार करने की प्रक्रिया, क्रियान्वयन के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों और प्रशासनिक व्यवस्था को समझने में मदद मिल सकती है। विशेष रूप से उत्तराखंड के मॉडल और उससे जुड़े अनुभवों का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रस्तावित UCC को लेकर विवाह से जुड़े नियम समिति के अध्ययन का अहम हिस्सा होंगे। वर्तमान में अलग-अलग समुदायों के विवाह और उससे संबंधित प्रक्रियाओं के लिए विभिन्न व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। समिति यह देखेगी कि समान नागरिक व्यवस्था तैयार किए जाने की स्थिति में विवाह के पंजीकरण, विवाह की कानूनी आयु और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े प्रावधानों को किस तरह व्यवस्थित किया जा सकता है।
इसी तरह तलाक और भरण-पोषण से जुड़े मामलों पर भी विस्तार से अध्ययन किया जाना है। अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में तलाक की प्रक्रिया और उससे जुड़े अधिकारों में अंतर देखने को मिलता है। समिति मौजूदा कानूनी स्थिति का अध्ययन कर यह आकलन करेगी कि प्रस्तावित समान व्यवस्था में इन विषयों को किस तरह शामिल किया जा सकता है। महिलाओं और बच्चों के अधिकार तथा आर्थिक सुरक्षा जैसे पहलू भी इस चर्चा में महत्वपूर्ण रह सकते हैं।
उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार भी UCC की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण विषय हैं। वर्तमान व्यवस्था में धर्म और व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर उत्तराधिकार से जुड़े नियम अलग-अलग हो सकते हैं। समिति इन कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन करेगी। इसी के साथ दत्तक ग्रहण से जुड़े मौजूदा नियमों और अलग-अलग समुदायों पर लागू कानूनी व्यवस्थाओं को भी समीक्षा के दायरे में रखा जाएगा।
समिति की पहली बैठक को प्रारंभिक स्तर की महत्वपूर्ण कवायद माना जा रहा है। इसमें अध्ययन की कार्ययोजना, किन विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी, संबंधित पक्षों से सुझाव किस प्रक्रिया से लिए जाएंगे और दूसरे राज्यों के मॉडल का अध्ययन कैसे किया जाएगा, जैसे मुद्दों पर रूपरेखा तैयार हो सकती है। इसके बाद अलग-अलग चरणों में कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
अध्ययन और परामर्श की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पांच सदस्यीय समिति अपनी सिफारिशें और प्रस्तावित प्रारूप राज्य सरकार को सौंपेगी। इसके बाद सरकार इन सिफारिशों का परीक्षण कर आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया तय करेगी। फिलहाल आज होने वाली पहली बैठक के साथ छत्तीसगढ़ में UCC को लेकर औपचारिक अध्ययन और मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ने जा रही है।
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छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर राज्य सरकार की कवायद अब अगले चरण में पहुंच रही है। UCC से जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं का अध्ययन करने तथा सरकार को सुझाव देने के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति की पहली बैठक आज, 24 जुलाई 2026 को रायपुर में प्रस्तावित है। बैठक दोपहर 12 बजे मुख्य सचिव विकास शील के कक्ष में आयोजित की जानी है। इसमें राज्य में समान नागरिक संहिता की संभावनाओं, मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों और प्रस्तावित कानूनी ढांचे से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर शुरुआती चर्चा होने की बात कही गई है।
समिति की कमान सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को सौंपी गई है। उनके अलावा उत्तराखंड के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, छत्तीसगढ़ के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एमके रावत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार और सेवानिवृत्त प्राचार्य ज्योति रानी सिंह को समिति में शामिल किया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े सदस्यों की मौजूदगी के जरिए सरकार कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए UCC पर व्यापक अध्ययन कराना चाहती है।
बैठक में सबसे पहले छत्तीसगढ़ में लागू मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं और अलग-अलग समुदायों से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन किए जाने की रूपरेखा पर चर्चा हो सकती है। समान नागरिक संहिता का दायरा मुख्य रूप से नागरिक मामलों से जुड़ा होता है। ऐसे में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे विषय समिति के अध्ययन के प्रमुख बिंदुओं में शामिल रहेंगे। हालांकि इन नियमों में क्या बदलाव होंगे, यह अभी तय नहीं है। समिति के अध्ययन, परामर्श और सिफारिशों के बाद ही प्रस्तावित प्रावधानों की तस्वीर स्पष्ट होगी।
UCC को लेकर समिति के सामने छत्तीसगढ़ की सामाजिक और जनजातीय विविधता भी एक महत्वपूर्ण विषय रहने की संभावना है। प्रदेश में बड़ी आदिवासी आबादी निवास करती है और कई समुदायों की अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्थाएं तथा रीति-रिवाज हैं। ऐसे में प्रस्तावित कानूनी ढांचे का अध्ययन करते समय विभिन्न समुदायों की परंपराओं, संवैधानिक प्रावधानों और मौजूदा कानूनों के बीच संतुलन जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है।
राज्य सरकार ने समिति को केवल कानूनी प्रावधानों का अध्ययन करने तक सीमित नहीं रखा है। उसे आम नागरिकों, सामाजिक और सामुदायिक संगठनों, कानून के जानकारों तथा अन्य संबंधित पक्षों से राय और सुझाव लेने की जिम्मेदारी भी दी गई है। इस प्रक्रिया के जरिए अलग-अलग वर्गों की चिंताओं और अपेक्षाओं को समझने का प्रयास किया जाएगा। समिति इन सुझावों का अध्ययन करने के बाद उन्हें अपनी सिफारिशों और प्रस्तावित मसौदे में शामिल करने पर विचार कर सकती है।
दूसरे राज्यों के अनुभव भी छत्तीसगढ़ की इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। समिति उन राज्यों की कानूनी व्यवस्था और प्रक्रिया का अध्ययन करेगी, जहां समान नागरिक संहिता लागू की गई है या इसे लेकर पहल आगे बढ़ाई गई है। इससे कानून तैयार करने की प्रक्रिया, क्रियान्वयन के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों और प्रशासनिक व्यवस्था को समझने में मदद मिल सकती है। विशेष रूप से उत्तराखंड के मॉडल और उससे जुड़े अनुभवों का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रस्तावित UCC को लेकर विवाह से जुड़े नियम समिति के अध्ययन का अहम हिस्सा होंगे। वर्तमान में अलग-अलग समुदायों के विवाह और उससे संबंधित प्रक्रियाओं के लिए विभिन्न व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। समिति यह देखेगी कि समान नागरिक व्यवस्था तैयार किए जाने की स्थिति में विवाह के पंजीकरण, विवाह की कानूनी आयु और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े प्रावधानों को किस तरह व्यवस्थित किया जा सकता है।
इसी तरह तलाक और भरण-पोषण से जुड़े मामलों पर भी विस्तार से अध्ययन किया जाना है। अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में तलाक की प्रक्रिया और उससे जुड़े अधिकारों में अंतर देखने को मिलता है। समिति मौजूदा कानूनी स्थिति का अध्ययन कर यह आकलन करेगी कि प्रस्तावित समान व्यवस्था में इन विषयों को किस तरह शामिल किया जा सकता है। महिलाओं और बच्चों के अधिकार तथा आर्थिक सुरक्षा जैसे पहलू भी इस चर्चा में महत्वपूर्ण रह सकते हैं।
उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार भी UCC की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण विषय हैं। वर्तमान व्यवस्था में धर्म और व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर उत्तराधिकार से जुड़े नियम अलग-अलग हो सकते हैं। समिति इन कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों का तुलनात्मक अध्ययन करेगी। इसी के साथ दत्तक ग्रहण से जुड़े मौजूदा नियमों और अलग-अलग समुदायों पर लागू कानूनी व्यवस्थाओं को भी समीक्षा के दायरे में रखा जाएगा।
समिति की पहली बैठक को प्रारंभिक स्तर की महत्वपूर्ण कवायद माना जा रहा है। इसमें अध्ययन की कार्ययोजना, किन विषयों को प्राथमिकता दी जाएगी, संबंधित पक्षों से सुझाव किस प्रक्रिया से लिए जाएंगे और दूसरे राज्यों के मॉडल का अध्ययन कैसे किया जाएगा, जैसे मुद्दों पर रूपरेखा तैयार हो सकती है। इसके बाद अलग-अलग चरणों में कानूनी विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
अध्ययन और परामर्श की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पांच सदस्यीय समिति अपनी सिफारिशें और प्रस्तावित प्रारूप राज्य सरकार को सौंपेगी। इसके बाद सरकार इन सिफारिशों का परीक्षण कर आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया तय करेगी। फिलहाल आज होने वाली पहली बैठक के साथ छत्तीसगढ़ में UCC को लेकर औपचारिक अध्ययन और मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ने जा रही है।
