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राष्ट्र प्रथम: जब नागरिक चेतना बनती है राष्ट्रीय शक्ति
डॉ. पंकज शुक्ला
प्रधानमंत्री के आह्वान से विकसित भारत के जनआंदोलन तक
इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि महान राष्ट्र केवल सरकारों की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से नहीं बनते; वे अपने नागरिकों की चेतना, अनुशासन, व्यवहार, उत्तरदायित्व और सामूहिक संकल्प से निर्मित होते हैं। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ केवल दिशा देना नहीं, बल्कि समाज की सुप्त ऊर्जा को जागृत करना भी है। भारत के वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा “राष्ट्र प्रथम” (Nation First) को जनजीवन के केंद्र में स्थापित करने का आह्वान इसी प्रकार का एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी हस्तक्षेप है। यह केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं है, बल्कि विकसित भारत की यात्रा के लिए एक नैतिक, विकासात्मक और राष्ट्रीय आचरण का घोष है।
भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल सरकारी दस्तावेजों में दर्ज एक संकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का साझा स्वप्न बन चुका है। परंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि किसी राष्ट्र का विकास केवल अधोसंरचना निर्माण, औद्योगिक विस्तार, आर्थिक नीतियों, निवेश, या प्रशासनिक तंत्र के बल पर पूर्ण नहीं होता। ये विकास के आवश्यक साधन अवश्य हैं, किंतु राष्ट्र निर्माण की आत्मा नागरिकों की भागीदारी में निहित होती है।
जब कोई नागरिक व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर उठकर सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देता है, जब वह विदेशी विकल्पों के स्थान पर स्वदेशी उत्पादों को अपनाता है, जब वह स्थानीय उद्यमों को सशक्त करने का निर्णय लेता है, जब वह अनावश्यक उपभोग के बजाय जिम्मेदार जीवनशैली अपनाता है, जब वह संसाधनों के संरक्षण को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझता है—तब वह केवल एक नागरिक नहीं रहता; वह राष्ट्र निर्माण का सक्रिय सहभागी बन जाता है। यही राष्ट्र प्रथम का वास्तविक अर्थ है।
प्रधानमंत्री का यह संदेश अपने भीतर एक गहरी रणनीतिक स्पष्टता समेटे हुए है। यह हमें बताता है कि भारत का अगला विकास चरण केवल संसद, मंत्रालयों, कॉरपोरेट बोर्डरूम, या नीतिगत संस्थानों में तय नहीं होगा। वह तय होगा परिवारों में, विद्यालयों में, बाजारों में, गाँवों में, जिलों में, और नागरिकों की दैनिक जीवनशैली में। लोकतंत्र का वास्तविक चरित्र केवल संविधान की संस्थाओं में नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यवहार में दिखाई देता है।
किसी राष्ट्र का चरित्र उसके भाषणों से नहीं, उसके आचरण से परिभाषित होता है।
क्या हम सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं?
क्या हम स्थानीय आजीविका को समर्थन देते हैं?
क्या हम महिलाओं को परिवर्तन के नेतृत्व में लाते हैं?
क्या हम पर्यावरणीय उत्तरदायित्व निभाते हैं?
क्या हम सुविधा से पहले राष्ट्रहित सोचते हैं?
क्या हम नागरिकता को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानते हैं?
ये केवल जीवनशैली के प्रश्न नहीं हैं; ये राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।
भारत में लंबे समय तक विकास को सरकार द्वारा जनता तक पहुँचाई जाने वाली सुविधा के रूप में देखा गया है। इस सोच में नागरिक एक लाभार्थी बन जाता है। परंतु विकसित राष्ट्र बनने के लिए यह मानसिकता पर्याप्त नहीं है। विकसित भारत को ऐसे नागरिक चाहिए जो स्वयं को केवल प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि भागीदार समझें। यही वह मानसिक परिवर्तन है जिसे प्रधानमंत्री का राष्ट्र प्रथम आह्वान गति देना चाहता है।
भारत केवल उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था बनकर विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता; उसे चेतना आधारित विकास मॉडल अपनाना होगा। एक विकसित राष्ट्र केवल चौड़ी सड़कों, आधुनिक हवाई अड्डों, डिजिटल नेटवर्क, तकनीकी पार्कों और GDP वृद्धि से नहीं बनता। ये विकास के दृश्य प्रतीक अवश्य हैं, परंतु एक वास्तविक विकसित राष्ट्र वह होता है जहाँ सार्वजनिक अनुशासन संस्कृति बन जाए, जिम्मेदारी स्वभाव बन जाए, स्थिरता जीवनशैली बन जाए, स्थानीय अर्थव्यवस्था सम्मान पाए, और नागरिक स्वेच्छा से अपने व्यवहार को राष्ट्रीय हित के साथ जोड़ें।
इसी कारण राष्ट्र प्रथम केवल एक नारा नहीं है; यह विकास की नागरिक अवधारणा है। यह व्यवहार में व्यक्त रणनीतिक राष्ट्रभक्ति है।
ग्रामीण विकास, सामाजिक परिवर्तन और सामुदायिक संस्थान निर्माण के क्षेत्र में वर्षों से कार्य करते हुए मेरा सदैव यह विश्वास रहा है कि आत्मनिर्भर गाँव ही आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला हैं। इसी विचार ने हमारे व्यापक विकास मॉडल “समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत” को जन्म दिया।
हमारा स्पष्ट मानना है कि यदि भारत के गाँव आर्थिक रूप से सक्षम, सामाजिक रूप से जागरूक, डिजिटल रूप से सशक्त, पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार और संस्थागत रूप से मजबूत बनते हैं, तो भारत का विकास केवल तेज नहीं होगा, बल्कि स्थायी और समावेशी होगा।
Gramya के माध्यम से हमारे प्रयास इसी सोच पर आधारित रहे हैं। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में हमारा प्रयास केवल कल्याण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में स्थापित करना रहा है। ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से हमने रोजगार को आत्मनिर्भरता से जोड़ा है। डिजिटल गवर्नेंस के माध्यम से पारदर्शिता और जनभागीदारी को बढ़ाने का प्रयास किया है। पोषण एवं स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों को गरिमा के साथ विकास से जोड़ने का कार्य किया है। ग्रीन विलेज अवधारणा के माध्यम से पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया है।
इस दृष्टि से देखें तो प्रधानमंत्री का ‘राष्ट्र प्रथम’ आह्वान हमारे लिए कोई बाहरी विचार नहीं है; बल्कि यह हमारी वर्षों पुरानी विकास यात्रा, आत्मनिर्भर भारत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और ‘समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत’ की अवधारणा का स्वाभाविक राष्ट्रीय विस्तार है।
विकास यात्रा को राष्ट्रीय दिशा प्रदान करने वाला संदेश है।
परंतु प्रेरणा तभी सार्थक होती है जब वह क्रियान्वयन में परिवर्तित हो।
इसी भावना के साथ, मैं Gramya के माध्यम से “समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत” के अंतर्गत एक विशेष जिला स्तरीय पहल “राष्ट्र प्रथम जनजागरण अभियान” प्रारंभ करने की घोषणा करता हूँ।
यह अभियान केवल औपचारिक जागरूकता कार्यक्रम नहीं होगा। यह नागरिक व्यवहार परिवर्तन का एक संगठित प्रयास होगा। इसका उद्देश्य नागरिकों को राष्ट्र निर्माण का सहभागी बनाना है। जिला इस अभियान की केंद्रीय इकाई इसलिए है क्योंकि यहीं शासन जनता से मिलता है, यहीं विकास का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है, और यहीं सामाजिक चेतना को प्रभावी रूप से संगठित किया जा सकता है।
यदि भारत का प्रत्येक जिला जिम्मेदार नागरिकता का केंद्र बन जाए, तो राष्ट्रीय परिवर्तन की गति अभूतपूर्व हो सकती है।
यह अभियान नागरिकों को प्रेरित करेगा कि वे स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें, स्थानीय व्यवसायों को सशक्त करें, सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण को अपनाएँ, सतत जीवनशैली विकसित करें, महिलाओं के नेतृत्व को प्रोत्साहित करें, युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें, और राष्ट्रीय लक्ष्यों को व्यक्तिगत संकल्प बनाएं।
यह पहल नागरिकों को निर्देश देने के लिए नहीं है; यह उन्हें प्रेरित करने के लिए है। क्योंकि वास्तविक परिवर्तन थोपा नहीं जा सकता—उसे अपनाना पड़ता है।
भारत के इतिहास में सबसे प्रभावी परिवर्तन वे रहे हैं जो जनआंदोलन बने। जब नागरिक किसी विचार को अपना व्यक्तिगत दायित्व मान लेते हैं, तब परिवर्तन स्थायी होता है। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र प्रथम का आह्वान कर राष्ट्रीय संवाद की शुरुआत की है। अब समाज, संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, सामाजिक संगठन, उद्योग जगत, और नागरिकों को इसे सामूहिक जनशक्ति में बदलना होगा।
आज हर भारतीय को स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए—
मैं अपने जीवन में ऐसा क्या बदल सकता हूँ जिससे भारत मजबूत हो?
क्या मैं स्थानीय उद्यमी को समर्थन दे सकता हूँ?
क्या मैं संसाधनों का संरक्षण कर सकता हूँ?
क्या मैं अनुशासित नागरिक बन सकता हूँ?
क्या मैं अपने व्यवहार से दूसरों को प्रेरित कर सकता हूँ?
क्योंकि राष्ट्र निर्माण एक संचयी प्रक्रिया है।
एक जिम्मेदार परिवार।
एक जागरूक नागरिक।
एक सशक्त महिला।
एक प्रेरित युवा।
एक नैतिक उद्यमी।
एक सक्रिय जिला।
इसी प्रकार महान राष्ट्र बनते हैं।
विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल नीतियों से नहीं, नागरिक सहभागिता से प्राप्त होगा।
राष्ट्र प्रथम केवल एक नारा नहीं—यह जीवन का राष्ट्रीय आचरण है।
Gramya, समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत के माध्यम से इस राष्ट्रीय दृष्टि को जनस्तर पर सशक्त करने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।
क्योंकि जब नागरिक चेतना राष्ट्रीय शक्ति बनती है, तब परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है।
भारत को आह्वान मिल चुका है।
अब भारत को उत्तर देना है।
राष्ट्र प्रथम। सदैव।
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राष्ट्र प्रथम: जब नागरिक चेतना बनती है राष्ट्रीय शक्ति
डॉ. पंकज शुक्ला
इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि महान राष्ट्र केवल सरकारों की नीतियों, योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं से नहीं बनते; वे अपने नागरिकों की चेतना, अनुशासन, व्यवहार, उत्तरदायित्व और सामूहिक संकल्प से निर्मित होते हैं। नेतृत्व का वास्तविक अर्थ केवल दिशा देना नहीं, बल्कि समाज की सुप्त ऊर्जा को जागृत करना भी है। भारत के वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा “राष्ट्र प्रथम” (Nation First) को जनजीवन के केंद्र में स्थापित करने का आह्वान इसी प्रकार का एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी हस्तक्षेप है। यह केवल एक राजनीतिक संदेश नहीं है, बल्कि विकसित भारत की यात्रा के लिए एक नैतिक, विकासात्मक और राष्ट्रीय आचरण का घोष है।
भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल सरकारी दस्तावेजों में दर्ज एक संकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का साझा स्वप्न बन चुका है। परंतु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि किसी राष्ट्र का विकास केवल अधोसंरचना निर्माण, औद्योगिक विस्तार, आर्थिक नीतियों, निवेश, या प्रशासनिक तंत्र के बल पर पूर्ण नहीं होता। ये विकास के आवश्यक साधन अवश्य हैं, किंतु राष्ट्र निर्माण की आत्मा नागरिकों की भागीदारी में निहित होती है।
जब कोई नागरिक व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर उठकर सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देता है, जब वह विदेशी विकल्पों के स्थान पर स्वदेशी उत्पादों को अपनाता है, जब वह स्थानीय उद्यमों को सशक्त करने का निर्णय लेता है, जब वह अनावश्यक उपभोग के बजाय जिम्मेदार जीवनशैली अपनाता है, जब वह संसाधनों के संरक्षण को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझता है—तब वह केवल एक नागरिक नहीं रहता; वह राष्ट्र निर्माण का सक्रिय सहभागी बन जाता है। यही राष्ट्र प्रथम का वास्तविक अर्थ है।
प्रधानमंत्री का यह संदेश अपने भीतर एक गहरी रणनीतिक स्पष्टता समेटे हुए है। यह हमें बताता है कि भारत का अगला विकास चरण केवल संसद, मंत्रालयों, कॉरपोरेट बोर्डरूम, या नीतिगत संस्थानों में तय नहीं होगा। वह तय होगा परिवारों में, विद्यालयों में, बाजारों में, गाँवों में, जिलों में, और नागरिकों की दैनिक जीवनशैली में। लोकतंत्र का वास्तविक चरित्र केवल संविधान की संस्थाओं में नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यवहार में दिखाई देता है।
किसी राष्ट्र का चरित्र उसके भाषणों से नहीं, उसके आचरण से परिभाषित होता है।
क्या हम सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं?
क्या हम स्थानीय आजीविका को समर्थन देते हैं?
क्या हम महिलाओं को परिवर्तन के नेतृत्व में लाते हैं?
क्या हम पर्यावरणीय उत्तरदायित्व निभाते हैं?
क्या हम सुविधा से पहले राष्ट्रहित सोचते हैं?
क्या हम नागरिकता को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानते हैं?
ये केवल जीवनशैली के प्रश्न नहीं हैं; ये राष्ट्र निर्माण के प्रश्न हैं।
भारत में लंबे समय तक विकास को सरकार द्वारा जनता तक पहुँचाई जाने वाली सुविधा के रूप में देखा गया है। इस सोच में नागरिक एक लाभार्थी बन जाता है। परंतु विकसित राष्ट्र बनने के लिए यह मानसिकता पर्याप्त नहीं है। विकसित भारत को ऐसे नागरिक चाहिए जो स्वयं को केवल प्राप्तकर्ता नहीं, बल्कि भागीदार समझें। यही वह मानसिक परिवर्तन है जिसे प्रधानमंत्री का राष्ट्र प्रथम आह्वान गति देना चाहता है।
भारत केवल उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था बनकर विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता; उसे चेतना आधारित विकास मॉडल अपनाना होगा। एक विकसित राष्ट्र केवल चौड़ी सड़कों, आधुनिक हवाई अड्डों, डिजिटल नेटवर्क, तकनीकी पार्कों और GDP वृद्धि से नहीं बनता। ये विकास के दृश्य प्रतीक अवश्य हैं, परंतु एक वास्तविक विकसित राष्ट्र वह होता है जहाँ सार्वजनिक अनुशासन संस्कृति बन जाए, जिम्मेदारी स्वभाव बन जाए, स्थिरता जीवनशैली बन जाए, स्थानीय अर्थव्यवस्था सम्मान पाए, और नागरिक स्वेच्छा से अपने व्यवहार को राष्ट्रीय हित के साथ जोड़ें।
इसी कारण राष्ट्र प्रथम केवल एक नारा नहीं है; यह विकास की नागरिक अवधारणा है। यह व्यवहार में व्यक्त रणनीतिक राष्ट्रभक्ति है।
ग्रामीण विकास, सामाजिक परिवर्तन और सामुदायिक संस्थान निर्माण के क्षेत्र में वर्षों से कार्य करते हुए मेरा सदैव यह विश्वास रहा है कि आत्मनिर्भर गाँव ही आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला हैं। इसी विचार ने हमारे व्यापक विकास मॉडल “समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत” को जन्म दिया।
हमारा स्पष्ट मानना है कि यदि भारत के गाँव आर्थिक रूप से सक्षम, सामाजिक रूप से जागरूक, डिजिटल रूप से सशक्त, पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार और संस्थागत रूप से मजबूत बनते हैं, तो भारत का विकास केवल तेज नहीं होगा, बल्कि स्थायी और समावेशी होगा।
Gramya के माध्यम से हमारे प्रयास इसी सोच पर आधारित रहे हैं। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में हमारा प्रयास केवल कल्याण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं को नेतृत्व की भूमिका में स्थापित करना रहा है। ग्रामीण उद्यमिता के माध्यम से हमने रोजगार को आत्मनिर्भरता से जोड़ा है। डिजिटल गवर्नेंस के माध्यम से पारदर्शिता और जनभागीदारी को बढ़ाने का प्रयास किया है। पोषण एवं स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों को गरिमा के साथ विकास से जोड़ने का कार्य किया है। ग्रीन विलेज अवधारणा के माध्यम से पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास किया है।
इस दृष्टि से देखें तो प्रधानमंत्री का ‘राष्ट्र प्रथम’ आह्वान हमारे लिए कोई बाहरी विचार नहीं है; बल्कि यह हमारी वर्षों पुरानी विकास यात्रा, आत्मनिर्भर भारत के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और ‘समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत’ की अवधारणा का स्वाभाविक राष्ट्रीय विस्तार है।
विकास यात्रा को राष्ट्रीय दिशा प्रदान करने वाला संदेश है।
परंतु प्रेरणा तभी सार्थक होती है जब वह क्रियान्वयन में परिवर्तित हो।
इसी भावना के साथ, मैं Gramya के माध्यम से “समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत” के अंतर्गत एक विशेष जिला स्तरीय पहल “राष्ट्र प्रथम जनजागरण अभियान” प्रारंभ करने की घोषणा करता हूँ।
यह अभियान केवल औपचारिक जागरूकता कार्यक्रम नहीं होगा। यह नागरिक व्यवहार परिवर्तन का एक संगठित प्रयास होगा। इसका उद्देश्य नागरिकों को राष्ट्र निर्माण का सहभागी बनाना है। जिला इस अभियान की केंद्रीय इकाई इसलिए है क्योंकि यहीं शासन जनता से मिलता है, यहीं विकास का वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है, और यहीं सामाजिक चेतना को प्रभावी रूप से संगठित किया जा सकता है।
यदि भारत का प्रत्येक जिला जिम्मेदार नागरिकता का केंद्र बन जाए, तो राष्ट्रीय परिवर्तन की गति अभूतपूर्व हो सकती है।
यह अभियान नागरिकों को प्रेरित करेगा कि वे स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें, स्थानीय व्यवसायों को सशक्त करें, सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण को अपनाएँ, सतत जीवनशैली विकसित करें, महिलाओं के नेतृत्व को प्रोत्साहित करें, युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें, और राष्ट्रीय लक्ष्यों को व्यक्तिगत संकल्प बनाएं।
यह पहल नागरिकों को निर्देश देने के लिए नहीं है; यह उन्हें प्रेरित करने के लिए है। क्योंकि वास्तविक परिवर्तन थोपा नहीं जा सकता—उसे अपनाना पड़ता है।
भारत के इतिहास में सबसे प्रभावी परिवर्तन वे रहे हैं जो जनआंदोलन बने। जब नागरिक किसी विचार को अपना व्यक्तिगत दायित्व मान लेते हैं, तब परिवर्तन स्थायी होता है। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र प्रथम का आह्वान कर राष्ट्रीय संवाद की शुरुआत की है। अब समाज, संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, सामाजिक संगठन, उद्योग जगत, और नागरिकों को इसे सामूहिक जनशक्ति में बदलना होगा।
आज हर भारतीय को स्वयं से एक प्रश्न पूछना चाहिए—
मैं अपने जीवन में ऐसा क्या बदल सकता हूँ जिससे भारत मजबूत हो?
क्या मैं स्थानीय उद्यमी को समर्थन दे सकता हूँ?
क्या मैं संसाधनों का संरक्षण कर सकता हूँ?
क्या मैं अनुशासित नागरिक बन सकता हूँ?
क्या मैं अपने व्यवहार से दूसरों को प्रेरित कर सकता हूँ?
क्योंकि राष्ट्र निर्माण एक संचयी प्रक्रिया है।
एक जिम्मेदार परिवार।
एक जागरूक नागरिक।
एक सशक्त महिला।
एक प्रेरित युवा।
एक नैतिक उद्यमी।
एक सक्रिय जिला।
इसी प्रकार महान राष्ट्र बनते हैं।
विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल नीतियों से नहीं, नागरिक सहभागिता से प्राप्त होगा।
राष्ट्र प्रथम केवल एक नारा नहीं—यह जीवन का राष्ट्रीय आचरण है।
Gramya, समृद्ध ग्राम, समृद्ध भारत के माध्यम से इस राष्ट्रीय दृष्टि को जनस्तर पर सशक्त करने के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।
क्योंकि जब नागरिक चेतना राष्ट्रीय शक्ति बनती है, तब परिवर्तन अवश्यंभावी हो जाता है।
भारत को आह्वान मिल चुका है।
अब भारत को उत्तर देना है।
राष्ट्र प्रथम। सदैव।
