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क्या संयुक्त राष्ट्र अब भी दुनिया को संभाल पा रहा है, या सिर्फ बातें करने का मंच बन गया है?
Ankita Suman
युद्ध, राजनीति और बदलती ताकतों के बीच UN की असली ताकत पर उठते सवाल
जब दुनिया में कहीं युद्ध छिड़ता है या कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो लोग उम्मीद से संयुक्त राष्ट्र की ओर देखते हैं। यही वह संस्था है जिसे देशों के बीच शांति बनाए रखने और बड़े विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि कई बार लगता है—क्या यह संस्था अब भी उतनी असरदार है, जितनी पहले हुआ करती थी?
United Nations ने बीते दशकों में कई अहम काम किए हैं। शांति मिशनों के जरिए संघर्ष वाले इलाकों में हालात संभाले, गरीब और संकटग्रस्त देशों को मदद पहुंचाई, और कई बार देशों को बातचीत की टेबल तक लाने में भी सफलता पाई। यानी इसकी अहमियत को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन समस्या तब सामने आती है, जब बड़े और ताकतवर देश अपने हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी देशों को मिला वीटो पावर कई बार फैसलों को रोक देता है। अगर किसी बड़े देश को कोई प्रस्ताव पसंद नहीं आता, तो वह उसे रोक सकता है—चाहे दुनिया के बाकी देश उसके पक्ष में ही क्यों न हों। ऐसे में UN की ताकत सीमित दिखने लगती है।
हाल के कई अंतरराष्ट्रीय संकटों में यही देखने को मिला कि संयुक्त राष्ट्र खुलकर कोई ठोस कदम नहीं उठा सका। बयान आए, बैठकों हुईं, लेकिन जमीन पर असर कम दिखा। इससे आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संस्था सिर्फ चर्चा करने तक सीमित हो गई है।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। जब बात मानवीय मदद की आती है—जैसे शरणार्थियों को राहत देना, भूख से जूझ रहे इलाकों में खाना पहुंचाना या प्राकृतिक आपदाओं के बाद सहायता देना—तो UN अब भी सबसे आगे नजर आता है। ऐसे कामों में इसकी भूमिका बेहद अहम है और शायद कोई दूसरा वैश्विक मंच इतनी संगठित मदद नहीं कर सकता।
एक और बड़ा मुद्दा यह है कि दुनिया बदल चुकी है, लेकिन UN की संरचना काफी हद तक वैसी ही है। आज भारत जैसे देश, जो वैश्विक स्तर पर मजबूत भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें भी फैसले लेने वाले मंच में बराबरी की जगह नहीं मिली है। इससे संस्था की प्रतिनिधित्व क्षमता पर सवाल उठते हैं।
सीधी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र अभी भी जरूरी है, लेकिन उसे बदलने की जरूरत है। अगर इसमें सुधार नहीं हुआ, तो यह धीरे-धीरे अपनी ताकत खो सकता है। और अगर समय के साथ खुद को ढाल लिया, तो यह फिर से दुनिया का सबसे भरोसेमंद मंच बन सकता है।
आखिरकार, संयुक्त राष्ट्र की असली ताकत उसके नियमों में नहीं, बल्कि देशों की नीयत में छिपी है। जब तक बड़े देश अपने हितों से ऊपर उठकर वैश्विक भलाई के बारे में नहीं सोचेंगे, तब तक कोई भी संस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकती।
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क्या संयुक्त राष्ट्र अब भी दुनिया को संभाल पा रहा है, या सिर्फ बातें करने का मंच बन गया है?
Ankita Suman
जब दुनिया में कहीं युद्ध छिड़ता है या कोई बड़ा संकट खड़ा होता है, तो लोग उम्मीद से संयुक्त राष्ट्र की ओर देखते हैं। यही वह संस्था है जिसे देशों के बीच शांति बनाए रखने और बड़े विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि कई बार लगता है—क्या यह संस्था अब भी उतनी असरदार है, जितनी पहले हुआ करती थी?
United Nations ने बीते दशकों में कई अहम काम किए हैं। शांति मिशनों के जरिए संघर्ष वाले इलाकों में हालात संभाले, गरीब और संकटग्रस्त देशों को मदद पहुंचाई, और कई बार देशों को बातचीत की टेबल तक लाने में भी सफलता पाई। यानी इसकी अहमियत को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन समस्या तब सामने आती है, जब बड़े और ताकतवर देश अपने हितों को सबसे ऊपर रखते हैं। सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी देशों को मिला वीटो पावर कई बार फैसलों को रोक देता है। अगर किसी बड़े देश को कोई प्रस्ताव पसंद नहीं आता, तो वह उसे रोक सकता है—चाहे दुनिया के बाकी देश उसके पक्ष में ही क्यों न हों। ऐसे में UN की ताकत सीमित दिखने लगती है।
हाल के कई अंतरराष्ट्रीय संकटों में यही देखने को मिला कि संयुक्त राष्ट्र खुलकर कोई ठोस कदम नहीं उठा सका। बयान आए, बैठकों हुईं, लेकिन जमीन पर असर कम दिखा। इससे आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह संस्था सिर्फ चर्चा करने तक सीमित हो गई है।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। जब बात मानवीय मदद की आती है—जैसे शरणार्थियों को राहत देना, भूख से जूझ रहे इलाकों में खाना पहुंचाना या प्राकृतिक आपदाओं के बाद सहायता देना—तो UN अब भी सबसे आगे नजर आता है। ऐसे कामों में इसकी भूमिका बेहद अहम है और शायद कोई दूसरा वैश्विक मंच इतनी संगठित मदद नहीं कर सकता।
एक और बड़ा मुद्दा यह है कि दुनिया बदल चुकी है, लेकिन UN की संरचना काफी हद तक वैसी ही है। आज भारत जैसे देश, जो वैश्विक स्तर पर मजबूत भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें भी फैसले लेने वाले मंच में बराबरी की जगह नहीं मिली है। इससे संस्था की प्रतिनिधित्व क्षमता पर सवाल उठते हैं।
सीधी बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र अभी भी जरूरी है, लेकिन उसे बदलने की जरूरत है। अगर इसमें सुधार नहीं हुआ, तो यह धीरे-धीरे अपनी ताकत खो सकता है। और अगर समय के साथ खुद को ढाल लिया, तो यह फिर से दुनिया का सबसे भरोसेमंद मंच बन सकता है।
आखिरकार, संयुक्त राष्ट्र की असली ताकत उसके नियमों में नहीं, बल्कि देशों की नीयत में छिपी है। जब तक बड़े देश अपने हितों से ऊपर उठकर वैश्विक भलाई के बारे में नहीं सोचेंगे, तब तक कोई भी संस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकती।
