जनादेश से शासन तक: कौन था तैयार, कौन रहा उलझा?

नई दिल्ली

किसी भी सरकार की असली परीक्षा चुनाव खत्म होने के बाद शुरू होती है। जीत यह तय करती है कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी, लेकिन उसके बाद के दिन यह बताते हैं कि कोई पार्टी सरकार चलाने की स्पष्ट तैयारी के साथ आई थी या केवल चुनावी जनादेश लेकर सत्ता तक पहुंची थी। असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, केरलम और तमिलनाडु के हालिया चुनाव परिणामों ने इस फर्क को बेहद साफ तरीके से सामने रखा है।

कुछ सरकारें जीत के तुरंत बाद घोषणापत्र के वादों को लागू करने, नीतिगत प्राथमिकताएं तय करने और प्रशासनिक दिशा दिखाने में जुट गईं, जबकि कुछ सरकारें शुरुआती दिनों में ही नेतृत्व विवाद, गठबंधन प्रबंधन, मंत्रालयों के बंटवारे और राजनीतिक विवादों में उलझती दिखाई दीं। यही आज की राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी है सरकारें चुनाव के बाद नहीं बनतीं, उनकी तैयारी चुनाव से पहले ही हो चुकी होती है।

जनादेश से सीधे फैसलों तक

असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में एक चीज समान दिखाई दी। इन राज्यों में चुनाव नतीजों के बाद सत्ता को लेकर अनिश्चितता नहीं थी। नेतृत्व पहले से तय था, प्राथमिकताएं स्पष्ट थीं और चुनाव प्रचार से शासन तक का बदलाव लगभग बिना रुकावट के दिखाई दिया।

असम इसका सबसे मजबूत उदाहरण बनकर सामने आया। भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने समय बर्बाद करने के बजाय सीधे अपने इरादे जाहिर करने शुरू कर दिए। दो लाख सरकारी नौकरियों का रोडमैप, भाजपा के संकल्प पत्र 2026 के सभी 31 वादों को मंजूरी और चीफ सेक्रेटरी की निगरानी में उन्हें लागू करने की व्यवस्था इन सबने यह संकेत दिया कि सरकार अपने घोषणा पत्र को केवल चुनावी दस्तावेज नहीं बल्कि शासन चलाने की रूपरेखा मान रही है।

यही सोच प्रशासनिक सुधारों में भी दिखाई दी। छह महीने का मितव्ययिता कार्यक्रम, असम स्टेट डेटा पॉलिसी 2026 और सेंटर फॉर डेटा मैनेजमेंट की स्थापना ने यह संदेश दिया कि सरकार तकनीक आधारित प्रशासन और वित्तीय अनुशासन को साथ लेकर चलना चाहती है।

सबसे अहम फैसला यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर माना गया। असम इस दिशा में ठोस कदम उठाने वाला देश का तीसरा राज्य बनने की ओर बढ़ा। कोई इस फैसले से सहमत हो या असहमत, लेकिन इसकी टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण थी। आमतौर पर सरकारें ऐसे संवेदनशील मुद्दों को बाद के वर्षों के लिए टाल देती हैं, लेकिन असम सरकार ने इसे शुरुआती एजेंडे का हिस्सा बनाया।

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ प्रशासनिक बदलाव का संदेश

पश्चिम बंगाल ने इसका एक अलग लेकिन उतना ही मजबूत उदाहरण पेश किया। 207 सीटों की ऐतिहासिक जीत और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य की पहली भाजपा सरकार बनने के बाद नई सरकार ने तेजी से यह दिखाने की कोशिश की कि यह जनादेश केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि प्रशासनिक बदलाव भी लेकर आया है।

आयुष्मान भारत, पीएम-किसान और उज्ज्वला जैसी लंबित केंद्रीय योजनाओं को लागू किया गया। BSF बॉर्डर फेंसिंग के लिए जमीन आवंटित हुई, सरकारी नौकरियों में पात्रता बढ़ाई गई और लंबे समय से अटकी जनगणना प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था सरकार का “गवर्निंग कल्चर” बदलने का प्रयास। सिंडिकेट, अवैध खनन, पशु तस्करी और भर्ती घोटालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई। भ्रष्टाचार मामलों में CBI जांच को मंजूरी दी गई और भारतीय न्याय संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम के लागू होने की प्रक्रिया को मजबूत किया गया।

इसके साथ प्रशासनिक पुनर्गठन और कल्याणकारी योजनाओं पर भी जोर दिखाई दिया। अन्नपूर्णा योजना, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, बढ़ी हुई पेंशन, भारतनेट विस्तार, सातवें वेतन आयोग को मंजूरी और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे कदमों ने सरकार की प्राथमिकताएं साफ कर दीं।

सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की भी कोशिश की। जाति प्रमाणपत्र और OBC वर्गीकरण की समीक्षा, धर्म आधारित सहायता योजनाओं को बंद करना, कृषि उत्पादों की आवाजाही में सुधार, स्कूलों में वंदे मातरम् अनिवार्य करना और सार्वजनिक सड़कों पर नमाज को लेकर प्रतिबंध जैसे फैसलों को एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव के हिस्से के तौर पर पेश किया गया।

इन सभी फैसलों ने मिलकर यह संदेश दिया कि सरकार केवल सत्ता संभालने नहीं आई, बल्कि शासन की दिशा तय करने आई है।

पुडुचेरी: छोटी सरकार, लेकिन स्पष्ट प्राथमिकताएं

पुडुचेरी में भी यही मॉडल छोटे स्तर पर दिखाई दिया। मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्व में NDA सरकार को निरंतरता का फायदा मिला और सरकार ने शुरुआत से ही डिलीवरी पर ध्यान केंद्रित किया।

करीब चार दशक बाद थिरुनल्लार के रास्ते कराईकल-पेरलम रेलवे कनेक्शन को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी मजबूत होने की उम्मीद बनी। पीएम सूर्य घर योजना के तहत अतिरिक्त 30 हजार रुपये की सब्सिडी करीब 13 हजार परिवारों को लक्षित करती दिखाई दी। वहीं कामराजर शताब्दी स्टोन हाउस कंस्ट्रक्शन योजना के तहत लगभग 8600 परिवारों को ब्याज माफी, केवल मूलधन भुगतान और जमीन के स्वामित्व बहाल करने जैसे राहत उपाय दिए गए।

जब जीत सरकार तो बना देती है, लेकिन स्पष्टता नहीं

केरलम और तमिलनाडु ने राजनीति का दूसरा पक्ष दिखाया। चुनाव जीतना सरकार बना सकता है, लेकिन उससे प्रशासनिक स्पष्टता अपने आप नहीं आती।

केरलम में UDF की जीत ने LDF के एक दशक लंबे शासन का अंत जरूर किया, लेकिन शुरुआती दिनों में जनता के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह नहीं थी कि सरकार क्या करेगी, बल्कि यह थी कि सरकार चलाएगा कौन।

वी.डी. सतीशन और के.सी. वेणुगोपाल समर्थक खेमों के बीच करीब दस दिनों तक नेतृत्व को लेकर खींचतान चली। इसके बाद कांग्रेस और IUML के बीच मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आए। नतीजा यह हुआ कि सरकार के शुरुआती दिन प्रशासनिक फैसलों से ज्यादा राजनीतिक संतुलन बनाने में निकल गए।

इसके बाद भी विवाद थमते नहीं दिखे। शपथ ग्रहण समारोह को लेकर आलोचना, वरिष्ठ नियुक्तियों पर सवाल और 600 से ज्यादा परिवारों से जुड़े मुनंबम वक्फ विवाद ने सरकार का ध्यान लगातार विवादों की ओर मोड़ दिया। जनता जहां शासन की शुरुआती दिशा देखना चाहती थी, वहां सरकार अभी अपने अंदरूनी समीकरण तय करने में व्यस्त दिखाई दी।

तमिलनाडु में गठबंधन प्रबंधन सरकार पर भारी पड़ा

तमिलनाडु में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं थी। TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन सरकार गठन कांग्रेस और कई गठबंधन सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर रहा। ऐसे में शुरुआती राजनीतिक माहौल शासन से ज्यादा बातचीत, मंत्रालयों के बंटवारे और गठबंधन संतुलन के इर्द-गिर्द घूमता रहा।

शपथ ग्रहण के बाद भी यह अस्थिरता खत्म नहीं हुई। चुनावी वादों में बदलाव, विभागों के बंटवारे में देरी और विजय के ज्योतिषी को OSD नियुक्त किए जाने को लेकर विवाद ने सरकार के शुरुआती दिनों में अनावश्यक राजनीतिक शोर पैदा कर दिया।

इसी दौरान बिजली कटौती और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया। जनता जहां एक स्पष्ट प्रशासनिक दिशा की उम्मीद कर रही थी, वहां सरकार अभी अपनी राजनीतिक संरचना को स्थिर करने में लगी दिखाई दी।

जनादेश सरकार चलाने की तैयारी नहीं होता

इन पांच राज्यों का अनुभव एक बेहद स्पष्ट बात बताता है चुनाव जीतना और शासन चलाने के लिए तैयार होना, दोनों अलग चीजें हैं।

कुछ सरकारों ने शुरुआती हफ्तों में ही अपनी प्राथमिकताएं लागू करनी शुरू कर दीं। उन्होंने दिशा दिखाई, फैसले लिए और प्रशासनिक संदेश दिया। दूसरी तरफ कुछ सरकारें नेतृत्व विवाद सुलझाने, गठबंधन संभालने और राजनीतिक विवादों का जवाब देने में उलझी रहीं

यही फर्क सबसे ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि चुनाव नतीजों के साथ खत्म नहीं होते। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। चुनाव यह तय करते हैं कि सत्ता किसे मिली, लेकिन उसके बाद के हफ्ते यह बताते हैं कि कौन सरकार चलाने की तैयारी के साथ आया था और कौन केवल चुनाव जीतने की तैयारी करके।

-----------------

हमारे आधिकारिक प्लेटफॉर्म्स से जुड़ें –
🔴 व्हाट्सएप चैनलhttps://whatsapp.com/channel/0029VbATlF0KQuJB6tvUrN3V
🔴 फेसबुकDainik Jagran MP/CG Official
🟣 इंस्टाग्राम@dainikjagranmp.cg
🔴 यूट्यूबDainik Jagran MPCG Digital

📲 सोशल मीडिया पर जुड़ें और बने जागरूक पाठक।
👉 आज ही जुड़िए

www.dainikjagranmpcg.com
29 May 2026 By दैनिक जागरण

जनादेश से शासन तक: कौन था तैयार, कौन रहा उलझा?

नई दिल्ली

कुछ सरकारें जीत के तुरंत बाद घोषणापत्र के वादों को लागू करने, नीतिगत प्राथमिकताएं तय करने और प्रशासनिक दिशा दिखाने में जुट गईं, जबकि कुछ सरकारें शुरुआती दिनों में ही नेतृत्व विवाद, गठबंधन प्रबंधन, मंत्रालयों के बंटवारे और राजनीतिक विवादों में उलझती दिखाई दीं। यही आज की राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी है सरकारें चुनाव के बाद नहीं बनतीं, उनकी तैयारी चुनाव से पहले ही हो चुकी होती है।

जनादेश से सीधे फैसलों तक

असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में एक चीज समान दिखाई दी। इन राज्यों में चुनाव नतीजों के बाद सत्ता को लेकर अनिश्चितता नहीं थी। नेतृत्व पहले से तय था, प्राथमिकताएं स्पष्ट थीं और चुनाव प्रचार से शासन तक का बदलाव लगभग बिना रुकावट के दिखाई दिया।

असम इसका सबसे मजबूत उदाहरण बनकर सामने आया। भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौटने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने समय बर्बाद करने के बजाय सीधे अपने इरादे जाहिर करने शुरू कर दिए। दो लाख सरकारी नौकरियों का रोडमैप, भाजपा के संकल्प पत्र 2026 के सभी 31 वादों को मंजूरी और चीफ सेक्रेटरी की निगरानी में उन्हें लागू करने की व्यवस्था इन सबने यह संकेत दिया कि सरकार अपने घोषणा पत्र को केवल चुनावी दस्तावेज नहीं बल्कि शासन चलाने की रूपरेखा मान रही है।

यही सोच प्रशासनिक सुधारों में भी दिखाई दी। छह महीने का मितव्ययिता कार्यक्रम, असम स्टेट डेटा पॉलिसी 2026 और सेंटर फॉर डेटा मैनेजमेंट की स्थापना ने यह संदेश दिया कि सरकार तकनीक आधारित प्रशासन और वित्तीय अनुशासन को साथ लेकर चलना चाहती है।

सबसे अहम फैसला यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर माना गया। असम इस दिशा में ठोस कदम उठाने वाला देश का तीसरा राज्य बनने की ओर बढ़ा। कोई इस फैसले से सहमत हो या असहमत, लेकिन इसकी टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण थी। आमतौर पर सरकारें ऐसे संवेदनशील मुद्दों को बाद के वर्षों के लिए टाल देती हैं, लेकिन असम सरकार ने इसे शुरुआती एजेंडे का हिस्सा बनाया।

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ प्रशासनिक बदलाव का संदेश

पश्चिम बंगाल ने इसका एक अलग लेकिन उतना ही मजबूत उदाहरण पेश किया। 207 सीटों की ऐतिहासिक जीत और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य की पहली भाजपा सरकार बनने के बाद नई सरकार ने तेजी से यह दिखाने की कोशिश की कि यह जनादेश केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि प्रशासनिक बदलाव भी लेकर आया है।

आयुष्मान भारत, पीएम-किसान और उज्ज्वला जैसी लंबित केंद्रीय योजनाओं को लागू किया गया। BSF बॉर्डर फेंसिंग के लिए जमीन आवंटित हुई, सरकारी नौकरियों में पात्रता बढ़ाई गई और लंबे समय से अटकी जनगणना प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण था सरकार का “गवर्निंग कल्चर” बदलने का प्रयास। सिंडिकेट, अवैध खनन, पशु तस्करी और भर्ती घोटालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई। भ्रष्टाचार मामलों में CBI जांच को मंजूरी दी गई और भारतीय न्याय संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम के लागू होने की प्रक्रिया को मजबूत किया गया।

इसके साथ प्रशासनिक पुनर्गठन और कल्याणकारी योजनाओं पर भी जोर दिखाई दिया। अन्नपूर्णा योजना, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, बढ़ी हुई पेंशन, भारतनेट विस्तार, सातवें वेतन आयोग को मंजूरी और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे कदमों ने सरकार की प्राथमिकताएं साफ कर दीं।

सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की भी कोशिश की। जाति प्रमाणपत्र और OBC वर्गीकरण की समीक्षा, धर्म आधारित सहायता योजनाओं को बंद करना, कृषि उत्पादों की आवाजाही में सुधार, स्कूलों में वंदे मातरम् अनिवार्य करना और सार्वजनिक सड़कों पर नमाज को लेकर प्रतिबंध जैसे फैसलों को एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव के हिस्से के तौर पर पेश किया गया।

इन सभी फैसलों ने मिलकर यह संदेश दिया कि सरकार केवल सत्ता संभालने नहीं आई, बल्कि शासन की दिशा तय करने आई है।

पुडुचेरी: छोटी सरकार, लेकिन स्पष्ट प्राथमिकताएं

पुडुचेरी में भी यही मॉडल छोटे स्तर पर दिखाई दिया। मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्व में NDA सरकार को निरंतरता का फायदा मिला और सरकार ने शुरुआत से ही डिलीवरी पर ध्यान केंद्रित किया।

करीब चार दशक बाद थिरुनल्लार के रास्ते कराईकल-पेरलम रेलवे कनेक्शन को फिर से शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और कनेक्टिविटी मजबूत होने की उम्मीद बनी। पीएम सूर्य घर योजना के तहत अतिरिक्त 30 हजार रुपये की सब्सिडी करीब 13 हजार परिवारों को लक्षित करती दिखाई दी। वहीं कामराजर शताब्दी स्टोन हाउस कंस्ट्रक्शन योजना के तहत लगभग 8600 परिवारों को ब्याज माफी, केवल मूलधन भुगतान और जमीन के स्वामित्व बहाल करने जैसे राहत उपाय दिए गए।

जब जीत सरकार तो बना देती है, लेकिन स्पष्टता नहीं

केरलम और तमिलनाडु ने राजनीति का दूसरा पक्ष दिखाया। चुनाव जीतना सरकार बना सकता है, लेकिन उससे प्रशासनिक स्पष्टता अपने आप नहीं आती।

केरलम में UDF की जीत ने LDF के एक दशक लंबे शासन का अंत जरूर किया, लेकिन शुरुआती दिनों में जनता के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह नहीं थी कि सरकार क्या करेगी, बल्कि यह थी कि सरकार चलाएगा कौन।

वी.डी. सतीशन और के.सी. वेणुगोपाल समर्थक खेमों के बीच करीब दस दिनों तक नेतृत्व को लेकर खींचतान चली। इसके बाद कांग्रेस और IUML के बीच मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आए। नतीजा यह हुआ कि सरकार के शुरुआती दिन प्रशासनिक फैसलों से ज्यादा राजनीतिक संतुलन बनाने में निकल गए।

इसके बाद भी विवाद थमते नहीं दिखे। शपथ ग्रहण समारोह को लेकर आलोचना, वरिष्ठ नियुक्तियों पर सवाल और 600 से ज्यादा परिवारों से जुड़े मुनंबम वक्फ विवाद ने सरकार का ध्यान लगातार विवादों की ओर मोड़ दिया। जनता जहां शासन की शुरुआती दिशा देखना चाहती थी, वहां सरकार अभी अपने अंदरूनी समीकरण तय करने में व्यस्त दिखाई दी।

तमिलनाडु में गठबंधन प्रबंधन सरकार पर भारी पड़ा

तमिलनाडु में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं थी। TVK सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन सरकार गठन कांग्रेस और कई गठबंधन सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर रहा। ऐसे में शुरुआती राजनीतिक माहौल शासन से ज्यादा बातचीत, मंत्रालयों के बंटवारे और गठबंधन संतुलन के इर्द-गिर्द घूमता रहा।

शपथ ग्रहण के बाद भी यह अस्थिरता खत्म नहीं हुई। चुनावी वादों में बदलाव, विभागों के बंटवारे में देरी और विजय के ज्योतिषी को OSD नियुक्त किए जाने को लेकर विवाद ने सरकार के शुरुआती दिनों में अनावश्यक राजनीतिक शोर पैदा कर दिया।

इसी दौरान बिजली कटौती और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया। जनता जहां एक स्पष्ट प्रशासनिक दिशा की उम्मीद कर रही थी, वहां सरकार अभी अपनी राजनीतिक संरचना को स्थिर करने में लगी दिखाई दी।

जनादेश सरकार चलाने की तैयारी नहीं होता

इन पांच राज्यों का अनुभव एक बेहद स्पष्ट बात बताता है चुनाव जीतना और शासन चलाने के लिए तैयार होना, दोनों अलग चीजें हैं।

कुछ सरकारों ने शुरुआती हफ्तों में ही अपनी प्राथमिकताएं लागू करनी शुरू कर दीं। उन्होंने दिशा दिखाई, फैसले लिए और प्रशासनिक संदेश दिया। दूसरी तरफ कुछ सरकारें नेतृत्व विवाद सुलझाने, गठबंधन संभालने और राजनीतिक विवादों का जवाब देने में उलझी रहीं

यही फर्क सबसे ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि चुनाव नतीजों के साथ खत्म नहीं होते। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। चुनाव यह तय करते हैं कि सत्ता किसे मिली, लेकिन उसके बाद के हफ्ते यह बताते हैं कि कौन सरकार चलाने की तैयारी के साथ आया था और कौन केवल चुनाव जीतने की तैयारी करके।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/from-mandate-to-governance-who-was-ready-and-who-remained/article-54535

खबरें और भी हैं

जनादेश से शासन तक: कौन था तैयार, कौन रहा उलझा?

टाप न्यूज

जनादेश से शासन तक: कौन था तैयार, कौन रहा उलझा?

किसी भी सरकार की असली परीक्षा चुनाव खत्म होने के बाद शुरू होती है। जीत यह तय करती है कि...
देश विदेश 
जनादेश से शासन तक: कौन था तैयार, कौन रहा उलझा?

IPL में स्मार्ट सनग्लास पर BCCI की रोक, सुरक्षा नियम सख्त किए

एंटी करप्शन यूनिट ने इसे कम्युनिकेशन डिवाइस मानते हुए लगाया प्रतिबंध, खिलाड़ियों और स्टाफ पर नई एडवाइजरी लागू
स्पोर्ट्स 
IPL में स्मार्ट सनग्लास पर BCCI की रोक, सुरक्षा नियम सख्त किए

न्यूजीलैंड का दबदबा जारी, आयरलैंड पर फॉलोऑन का दबाव

बेलफास्ट टेस्ट में 490 रन के बाद 179 पर ढेर, स्मिथ की घातक गेंदबाजी
स्पोर्ट्स 
न्यूजीलैंड का दबदबा जारी, आयरलैंड पर फॉलोऑन का दबाव

धुरंधर 3 पर सस्पेंस बरकरार, राकेश बेदी बोले- मुझे कोई जानकारी नहीं

फ्रेंचाइजी की सफलता के बाद बढ़ीं चर्चाएं, लेकिन मेकर्स की तरफ से चुप्पी कायम
बालीवुड 
धुरंधर 3 पर सस्पेंस बरकरार, राकेश बेदी बोले- मुझे कोई जानकारी नहीं

बिजनेस

Copyright (c) Dainik Jagran All Rights Reserved.