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दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या उकसाने के मामले में सास बरी, हाईकोर्ट ने रद्द की 7 साल की सजा
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- दहेज के लिए मौत से पहले प्रताड़ना के पर्याप्त सबूत नहीं, निचली अदालत के फैसले को किया निरस्त
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों में दोषी ठहराई गई एक महिला को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने करीब 15 साल पहले निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि मृतका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था।
यह फैसला न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने आरोपी सास द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनाया। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वर्ष 2010 में आरोपी को दोषी मानते हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और मेडिकल रिकॉर्ड का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला।
मामला दुर्ग जिले का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार सोनल नामक युवती का विवाह 18 जून 2006 को मनीष के साथ हुआ था। शादी के करीब छह महीने बाद 21 दिसंबर 2006 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। मृतका के मायके पक्ष ने आरोप लगाया था कि शादी के कुछ समय बाद से ही उसकी सास शशिकला बाफना दहेज को लेकर असंतुष्ट थी और इसी कारण उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।
परिजनों का आरोप था कि मृतका के पति को कोलकाता में नौकरी मिल गई थी, लेकिन सास ने बहू को उसके पास भेजने से इनकार कर दिया था। आरोप लगाया गया कि सास ने कहा था कि जब तक वह मायके से 10 से 15 लाख रुपये लेकर नहीं आएगी, तब तक उसे पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसी कथित प्रताड़ना से परेशान होकर सोनल ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
अभियोजन के अनुसार घटना वाले दिन सुबह सास और बहू के बीच विवाद हुआ था। आरोप लगाया गया कि विवाद के दौरान सोनल के साथ मारपीट की गई और उसे घर से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद वह अपने मायके पहुंची और शाम के समय घर की छत से कूद गई। बाद में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। मामले की जांच के बाद पुलिस ने सास के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था।
वर्ष 2010 में दुर्ग की फास्ट ट्रैक अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी सास को दोषी मानते हुए सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर फैसले को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। वकील ने अदालत को बताया कि घटना के पांच दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई थी और इस देरी का कोई संतोषजनक कारण रिकॉर्ड पर नहीं है। इसके अलावा अस्पताल के शुरुआती रिकॉर्ड में परिजनों द्वारा डॉक्टरों को यह जानकारी दी गई थी कि सोनल बाथरूम में गिरने से घायल हुई थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि बाद में घटनाक्रम को अलग रूप देकर मामला दर्ज कराया गया।
मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम से जुड़े तथ्यों को भी अदालत के सामने रखा गया। बचाव पक्ष का कहना था कि मेडिकल साक्ष्य स्पष्ट रूप से यह स्थापित नहीं करते कि यह आत्महत्या थी, दुर्घटना थी या कोई अन्य परिस्थिति। इसके अलावा मृतका के माता-पिता और भाई ने भी अपने बयानों में स्वीकार किया कि आरोपी ने कभी उनके सामने सीधे तौर पर दहेज या पैसों की मांग नहीं की थी। जो भी जानकारी थी, वह केवल मृतका द्वारा बताई गई बातों पर आधारित थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि दहेज मृत्यु के मामलों में यह साबित होना आवश्यक है कि महिला को उसकी मृत्यु से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। यदि यह महत्वपूर्ण कड़ी स्थापित नहीं होती तो दहेज मृत्यु की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो सकतीं।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि सोनल की मृत्यु छत से कूदने के कारण ही हुई थी। शुरुआती मेडिकल दस्तावेजों में बाथरूम में गिरने की बात दर्ज थी, जिससे मामले में संदेह उत्पन्न होता है। अदालत ने यह भी कहा कि गवाहों के बयान केवल सामान्य पारिवारिक विवाद और सास-बहू के बीच होने वाले झगड़ों की ओर संकेत करते हैं। इन्हें दहेज के लिए क्रूरता या आत्महत्या के लिए उकसाने का ठोस प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सत्र न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का पर्याप्त और गहन मूल्यांकन नहीं किया तथा परिस्थितियों का समुचित विश्लेषण किए बिना दोषसिद्धि का आदेश पारित कर दिया। यह आदेश कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं पाया गया। अंततः हाईकोर्ट ने आरोपी सास की अपील स्वीकार करते हुए 17 मार्च 2010 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से ससम्मान बरी करने का निर्देश दिया।
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दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या उकसाने के मामले में सास बरी, हाईकोर्ट ने रद्द की 7 साल की सजा
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों में दोषी ठहराई गई एक महिला को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने करीब 15 साल पहले निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि मृतका को उसकी मौत से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था।
यह फैसला न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकल पीठ ने आरोपी सास द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनाया। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वर्ष 2010 में आरोपी को दोषी मानते हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और मेडिकल रिकॉर्ड का विस्तृत अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला।
मामला दुर्ग जिले का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार सोनल नामक युवती का विवाह 18 जून 2006 को मनीष के साथ हुआ था। शादी के करीब छह महीने बाद 21 दिसंबर 2006 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। मृतका के मायके पक्ष ने आरोप लगाया था कि शादी के कुछ समय बाद से ही उसकी सास शशिकला बाफना दहेज को लेकर असंतुष्ट थी और इसी कारण उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।
परिजनों का आरोप था कि मृतका के पति को कोलकाता में नौकरी मिल गई थी, लेकिन सास ने बहू को उसके पास भेजने से इनकार कर दिया था। आरोप लगाया गया कि सास ने कहा था कि जब तक वह मायके से 10 से 15 लाख रुपये लेकर नहीं आएगी, तब तक उसे पति के साथ रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसी कथित प्रताड़ना से परेशान होकर सोनल ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया।
अभियोजन के अनुसार घटना वाले दिन सुबह सास और बहू के बीच विवाद हुआ था। आरोप लगाया गया कि विवाद के दौरान सोनल के साथ मारपीट की गई और उसे घर से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद वह अपने मायके पहुंची और शाम के समय घर की छत से कूद गई। बाद में उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। मामले की जांच के बाद पुलिस ने सास के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया था।
वर्ष 2010 में दुर्ग की फास्ट ट्रैक अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी सास को दोषी मानते हुए सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर फैसले को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई महत्वपूर्ण तर्क रखे। वकील ने अदालत को बताया कि घटना के पांच दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई थी और इस देरी का कोई संतोषजनक कारण रिकॉर्ड पर नहीं है। इसके अलावा अस्पताल के शुरुआती रिकॉर्ड में परिजनों द्वारा डॉक्टरों को यह जानकारी दी गई थी कि सोनल बाथरूम में गिरने से घायल हुई थी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि बाद में घटनाक्रम को अलग रूप देकर मामला दर्ज कराया गया।
मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम से जुड़े तथ्यों को भी अदालत के सामने रखा गया। बचाव पक्ष का कहना था कि मेडिकल साक्ष्य स्पष्ट रूप से यह स्थापित नहीं करते कि यह आत्महत्या थी, दुर्घटना थी या कोई अन्य परिस्थिति। इसके अलावा मृतका के माता-पिता और भाई ने भी अपने बयानों में स्वीकार किया कि आरोपी ने कभी उनके सामने सीधे तौर पर दहेज या पैसों की मांग नहीं की थी। जो भी जानकारी थी, वह केवल मृतका द्वारा बताई गई बातों पर आधारित थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि दहेज मृत्यु के मामलों में यह साबित होना आवश्यक है कि महिला को उसकी मृत्यु से ठीक पहले दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया था। यदि यह महत्वपूर्ण कड़ी स्थापित नहीं होती तो दहेज मृत्यु की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो सकतीं।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि सोनल की मृत्यु छत से कूदने के कारण ही हुई थी। शुरुआती मेडिकल दस्तावेजों में बाथरूम में गिरने की बात दर्ज थी, जिससे मामले में संदेह उत्पन्न होता है। अदालत ने यह भी कहा कि गवाहों के बयान केवल सामान्य पारिवारिक विवाद और सास-बहू के बीच होने वाले झगड़ों की ओर संकेत करते हैं। इन्हें दहेज के लिए क्रूरता या आत्महत्या के लिए उकसाने का ठोस प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सत्र न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का पर्याप्त और गहन मूल्यांकन नहीं किया तथा परिस्थितियों का समुचित विश्लेषण किए बिना दोषसिद्धि का आदेश पारित कर दिया। यह आदेश कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं पाया गया। अंततः हाईकोर्ट ने आरोपी सास की अपील स्वीकार करते हुए 17 मार्च 2010 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से ससम्मान बरी करने का निर्देश दिया।
