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डॉन पर भारी पड़ा धुरंधर तो तिलमिला उठे तथाकथित फ़िल्ममेकर, रणवीर पर FWICE की कार्यवाही भी संदिग्ध
—रुद्र रवि शर्मा ( प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और फिल्म विश्लेषक)
मीडिया में चल रही ख़बरों को देखा जाए तो पता चलता है कि रणवीर सिंह को फिल्म इंडस्ट्री के भीतर व्यवस्थित तरीके से घेरने की कोशिश हो रही है। यह केवल एक अभिनेता के “वर्क एथिक्स” या “प्रोफेशनल बिहेवियर” का मामला नहीं है। यह उससे कहीं बड़ा खेल है। यह उस नैरेटिव की लड़ाई है जिसमें तय किया जाता है कि बॉलीवुड में कौन-सी विचारधारा स्वीकार्य होगी और कौन-सी नहीं।
रणवीर सिंह की सारे रिकॉर्ड तोड़नेवाली फिल्म धुरंधर को जिस तरह की सफलता मिली, उससे पहली बार रणवीर की छवि सिर्फ एक “एनर्जेटिक स्टार” या “फैशन आइकन” तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि एक ऐसे अभिनेता की बन रही है जो राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारतीय अस्मिता जैसे विषयों पर खुलकर फिल्म करने को तैयार है। शायद यही बात बॉलीवुड के उस कथित “लिबरल क्लब” को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
कई दशकों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक खास विचारधारा का दबदबा रहा है। यहां राष्ट्रवाद दिखाना तो ठीक है, लेकिन वह “फिल्टर” होकर दिखना चाहिए। देशभक्ति भी ऐसी हो जो कुछ लोगों को असहज न करे। सेना पर फिल्म बनाओ, मगर उसमें अपराधबोध भी डालो। भारत की बात करो, मगर उसके साथ तुरंत “लेकिन” जोड़ दो। यही बॉलीवुड का पुराना फॉर्मूला रहा है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दर्शक बदल चुका है। अब वह ऐसी फिल्मों को पसंद कर रहा है जो बिना शर्माए भारत की बात करें। उरी, शेरशाह, द कश्मीर फाइल्स, आर्टिकल 370 जैसी फिल्मों की सफलता ने यह साबित किया कि देश का आम दर्शक अपने राष्ट्र, अपनी सेना और अपनी सभ्यता पर गर्व महसूस करना चाहता है। उसे वह बॉलीवुड नहीं चाहिए जो हर बार भारत को कटघरे में खड़ा करके ही “बौद्धिक” कहलाना चाहता है।
फरहान अख्तर और उनके जैसे बॉलीवुड के कुछ प्रभावशाली चेहरों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे खुद को केवल कलाकार नहीं, बल्कि वैचारिक संरक्षक मानने लगे हैं। वर्षों तक ऐसे लोगों ने तय किया कि कौन-सी बात “प्रोग्रेसिव” कहलाएगी और कौन-सी “खतरनाक”। लेकिन धुरंधर की सफलता ने इस पूरे ढांचे को झटका दे दिया। रणवीर सिंह ने बिना किसी बौद्धिक माफी के राष्ट्रवाद की बात की, भारतीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता को केंद्र में रखा, और जनता ने उसे सिर-आंखों पर बैठा लिया। यही वह बात है जिसने फरहान अख्तर जैसे लोगों की बेचैनी बढ़ाई है। क्योंकि यह सफलता केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि उस वैचारिक एकाधिकार की हार है जो वर्षों से बॉलीवुड पर हावी था।
जब धुरंधर का पहला भाग रिलीज हुआ था, तब शायद बॉलीवुड के बड़े-बड़े विश्लेषकों ने भी नहीं सोचा होगा कि यह फिल्म केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं होगी, बल्कि एक सांस्कृतिक और वैचारिक बहस का केंद्र बन जाएगी। धुरंधर केवल एक फिल्म नहीं रही बल्कि यह एक संदेश बन गई है। संदेश यह कि अब बॉलीवुड में भी राष्ट्रवादी सिनेमा का दौर मजबूत हो सकता है।
यही कारण है कि रणवीर के खिलाफ अचानक “वर्क एथिक्स”, “व्यवहार”, “डिसिप्लिन” जैसी बातें उछाली जाने लगीं। सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में इससे पहले कभी किसी स्टार के व्यवहार पर सवाल नहीं उठे? क्या इंडस्ट्री में लेट आने वाले, शूटिंग कैंसिल करने वाले, सेट पर हंगामा करने वाले कलाकार नहीं रहे? पूरी इंडस्ट्री ऐसे किस्सों से भरी पड़ी है। फिर अचानक रणवीर सिंह ही क्यों निशाने पर हैं?
इसका जवाब राजनीति और विचारधारा में छिपा है। बॉलीवुड का एक प्रभावशाली वर्ग हमेशा से यह तय करता आया है कि कौन “प्रोग्रेसिव” कहलाएगा और कौन “प्रोपेगैंडा” का हिस्सा बना दिया जाएगा। अगर कोई अभिनेता सत्ता विरोधी बातें करे, हिंदू परंपराओं का मजाक उड़ाए, भारत की संस्थाओं पर सवाल उठाए — तो उसे “बहादुर कलाकार” कहा जाता है। लेकिन वही अभिनेता अगर राष्ट्रवाद की बात करे, भारतीय गौरव पर फिल्म करे या सेना के पक्ष में खड़ा दिखे, तो अचानक उसके खिलाफ “इंडस्ट्री की चिंता” शुरू हो जाती है।
FWICE के अशोक पंडित का बयान सुनकर सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर बॉलीवुड में यह “नैतिकता” अचानक रणवीर सिंह के मामले में ही क्यों जाग गई? हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास उठाकर देख लीजिए — कितनी फिल्मों की शूटिंग बीच में रुकी, कितने बड़े सितारों ने डेट्स बदल दीं, कितनी परियोजनाएँ अधूरी छोड़ दी गईं, कितने निर्माताओं का करोड़ों का नुकसान हुआ। लेकिन क्या कभी किसी सुपरस्टार के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक अभियान चलाकर ₹45 करोड़ जैसे आंकड़े उछाले गए? क्या कभी किसी अभिनेता को लगभग अपराधी की तरह पेश किया गया? क्या फरहान अख्तर ने जिस तरह इस फिल्म को लेकर रणवीर के साथ अनप्रोफेशनल व्यवहार किया उसको लेकर FWICE ने कोई सवाल क्यों नहीं उठाया? रणवीर से बिना पूछे स्क्रिप्ट बदल दी जबकि वह मुख्य किरदार हैं तो रणवीर को ऐसे में क्या करना चाहिए था? इसका जवाब फरहान अख्तर देंगे या अशोक पंडित?
अगर प्रोफेशनलिज़्म ही मुद्दा है, तो फिर इंडस्ट्री के कई बड़े नामों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या बॉलीवुड में पहली बार किसी अभिनेता ने फिल्म छोड़ी है? कई कलाकारों ने बीच शूटिंग में फिल्में छोड़ीं, स्क्रिप्ट बदलवाईं, प्रोड्यूसरों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन तब FWICE और उसके प्रवक्ता इतने आक्रामक नहीं दिखे। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि रणवीर सिंह के मामले में यह असामान्य सख्ती आखिर क्यों दिखाई जा रही है।
अगर हर असफल प्री-प्रोडक्शन, हर कास्टिंग बदलाव और हर क्रिएटिव मतभेद को “जुर्म” मान लिया जाए, तो आधा बॉलीवुड अदालतों और फेडरेशन के नोटिसों में उलझा मिलेगा। लेकिन यहां ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो रणवीर सिंह ने इंडस्ट्री के खिलाफ कोई साजिश कर दी हो।
यही वजह है कि मामला केवल आर्थिक नुकसान का नहीं लगता। धुरंधर की अभूतपूर्व सफलता और उसके बाद रणवीर सिंह का राष्ट्रवादी छवि के साथ उभरना कई लोगों को असहज कर रहा है। अशोक पंडित और फरहान अख्तर जैसे लोगों के बयानों को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। यह केवल “वर्क एथिक्स” की बहस नहीं, बल्कि उस अभिनेता को घेरने की कोशिश लगती है जो अब जनता के बीच एक अलग वैचारिक प्रतीक बन चुका है।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि बॉलीवुड में वर्षों से मौजूद भाई-भतीजावाद, कैंपबाज़ी और लॉबीइंग पर चुप रहने वाले लोग आज अचानक “इंडस्ट्री अनुशासन” के सबसे बड़े प्रहरी बन गए हैं। सवाल यह नहीं कि नुकसान हुआ या नहीं। सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में पहली बार नुकसान हुआ है? अगर नहीं, तो फिर रणवीर सिंह को ही उदाहरण बनाकर क्यों पेश किया जा रहा है? यही वो प्रश्न है जिसका जवाब अशोक पंडित और FWICE को देना चाहिए।
रणवीर सिंह के साथ जो हो रहा है, वह बेहद खतरनाक संकेत है। क्योंकि इसका मतलब है कि बॉलीवुड अब केवल मनोरंजन की जगह नहीं रह गया, बल्कि वैचारिक सेंसरशिप का अड्डा बनता जा रहा है। यहां आपको काम आपकी प्रतिभा से कम और आपकी विचारधारा से ज्यादा मिलेगा।
ये भी ध्यान देनेवाली बात है कि फरहान अख्तर जैसे लोग अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा झंडा उठाते हैं। लेकिन वह आजादी केवल तब तक स्वीकार्य है जब तक आप उनकी लाइन में चल रहे हों। जैसे ही आप अलग सोचते हैं, आपको “अनप्रोफेशनल”, “समस्याग्रस्त” या “खतरनाक” घोषित कर दिया जाता है। फरहान अख्तर जैसे लोग इस तरह की लॉबिंग में शामिल हैं, तो यह बॉलीवुड के उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है जो अभिव्यक्ति की आजादी की बात तो करता है, लेकिन केवल अपनी विचारधारा तक सीमित होकर।
और यह पूरा विवाद तब और ग़ौर करने लायक हो जाता है जब खबरें सामने आ रही हैं कि फरहान अख्तर अब आमिर खान की अगली फिल्म में एक पाकिस्तानी क्रिकेटर की भूमिका निभाने को लेकर चर्चा में हैं। यानी एक तरफ धुरंधर जैसी राष्ट्रवादी फिल्म करने वाले रणवीर सिंह के खिलाफ “वर्क एथिक्स” और “इंडस्ट्री अनुशासन” का नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान-केंद्रित विषयों पर काम करने में कोई वैचारिक असहजता दिखाई नहीं देती। यही बॉलीवुड का दोहरा मापदंड है। यहां भारतीय राष्ट्रवाद पर आधारित सिनेमा कुछ लोगों को “खतरनाक” लगने लगता है, लेकिन पाकिस्तान को मानवीय या सहानुभूतिपूर्ण नजरिए से दिखाने वाले प्रोजेक्ट्स तुरंत “सेंसिटिव सिनेमा” घोषित कर दिए जाते हैं।
आज रणवीर सिंह निशाने पर हैं, कल कोई और होगा। सवाल सिर्फ एक अभिनेता का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में राष्ट्रवाद अब भी “अस्वीकार्य विचार” माना जाएगा? क्या भारतीयता की बात करना अब भी कुछ लोगों को चुभता रहेगा?
विडंबना देखिए — जिस देश के दर्शकों के पैसे से ये इंडस्ट्री चलती है, उसी देश की भावनाओं को लंबे समय तक बॉलीवुड ने सेकेंडरी माना। लेकिन अब दर्शक जाग चुका है। अब वह टिकट खरीदते समय केवल स्टार नहीं देखता, वह यह भी देखता है कि फिल्म और कलाकार किस सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि आज “एलीट सर्कल” का प्रभाव धीरे-धीरे टूट रहा है।
रणवीर सिंह को लेकर अगर इंडस्ट्री में सचमुच कोई अभियान चल रहा है, तो यह उल्टा भी पड़ सकता है। क्योंकि भारत का दर्शक अब पहले जैसा नहीं है। उसे साफ दिखता है कि किसके साथ वैचारिक कारणों से भेदभाव हो रहा है। और जब जनता किसी कलाकार को “टारगेटेड” मान लेती है, तो वही कलाकार और बड़ा बनकर उभरता है।
धुरंधर और उसके आसपास इतना वैचारिक तनाव पैदा हो जाना इस बात का संकेत है कि फिल्म शायद किसी नस पर हाथ रख रही है। शायद यही डर है। डर इस बात का कि अगर राष्ट्रवाद को बड़े सितारों का समर्थन मिलने लगा, तो बॉलीवुड का पुराना वैचारिक ढांचा कमजोर पड़ जाएगा।
भारत बदल चुका है। दर्शक बदल चुका है। सिनेमा का स्वाद बदल चुका है। अब वह दौर नहीं रहा जब कुछ लोग बंद कमरों में तय करेंगे कि देशभक्ति “कूल” है या नहीं।
अगर रणवीर सिंह राष्ट्रवाद की बात करने वाली फिल्म के साथ खड़े हैं, तो उन्हें समर्थन मिलना चाहिए, न कि वैचारिक प्रतिशोध। क्योंकि किसी कलाकार का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा और काम से होना चाहिए, उसकी विचारधारा से नहीं।
— लेखक रुद्र रवि शर्मा एक प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और फिल्म विश्लेषक हैं।
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डॉन पर भारी पड़ा धुरंधर तो तिलमिला उठे तथाकथित फ़िल्ममेकर, रणवीर पर FWICE की कार्यवाही भी संदिग्ध
—रुद्र रवि शर्मा ( प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और फिल्म विश्लेषक)
रणवीर सिंह की सारे रिकॉर्ड तोड़नेवाली फिल्म धुरंधर को जिस तरह की सफलता मिली, उससे पहली बार रणवीर की छवि सिर्फ एक “एनर्जेटिक स्टार” या “फैशन आइकन” तक सीमित नहीं दिख रही, बल्कि एक ऐसे अभिनेता की बन रही है जो राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारतीय अस्मिता जैसे विषयों पर खुलकर फिल्म करने को तैयार है। शायद यही बात बॉलीवुड के उस कथित “लिबरल क्लब” को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है।
कई दशकों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक खास विचारधारा का दबदबा रहा है। यहां राष्ट्रवाद दिखाना तो ठीक है, लेकिन वह “फिल्टर” होकर दिखना चाहिए। देशभक्ति भी ऐसी हो जो कुछ लोगों को असहज न करे। सेना पर फिल्म बनाओ, मगर उसमें अपराधबोध भी डालो। भारत की बात करो, मगर उसके साथ तुरंत “लेकिन” जोड़ दो। यही बॉलीवुड का पुराना फॉर्मूला रहा है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दर्शक बदल चुका है। अब वह ऐसी फिल्मों को पसंद कर रहा है जो बिना शर्माए भारत की बात करें। उरी, शेरशाह, द कश्मीर फाइल्स, आर्टिकल 370 जैसी फिल्मों की सफलता ने यह साबित किया कि देश का आम दर्शक अपने राष्ट्र, अपनी सेना और अपनी सभ्यता पर गर्व महसूस करना चाहता है। उसे वह बॉलीवुड नहीं चाहिए जो हर बार भारत को कटघरे में खड़ा करके ही “बौद्धिक” कहलाना चाहता है।
फरहान अख्तर और उनके जैसे बॉलीवुड के कुछ प्रभावशाली चेहरों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे खुद को केवल कलाकार नहीं, बल्कि वैचारिक संरक्षक मानने लगे हैं। वर्षों तक ऐसे लोगों ने तय किया कि कौन-सी बात “प्रोग्रेसिव” कहलाएगी और कौन-सी “खतरनाक”। लेकिन धुरंधर की सफलता ने इस पूरे ढांचे को झटका दे दिया। रणवीर सिंह ने बिना किसी बौद्धिक माफी के राष्ट्रवाद की बात की, भारतीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता को केंद्र में रखा, और जनता ने उसे सिर-आंखों पर बैठा लिया। यही वह बात है जिसने फरहान अख्तर जैसे लोगों की बेचैनी बढ़ाई है। क्योंकि यह सफलता केवल एक फिल्म की सफलता नहीं, बल्कि उस वैचारिक एकाधिकार की हार है जो वर्षों से बॉलीवुड पर हावी था।
जब धुरंधर का पहला भाग रिलीज हुआ था, तब शायद बॉलीवुड के बड़े-बड़े विश्लेषकों ने भी नहीं सोचा होगा कि यह फिल्म केवल बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं होगी, बल्कि एक सांस्कृतिक और वैचारिक बहस का केंद्र बन जाएगी। धुरंधर केवल एक फिल्म नहीं रही बल्कि यह एक संदेश बन गई है। संदेश यह कि अब बॉलीवुड में भी राष्ट्रवादी सिनेमा का दौर मजबूत हो सकता है।
यही कारण है कि रणवीर के खिलाफ अचानक “वर्क एथिक्स”, “व्यवहार”, “डिसिप्लिन” जैसी बातें उछाली जाने लगीं। सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में इससे पहले कभी किसी स्टार के व्यवहार पर सवाल नहीं उठे? क्या इंडस्ट्री में लेट आने वाले, शूटिंग कैंसिल करने वाले, सेट पर हंगामा करने वाले कलाकार नहीं रहे? पूरी इंडस्ट्री ऐसे किस्सों से भरी पड़ी है। फिर अचानक रणवीर सिंह ही क्यों निशाने पर हैं?
इसका जवाब राजनीति और विचारधारा में छिपा है। बॉलीवुड का एक प्रभावशाली वर्ग हमेशा से यह तय करता आया है कि कौन “प्रोग्रेसिव” कहलाएगा और कौन “प्रोपेगैंडा” का हिस्सा बना दिया जाएगा। अगर कोई अभिनेता सत्ता विरोधी बातें करे, हिंदू परंपराओं का मजाक उड़ाए, भारत की संस्थाओं पर सवाल उठाए — तो उसे “बहादुर कलाकार” कहा जाता है। लेकिन वही अभिनेता अगर राष्ट्रवाद की बात करे, भारतीय गौरव पर फिल्म करे या सेना के पक्ष में खड़ा दिखे, तो अचानक उसके खिलाफ “इंडस्ट्री की चिंता” शुरू हो जाती है।
FWICE के अशोक पंडित का बयान सुनकर सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर बॉलीवुड में यह “नैतिकता” अचानक रणवीर सिंह के मामले में ही क्यों जाग गई? हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास उठाकर देख लीजिए — कितनी फिल्मों की शूटिंग बीच में रुकी, कितने बड़े सितारों ने डेट्स बदल दीं, कितनी परियोजनाएँ अधूरी छोड़ दी गईं, कितने निर्माताओं का करोड़ों का नुकसान हुआ। लेकिन क्या कभी किसी सुपरस्टार के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक अभियान चलाकर ₹45 करोड़ जैसे आंकड़े उछाले गए? क्या कभी किसी अभिनेता को लगभग अपराधी की तरह पेश किया गया? क्या फरहान अख्तर ने जिस तरह इस फिल्म को लेकर रणवीर के साथ अनप्रोफेशनल व्यवहार किया उसको लेकर FWICE ने कोई सवाल क्यों नहीं उठाया? रणवीर से बिना पूछे स्क्रिप्ट बदल दी जबकि वह मुख्य किरदार हैं तो रणवीर को ऐसे में क्या करना चाहिए था? इसका जवाब फरहान अख्तर देंगे या अशोक पंडित?
अगर प्रोफेशनलिज़्म ही मुद्दा है, तो फिर इंडस्ट्री के कई बड़े नामों पर समान कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या बॉलीवुड में पहली बार किसी अभिनेता ने फिल्म छोड़ी है? कई कलाकारों ने बीच शूटिंग में फिल्में छोड़ीं, स्क्रिप्ट बदलवाईं, प्रोड्यूसरों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन तब FWICE और उसके प्रवक्ता इतने आक्रामक नहीं दिखे। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि रणवीर सिंह के मामले में यह असामान्य सख्ती आखिर क्यों दिखाई जा रही है।
अगर हर असफल प्री-प्रोडक्शन, हर कास्टिंग बदलाव और हर क्रिएटिव मतभेद को “जुर्म” मान लिया जाए, तो आधा बॉलीवुड अदालतों और फेडरेशन के नोटिसों में उलझा मिलेगा। लेकिन यहां ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो रणवीर सिंह ने इंडस्ट्री के खिलाफ कोई साजिश कर दी हो।
यही वजह है कि मामला केवल आर्थिक नुकसान का नहीं लगता। धुरंधर की अभूतपूर्व सफलता और उसके बाद रणवीर सिंह का राष्ट्रवादी छवि के साथ उभरना कई लोगों को असहज कर रहा है। अशोक पंडित और फरहान अख्तर जैसे लोगों के बयानों को इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। यह केवल “वर्क एथिक्स” की बहस नहीं, बल्कि उस अभिनेता को घेरने की कोशिश लगती है जो अब जनता के बीच एक अलग वैचारिक प्रतीक बन चुका है।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि बॉलीवुड में वर्षों से मौजूद भाई-भतीजावाद, कैंपबाज़ी और लॉबीइंग पर चुप रहने वाले लोग आज अचानक “इंडस्ट्री अनुशासन” के सबसे बड़े प्रहरी बन गए हैं। सवाल यह नहीं कि नुकसान हुआ या नहीं। सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में पहली बार नुकसान हुआ है? अगर नहीं, तो फिर रणवीर सिंह को ही उदाहरण बनाकर क्यों पेश किया जा रहा है? यही वो प्रश्न है जिसका जवाब अशोक पंडित और FWICE को देना चाहिए।
रणवीर सिंह के साथ जो हो रहा है, वह बेहद खतरनाक संकेत है। क्योंकि इसका मतलब है कि बॉलीवुड अब केवल मनोरंजन की जगह नहीं रह गया, बल्कि वैचारिक सेंसरशिप का अड्डा बनता जा रहा है। यहां आपको काम आपकी प्रतिभा से कम और आपकी विचारधारा से ज्यादा मिलेगा।
ये भी ध्यान देनेवाली बात है कि फरहान अख्तर जैसे लोग अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा झंडा उठाते हैं। लेकिन वह आजादी केवल तब तक स्वीकार्य है जब तक आप उनकी लाइन में चल रहे हों। जैसे ही आप अलग सोचते हैं, आपको “अनप्रोफेशनल”, “समस्याग्रस्त” या “खतरनाक” घोषित कर दिया जाता है। फरहान अख्तर जैसे लोग इस तरह की लॉबिंग में शामिल हैं, तो यह बॉलीवुड के उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है जो अभिव्यक्ति की आजादी की बात तो करता है, लेकिन केवल अपनी विचारधारा तक सीमित होकर।
और यह पूरा विवाद तब और ग़ौर करने लायक हो जाता है जब खबरें सामने आ रही हैं कि फरहान अख्तर अब आमिर खान की अगली फिल्म में एक पाकिस्तानी क्रिकेटर की भूमिका निभाने को लेकर चर्चा में हैं। यानी एक तरफ धुरंधर जैसी राष्ट्रवादी फिल्म करने वाले रणवीर सिंह के खिलाफ “वर्क एथिक्स” और “इंडस्ट्री अनुशासन” का नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान-केंद्रित विषयों पर काम करने में कोई वैचारिक असहजता दिखाई नहीं देती। यही बॉलीवुड का दोहरा मापदंड है। यहां भारतीय राष्ट्रवाद पर आधारित सिनेमा कुछ लोगों को “खतरनाक” लगने लगता है, लेकिन पाकिस्तान को मानवीय या सहानुभूतिपूर्ण नजरिए से दिखाने वाले प्रोजेक्ट्स तुरंत “सेंसिटिव सिनेमा” घोषित कर दिए जाते हैं।
आज रणवीर सिंह निशाने पर हैं, कल कोई और होगा। सवाल सिर्फ एक अभिनेता का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि क्या बॉलीवुड में राष्ट्रवाद अब भी “अस्वीकार्य विचार” माना जाएगा? क्या भारतीयता की बात करना अब भी कुछ लोगों को चुभता रहेगा?
विडंबना देखिए — जिस देश के दर्शकों के पैसे से ये इंडस्ट्री चलती है, उसी देश की भावनाओं को लंबे समय तक बॉलीवुड ने सेकेंडरी माना। लेकिन अब दर्शक जाग चुका है। अब वह टिकट खरीदते समय केवल स्टार नहीं देखता, वह यह भी देखता है कि फिल्म और कलाकार किस सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि आज “एलीट सर्कल” का प्रभाव धीरे-धीरे टूट रहा है।
रणवीर सिंह को लेकर अगर इंडस्ट्री में सचमुच कोई अभियान चल रहा है, तो यह उल्टा भी पड़ सकता है। क्योंकि भारत का दर्शक अब पहले जैसा नहीं है। उसे साफ दिखता है कि किसके साथ वैचारिक कारणों से भेदभाव हो रहा है। और जब जनता किसी कलाकार को “टारगेटेड” मान लेती है, तो वही कलाकार और बड़ा बनकर उभरता है।
धुरंधर और उसके आसपास इतना वैचारिक तनाव पैदा हो जाना इस बात का संकेत है कि फिल्म शायद किसी नस पर हाथ रख रही है। शायद यही डर है। डर इस बात का कि अगर राष्ट्रवाद को बड़े सितारों का समर्थन मिलने लगा, तो बॉलीवुड का पुराना वैचारिक ढांचा कमजोर पड़ जाएगा।
भारत बदल चुका है। दर्शक बदल चुका है। सिनेमा का स्वाद बदल चुका है। अब वह दौर नहीं रहा जब कुछ लोग बंद कमरों में तय करेंगे कि देशभक्ति “कूल” है या नहीं।
अगर रणवीर सिंह राष्ट्रवाद की बात करने वाली फिल्म के साथ खड़े हैं, तो उन्हें समर्थन मिलना चाहिए, न कि वैचारिक प्रतिशोध। क्योंकि किसी कलाकार का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा और काम से होना चाहिए, उसकी विचारधारा से नहीं।
— लेखक रुद्र रवि शर्मा एक प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और फिल्म विश्लेषक हैं।
