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आज मनाया जा रहा है चंद्र दर्शन पर्व, अमावस्या के बाद पहली चंद्र झलक का विशेष धार्मिक महत्व
धर्म डेस्क
प्रतिपदा तिथि पर चंद्र देव की पूजा का शुभ संयोग, श्रद्धालु शाम को चंद्रमा के दर्शन कर करेंगे अर्घ्य अर्पित; सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की कामना के साथ रखा जाता है व्रत
हिंदू धर्म में चंद्र दर्शन का पर्व विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। अमावस्या के बाद पहली बार दिखाई देने वाले चंद्रमा के दर्शन को शुभ माना जाता है और इसी अवसर पर श्रद्धालु चंद्र देव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व बुधवार, 15 जुलाई को मनाया जा रहा है। देशभर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर शाम के समय चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन चंद्र देव की आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार चंद्र दर्शन का पर्व प्रतिपदा तिथि में मनाया जाता है। इस बार प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर हुई थी, जो 15 जुलाई को सुबह 11 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। पंचांग के अनुसार सूर्योदय प्रातः 5 बजकर 54 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 7 बजकर 11 मिनट पर होगा। खगोलीय गणना के अनुसार चंद्रमा का उदय सुबह 6 बजकर 32 मिनट तथा अस्त रात 8 बजकर 19 मिनट पर होगा। हालांकि धार्मिक परंपरा के अनुसार चंद्र दर्शन सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में दिखाई देने वाले प्रथम चंद्र के दर्शन के साथ किया जाता है। वास्तविक दर्शन का समय स्थानीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
हिंदू धर्मग्रंथों में चंद्र देव को नवग्रहों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, भावनाओं, बुद्धि, माता, मानसिक संतुलन और सुख-समृद्धि का कारक ग्रह माना गया है। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है, उन्हें मानसिक स्थिरता, पारिवारिक सुख, सामाजिक सम्मान और आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है। इसी कारण चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की पूजा करने और अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्र देव का विवाह प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था, जिन्हें 27 नक्षत्रों का स्वरूप माना जाता है। चंद्र देव को बुध ग्रह का पिता भी माना गया है। भारतीय पंचांग की गणना भी मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित होती है, इसलिए सनातन परंपरा में चंद्रमा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। प्रत्येक अमावस्या के बाद चंद्रमा का पुनः दिखाई देना नए आरंभ, आशा और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है।
चंद्र दर्शन के अवसर पर श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और शाम को चंद्रमा दिखाई देने के बाद पूजा करते हैं। पूजा के दौरान चंद्र देव को जल से अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके साथ सफेद पुष्प, अक्षत, चंदन, दूध और मिठाई भी अर्पित करने की परंपरा है। कई श्रद्धालु चंद्र देव के मंत्रों का जाप करते हैं और परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि तथा मानसिक संतुलन की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। परंपराओं के अनुसार चावल, चीनी, दूध, सफेद वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु ब्राह्मणों और जरूरतमंद लोगों को भोजन तथा अन्य सामग्री का दान भी करते हैं। मान्यता है कि इससे चंद्र देव प्रसन्न होते हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। धार्मिक विद्वानों के अनुसार दान और पूजा का उद्देश्य केवल ग्रहों की शांति नहीं बल्कि सेवा और सद्भाव की भावना को भी मजबूत करना है।
देशभर के मंदिरों में आज चंद्र दर्शन के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। कई स्थानों पर शाम के समय सामूहिक आरती, भजन-कीर्तन और चंद्र पूजन का आयोजन होगा। घरों में भी श्रद्धालु पूरे परिवार के साथ पूजा कर चंद्र देव से सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद मांगेंगे। धार्मिक मान्यता है कि चंद्र दर्शन का यह पर्व केवल ग्रह पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक शांति, नई शुरुआत और जीवन में सकारात्मक सोच को अपनाने का भी प्रतीक माना जाता है।
इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के पहले दिन पड़ने से इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। श्रद्धालु एक ओर मां दुर्गा की आराधना कर रहे हैं तो दूसरी ओर चंद्र देव की पूजा के माध्यम से मानसिक शांति और शुभ फल की कामना भी कर रहे हैं। कई मंदिरों में दोनों पर्वों को ध्यान में रखते हुए विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था की गई है और सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है।
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आज मनाया जा रहा है चंद्र दर्शन पर्व, अमावस्या के बाद पहली चंद्र झलक का विशेष धार्मिक महत्व
धर्म डेस्क
हिंदू धर्म में चंद्र दर्शन का पर्व विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है। अमावस्या के बाद पहली बार दिखाई देने वाले चंद्रमा के दर्शन को शुभ माना जाता है और इसी अवसर पर श्रद्धालु चंद्र देव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व बुधवार, 15 जुलाई को मनाया जा रहा है। देशभर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर शाम के समय चंद्रमा के दर्शन के बाद पूजा करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन चंद्र देव की आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार चंद्र दर्शन का पर्व प्रतिपदा तिथि में मनाया जाता है। इस बार प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर हुई थी, जो 15 जुलाई को सुबह 11 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। पंचांग के अनुसार सूर्योदय प्रातः 5 बजकर 54 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 7 बजकर 11 मिनट पर होगा। खगोलीय गणना के अनुसार चंद्रमा का उदय सुबह 6 बजकर 32 मिनट तथा अस्त रात 8 बजकर 19 मिनट पर होगा। हालांकि धार्मिक परंपरा के अनुसार चंद्र दर्शन सूर्यास्त के बाद पश्चिम दिशा में दिखाई देने वाले प्रथम चंद्र के दर्शन के साथ किया जाता है। वास्तविक दर्शन का समय स्थानीय मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
हिंदू धर्मग्रंथों में चंद्र देव को नवग्रहों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन, भावनाओं, बुद्धि, माता, मानसिक संतुलन और सुख-समृद्धि का कारक ग्रह माना गया है। मान्यता है कि जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है, उन्हें मानसिक स्थिरता, पारिवारिक सुख, सामाजिक सम्मान और आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है। इसी कारण चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की पूजा करने और अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्र देव का विवाह प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था, जिन्हें 27 नक्षत्रों का स्वरूप माना जाता है। चंद्र देव को बुध ग्रह का पिता भी माना गया है। भारतीय पंचांग की गणना भी मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित होती है, इसलिए सनातन परंपरा में चंद्रमा का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। प्रत्येक अमावस्या के बाद चंद्रमा का पुनः दिखाई देना नए आरंभ, आशा और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है।
चंद्र दर्शन के अवसर पर श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और शाम को चंद्रमा दिखाई देने के बाद पूजा करते हैं। पूजा के दौरान चंद्र देव को जल से अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके साथ सफेद पुष्प, अक्षत, चंदन, दूध और मिठाई भी अर्पित करने की परंपरा है। कई श्रद्धालु चंद्र देव के मंत्रों का जाप करते हैं और परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि तथा मानसिक संतुलन की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। परंपराओं के अनुसार चावल, चीनी, दूध, सफेद वस्त्र और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान शुभ माना जाता है। कई श्रद्धालु ब्राह्मणों और जरूरतमंद लोगों को भोजन तथा अन्य सामग्री का दान भी करते हैं। मान्यता है कि इससे चंद्र देव प्रसन्न होते हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। धार्मिक विद्वानों के अनुसार दान और पूजा का उद्देश्य केवल ग्रहों की शांति नहीं बल्कि सेवा और सद्भाव की भावना को भी मजबूत करना है।
देशभर के मंदिरों में आज चंद्र दर्शन के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। कई स्थानों पर शाम के समय सामूहिक आरती, भजन-कीर्तन और चंद्र पूजन का आयोजन होगा। घरों में भी श्रद्धालु पूरे परिवार के साथ पूजा कर चंद्र देव से सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद मांगेंगे। धार्मिक मान्यता है कि चंद्र दर्शन का यह पर्व केवल ग्रह पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक शांति, नई शुरुआत और जीवन में सकारात्मक सोच को अपनाने का भी प्रतीक माना जाता है।
इस वर्ष चंद्र दर्शन का पर्व आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के पहले दिन पड़ने से इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। श्रद्धालु एक ओर मां दुर्गा की आराधना कर रहे हैं तो दूसरी ओर चंद्र देव की पूजा के माध्यम से मानसिक शांति और शुभ फल की कामना भी कर रहे हैं। कई मंदिरों में दोनों पर्वों को ध्यान में रखते हुए विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था की गई है और सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है।
