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MP UCC Bill: मोहन कैबिनेट की मुहर, अब विधानसभा में आएगा समान नागरिक संहिता विधेयक; ST समुदाय दायरे से बाहर
मध्य प्रदेश
मोहन कैबिनेट ने UCC ड्राफ्ट को मंजूरी दी, विधानसभा के मानसून सत्र में पेश होगा बिल; आदिवासी समुदाय रहेगा दायरे से बाहर
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में रविवार को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी गई। कैबिनेट की स्वीकृति मिलने के बाद अब सरकार इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करने की तैयारी में है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में अधिक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।
राज्य सरकार की इस पहल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि UCC का विषय लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और कानूनी बहस का हिस्सा रहा है। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से गठित समिति ने विभिन्न सामाजिक, कानूनी और पारिवारिक पहलुओं का अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने की। समिति ने 13 जुलाई को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंपी थी, जिसके बाद इसे विधि विभाग और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़ाया गया।
सबसे अहम पहलू अनुसूचित जनजातियों से जुड़ा है। समिति की सिफारिश के मुताबिक आदिवासी यानी Scheduled Tribes समुदायों को प्रस्तावित UCC के दायरे से अलग रखा गया है। मध्य प्रदेश में बड़ी जनजातीय आबादी निवास करती है और कई समुदायों की विवाह, पारिवारिक संबंध, उत्तराधिकार तथा सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी अपनी पारंपरिक प्रथाएं हैं। इन्हीं विशिष्ट परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए जनजातीय समुदायों को कानून के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की गई।
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का प्रमुख प्रभाव व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों पर पड़ सकता है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषयों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में प्रावधान शामिल होने की बात सामने आई है। हालांकि, कानून के प्रत्येक प्रावधान की अंतिम और विस्तृत तस्वीर विधानसभा में विधेयक पेश होने और उसका आधिकारिक पाठ सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने UCC को समान नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा है कि कानून के स्तर पर नागरिकों के अधिकारों में समानता होनी चाहिए। सरकार का पक्ष है कि अलग-अलग धार्मिक या सामाजिक पृष्ठभूमि के बावजूद नागरिक मामलों में समान अधिकार और जिम्मेदारियों की व्यवस्था तैयार करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। कैबिनेट से मंजूरी के बाद सरकार अब इस प्रस्ताव को विधायी प्रक्रिया के अगले चरण में ले जाएगी।
UCC को लेकर विवाह संबंधी नियम सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले विषयों में शामिल हैं। समान नागरिक संहिता की मूल अवधारणा यह है कि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े प्रमुख नागरिक मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग व्यवस्थाओं के बजाय एक समान कानूनी ढांचा लागू किया जाए। ऐसे में विवाह की वैधानिक मान्यता, पंजीकरण, वैवाहिक अधिकार, तलाक और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे विषय विधानसभा में चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।
तलाक से जुड़े मामलों में भी प्रस्तावित कानून महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अभी विभिन्न समुदायों में व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर विवाह और वैवाहिक संबंध समाप्त करने की प्रक्रियाओं में अंतर देखने को मिलता है। UCC के जरिए इन मामलों में अधिक समान कानूनी प्रक्रिया बनाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, किन परिस्थितियों में तलाक दिया जा सकेगा, प्रक्रिया क्या होगी और मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर इसका कितना असर पड़ेगा, इसकी स्पष्ट जानकारी विधेयक के आधिकारिक प्रावधानों से सामने आएगी।
उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार भी UCC से जुड़े अहम विषय हैं। अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार से संबंधित नियम अलग हो सकते हैं। समान नागरिक संहिता की व्यवस्था में ऐसे मामलों के लिए अधिक समान नियम तैयार करने का उद्देश्य रखा जाता है। इससे महिलाओं, बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों के अधिकारों से जुड़े कई प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत राज्य सरकार द्वारा विशेषज्ञ समिति गठित किए जाने से हुई थी। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने कानूनी पहलुओं के साथ राज्य की सामाजिक संरचना और विभिन्न समुदायों की परंपराओं का अध्ययन किया। समिति की रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपे जाने के बाद इसे विधि विभाग के पास भेजा गया और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर परीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसके बाद मसौदा मंत्रिपरिषद के सामने पहुंचा और कैबिनेट की मंजूरी मिली।
मध्य प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होना निर्धारित है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार UCC विधेयक को इसी सत्र में सदन के सामने रखेगी। विधानसभा में विधेयक पेश होने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष इसके विभिन्न प्रावधानों पर अपनी बात रख सकेंगे। इसके बाद विधेयक को पारित कराने की संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
राजनीतिक स्तर पर भी यह विधेयक मानसून सत्र के सबसे चर्चित मुद्दों में शामिल रह सकता है। सरकार इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार के तौर पर पेश कर रही है, जबकि विपक्ष की ओर से विधेयक के प्रावधानों, उसके दायरे और विभिन्न समुदायों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। खासतौर पर यह चर्चा महत्वपूर्ण होगी कि किन व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव प्रस्तावित है और मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं के साथ नए कानून का समन्वय किस तरह किया जाएगा।
अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून से अलग रखने का फैसला मध्य प्रदेश के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। प्रदेश में कई जनजातीय समुदाय अपनी पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के अनुसार पारिवारिक जीवन से जुड़े मामलों का पालन करते हैं। समिति ने इसी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए जनजातीय समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की थी।
विधानसभा में विधेयक पेश होने के बाद इसके वास्तविक कानूनी स्वरूप की विस्तृत जानकारी सामने आएगी। खासतौर पर विवाह पंजीकरण, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और अन्य पारिवारिक मामलों से संबंधित धाराओं पर नजर रहेगी। इसके साथ यह भी स्पष्ट होगा कि कानून लागू होने की स्थिति में पुराने और नए मामलों के लिए क्या व्यवस्था होगी तथा नियमों को जमीन पर लागू करने के लिए सरकार किस तरह की प्रशासनिक प्रक्रिया निर्धारित करेगी।
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मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में राज्य सरकार ने बड़ा कदम बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में रविवार को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी गई। कैबिनेट की स्वीकृति मिलने के बाद अब सरकार इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करने की तैयारी में है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में अधिक समान कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।
राज्य सरकार की इस पहल को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि UCC का विषय लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और कानूनी बहस का हिस्सा रहा है। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से गठित समिति ने विभिन्न सामाजिक, कानूनी और पारिवारिक पहलुओं का अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने की। समिति ने 13 जुलाई को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंपी थी, जिसके बाद इसे विधि विभाग और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया से आगे बढ़ाया गया।
सबसे अहम पहलू अनुसूचित जनजातियों से जुड़ा है। समिति की सिफारिश के मुताबिक आदिवासी यानी Scheduled Tribes समुदायों को प्रस्तावित UCC के दायरे से अलग रखा गया है। मध्य प्रदेश में बड़ी जनजातीय आबादी निवास करती है और कई समुदायों की विवाह, पारिवारिक संबंध, उत्तराधिकार तथा सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी अपनी पारंपरिक प्रथाएं हैं। इन्हीं विशिष्ट परंपराओं और सामाजिक व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए जनजातीय समुदायों को कानून के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की गई।
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता का प्रमुख प्रभाव व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों पर पड़ सकता है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे विषयों के लिए समान कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में प्रावधान शामिल होने की बात सामने आई है। हालांकि, कानून के प्रत्येक प्रावधान की अंतिम और विस्तृत तस्वीर विधानसभा में विधेयक पेश होने और उसका आधिकारिक पाठ सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने UCC को समान नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा है कि कानून के स्तर पर नागरिकों के अधिकारों में समानता होनी चाहिए। सरकार का पक्ष है कि अलग-अलग धार्मिक या सामाजिक पृष्ठभूमि के बावजूद नागरिक मामलों में समान अधिकार और जिम्मेदारियों की व्यवस्था तैयार करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य है। कैबिनेट से मंजूरी के बाद सरकार अब इस प्रस्ताव को विधायी प्रक्रिया के अगले चरण में ले जाएगी।
UCC को लेकर विवाह संबंधी नियम सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले विषयों में शामिल हैं। समान नागरिक संहिता की मूल अवधारणा यह है कि व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े प्रमुख नागरिक मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग व्यवस्थाओं के बजाय एक समान कानूनी ढांचा लागू किया जाए। ऐसे में विवाह की वैधानिक मान्यता, पंजीकरण, वैवाहिक अधिकार, तलाक और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे विषय विधानसभा में चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं।
तलाक से जुड़े मामलों में भी प्रस्तावित कानून महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अभी विभिन्न समुदायों में व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर विवाह और वैवाहिक संबंध समाप्त करने की प्रक्रियाओं में अंतर देखने को मिलता है। UCC के जरिए इन मामलों में अधिक समान कानूनी प्रक्रिया बनाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, किन परिस्थितियों में तलाक दिया जा सकेगा, प्रक्रिया क्या होगी और मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों पर इसका कितना असर पड़ेगा, इसकी स्पष्ट जानकारी विधेयक के आधिकारिक प्रावधानों से सामने आएगी।
उत्तराधिकार और संपत्ति के अधिकार भी UCC से जुड़े अहम विषय हैं। अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार से संबंधित नियम अलग हो सकते हैं। समान नागरिक संहिता की व्यवस्था में ऐसे मामलों के लिए अधिक समान नियम तैयार करने का उद्देश्य रखा जाता है। इससे महिलाओं, बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों के अधिकारों से जुड़े कई प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत राज्य सरकार द्वारा विशेषज्ञ समिति गठित किए जाने से हुई थी। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने कानूनी पहलुओं के साथ राज्य की सामाजिक संरचना और विभिन्न समुदायों की परंपराओं का अध्ययन किया। समिति की रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपे जाने के बाद इसे विधि विभाग के पास भेजा गया और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर परीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसके बाद मसौदा मंत्रिपरिषद के सामने पहुंचा और कैबिनेट की मंजूरी मिली।
मध्य प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होना निर्धारित है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार UCC विधेयक को इसी सत्र में सदन के सामने रखेगी। विधानसभा में विधेयक पेश होने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष इसके विभिन्न प्रावधानों पर अपनी बात रख सकेंगे। इसके बाद विधेयक को पारित कराने की संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
राजनीतिक स्तर पर भी यह विधेयक मानसून सत्र के सबसे चर्चित मुद्दों में शामिल रह सकता है। सरकार इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार के तौर पर पेश कर रही है, जबकि विपक्ष की ओर से विधेयक के प्रावधानों, उसके दायरे और विभिन्न समुदायों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। खासतौर पर यह चर्चा महत्वपूर्ण होगी कि किन व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव प्रस्तावित है और मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं के साथ नए कानून का समन्वय किस तरह किया जाएगा।
अनुसूचित जनजातियों को प्रस्तावित कानून से अलग रखने का फैसला मध्य प्रदेश के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। प्रदेश में कई जनजातीय समुदाय अपनी पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं के अनुसार पारिवारिक जीवन से जुड़े मामलों का पालन करते हैं। समिति ने इसी विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए जनजातीय समुदायों को UCC के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की थी।
विधानसभा में विधेयक पेश होने के बाद इसके वास्तविक कानूनी स्वरूप की विस्तृत जानकारी सामने आएगी। खासतौर पर विवाह पंजीकरण, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और अन्य पारिवारिक मामलों से संबंधित धाराओं पर नजर रहेगी। इसके साथ यह भी स्पष्ट होगा कि कानून लागू होने की स्थिति में पुराने और नए मामलों के लिए क्या व्यवस्था होगी तथा नियमों को जमीन पर लागू करने के लिए सरकार किस तरह की प्रशासनिक प्रक्रिया निर्धारित करेगी।
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