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नेपाल में बालेन सरकार पर उठने लगे सवाल, 100 में 88 वादे अब तक अधूरे
Digital Desk
दो महीने में बढ़ी नाराजगी, मंत्रियों के इस्तीफे और अधूरे वादों पर घिरी सरकार
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी दो महीने ही हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार अब सवालों के घेरे में आ गई है। मार्च में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने बड़े बदलावों और प्रशासनिक सुधारों का दावा करते हुए 100 पॉइंट एजेंडा पेश किया था। उस समय युवाओं और खासकर जेन-जी वर्ग में इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया था। लोग मान रहे थे कि पारंपरिक राजनीति से अलग छवि रखने वाले बालेन नेपाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू करेंगे। लेकिन अब हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट के मुताबिक बालेन सरकार के 100 में से 88 वादे तय समय से पीछे चल रहे हैं। कई योजनाएं अभी शुरुआती स्तर पर भी नहीं पहुंच पाई हैं। विपक्ष तो सरकार पर सवाल उठा ही रहा है, अब उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पर भी युवा पूछ रहे हैं कि अगर नई राजनीति में भी पुराने तरीके ही दिखेंगे तो फिर बदलाव कहां है।
सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर दो मंत्रियों का इस्तीफा भी बालेन सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग पर एक विवादित कारोबारी से संबंधों के आरोप लगे। मामला बढ़ने के बाद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। इन घटनाओं ने सरकार की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुंचाया है।
बालेन शाह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे कई बड़े वादे किए थे। इसके अलावा डिजिटल निवेश व्यवस्था, ऊर्जा निर्यात नीति और बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने की बात भी कही गई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने इन वादों के लिए बेहद कम समय सीमा तय कर दी थी। कई योजनाओं को 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन में पूरा करने का दावा किया गया, जो व्यवहारिक तौर पर मुश्किल माना जा रहा था।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सुधारों और आयोगों की सिफारिशें लागू करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। लेकिन बालेन सरकार ने तेजी दिखाने के चक्कर में कई फैसले बिना पर्याप्त तैयारी के ले लिए। इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है।
सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अध्यादेशों के जरिए फैसले लेने को लेकर हो रही है। बालेन सरकार निचले सदन में मजबूत स्थिति में है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में सरकार ने कई अहम फैसले अध्यादेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की। इनमें छात्र संगठनों और सिविल सर्विस यूनियनों को खत्म करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। बाद में नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। छात्र संगठनों और सरकारी कर्मचारियों ने भी इसका विरोध किया।
बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई देते हुए कहा कि सरकारी दफ्तरों और स्कूलों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है। उनका कहना था कि छात्र संगठन और यूनियन अब पेशेवर संस्थाओं की जगह राजनीतिक दलों के “स्लीपर सेल” बन चुके हैं। हालांकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहा है।
इसी बीच सरकार द्वारा शुरू किए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान ने भी विवाद खड़ा कर दिया है। काठमांडू घाटी समेत कई इलाकों में बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 4 हजार ढांचे हटाए गए हैं, जिससे लगभग 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें बिना पर्याप्त समय दिए घरों और दुकानों से हटाया गया।
बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उनकी पहचान बुलडोजर एक्शन को लेकर बनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उसी मॉडल को देशभर में लागू करने की कोशिश की। लेकिन अब यह फैसला गरीब और भूमिहीन लोगों के विरोध का कारण बन रहा है।
भारत-नेपाल सीमा पर भी सरकार के नए नियमों को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू किया है। नियम के अनुसार 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लाने पर टैक्स देना होगा। दशकों से सीमा पर रहने वाले लोग भारत के शहरों से राशन, कपड़े और घरेलू सामान खरीदते रहे हैं। अब नए नियमों के बाद लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
बालेन शाह की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। चुनाव के दौरान उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। संसद में विपक्ष लगातार उनसे जवाब मांग रहा है। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं दिख रही। हालांकि सरकार का दावा है कि कुछ बड़े फैसले लागू किए जा चुके हैं। गरीब मरीजों के लिए अस्पतालों में मुफ्त बेड की व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच शुरू करना इनमें शामिल है।
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नेपाल में बालेन सरकार पर उठने लगे सवाल, 100 में 88 वादे अब तक अधूरे
Digital Desk
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी दो महीने ही हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार अब सवालों के घेरे में आ गई है। मार्च में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने बड़े बदलावों और प्रशासनिक सुधारों का दावा करते हुए 100 पॉइंट एजेंडा पेश किया था। उस समय युवाओं और खासकर जेन-जी वर्ग में इसे लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया था। लोग मान रहे थे कि पारंपरिक राजनीति से अलग छवि रखने वाले बालेन नेपाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू करेंगे। लेकिन अब हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट के मुताबिक बालेन सरकार के 100 में से 88 वादे तय समय से पीछे चल रहे हैं। कई योजनाएं अभी शुरुआती स्तर पर भी नहीं पहुंच पाई हैं। विपक्ष तो सरकार पर सवाल उठा ही रहा है, अब उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जाहिर करनी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया पर भी युवा पूछ रहे हैं कि अगर नई राजनीति में भी पुराने तरीके ही दिखेंगे तो फिर बदलाव कहां है।
सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर दो मंत्रियों का इस्तीफा भी बालेन सरकार के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग पर एक विवादित कारोबारी से संबंधों के आरोप लगे। मामला बढ़ने के बाद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। इन घटनाओं ने सरकार की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुंचाया है।
बालेन शाह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने, सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे कई बड़े वादे किए थे। इसके अलावा डिजिटल निवेश व्यवस्था, ऊर्जा निर्यात नीति और बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने की बात भी कही गई थी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने इन वादों के लिए बेहद कम समय सीमा तय कर दी थी। कई योजनाओं को 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन में पूरा करने का दावा किया गया, जो व्यवहारिक तौर पर मुश्किल माना जा रहा था।
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक सुधारों और आयोगों की सिफारिशें लागू करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। लेकिन बालेन सरकार ने तेजी दिखाने के चक्कर में कई फैसले बिना पर्याप्त तैयारी के ले लिए। इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है।
सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अध्यादेशों के जरिए फैसले लेने को लेकर हो रही है। बालेन सरकार निचले सदन में मजबूत स्थिति में है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में सरकार ने कई अहम फैसले अध्यादेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की। इनमें छात्र संगठनों और सिविल सर्विस यूनियनों को खत्म करने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। बाद में नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। छात्र संगठनों और सरकारी कर्मचारियों ने भी इसका विरोध किया।
बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई देते हुए कहा कि सरकारी दफ्तरों और स्कूलों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना जरूरी है। उनका कहना था कि छात्र संगठन और यूनियन अब पेशेवर संस्थाओं की जगह राजनीतिक दलों के “स्लीपर सेल” बन चुके हैं। हालांकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रहा है।
इसी बीच सरकार द्वारा शुरू किए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान ने भी विवाद खड़ा कर दिया है। काठमांडू घाटी समेत कई इलाकों में बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 4 हजार ढांचे हटाए गए हैं, जिससे लगभग 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें बिना पर्याप्त समय दिए घरों और दुकानों से हटाया गया।
बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उनकी पहचान बुलडोजर एक्शन को लेकर बनी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उसी मॉडल को देशभर में लागू करने की कोशिश की। लेकिन अब यह फैसला गरीब और भूमिहीन लोगों के विरोध का कारण बन रहा है।
भारत-नेपाल सीमा पर भी सरकार के नए नियमों को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू किया है। नियम के अनुसार 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लाने पर टैक्स देना होगा। दशकों से सीमा पर रहने वाले लोग भारत के शहरों से राशन, कपड़े और घरेलू सामान खरीदते रहे हैं। अब नए नियमों के बाद लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
बालेन शाह की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। चुनाव के दौरान उन्होंने पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कही थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। संसद में विपक्ष लगातार उनसे जवाब मांग रहा है। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं कि सरकार संसद के प्रति जवाबदेह क्यों नहीं दिख रही। हालांकि सरकार का दावा है कि कुछ बड़े फैसले लागू किए जा चुके हैं। गरीब मरीजों के लिए अस्पतालों में मुफ्त बेड की व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच शुरू करना इनमें शामिल है।
