नीलामी में धोखाधड़ी पर यूको बैंक को उपभोक्ता आयोग ने ठहराया दोषी, राशि लौटाने का आदेश

BHOPAL, MP

भोपाल जिला उपभोक्ता आयोग (बेंच-2) ने यूको बैंक को एक उपभोक्ता को 12 लाख रुपये से अधिक की राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।

भोपाल के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग की बेंच-2 ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यूको बैंक, शाखा लालघाटी, भोपाल को सेवा में कमी का दोषी करार दिया और परिवादी श्री मसूद अहमद कुरैशी को ₹12,01,786.92 की राशि 7% वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का आदेश पारित किया। यह राशि उस संपत्ति की थी, जो सरफेसी अधिनियम के तहत बैंक द्वारा नीलाम की गई थी।

यह निर्णय परिवादी मसूद अहमद कुरैशी द्वारा दायर परिवाद क्रमांक 203/2022 पर सुनवाई के बाद पारित किया गया। कुरैशी ने आरोप लगाया था कि यूको बैंक द्वारा नीलामी में बेची गई संपत्ति की पूरी राशि जमा करने के बाद भी न तो उन्हें संपत्ति का कब्जा सौंपा गया और न ही विक्रय-पत्र की रजिस्ट्री की गई।


मामले की पृष्ठभूमि

प्रकरण की शुरुआत 2013 में हुई थी, जब यूको बैंक ने सरफेसी अधिनियम, 2002 की धारा 8(5)(सी) के तहत एक वेयरहाउस (गोडाउन) की नीलामी हेतु सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन में यह उल्लेख किया गया था कि बैंक ने संपत्ति का आधिपत्य 27-11-2012 को प्राप्त कर लिया है।

परिवादी मसूद कुरैशी ने नीलामी में भाग लिया और ₹13,13,000/- की बोली राशि में से ₹1,17,000/- अग्रिम रूप में तथा शेष राशि ₹12,01,786.92/- बाद में जमा कर दी। बैंक ने उनके पक्ष में 21 मार्च 2013 को एक सेल सर्टिफिकेट जारी कर दिया।

परंतु, इसके पश्चात जब कुरैशी ने कब्जा प्राप्त करने और विक्रय-पत्र निष्पादित करने की प्रक्रिया प्रारंभ की, तो उन्हें बताया गया कि संबंधित भूमि फ्रीहोल्ड नहीं है और वह शासकीय भूमि है। इस पर न तो कब्जा सौंपा गया, न ही बैंक ने भुगतान की गई राशि लौटाई।


बैंक की आपत्तियां और आयोग की प्रतिक्रिया

बैंक की आपत्तियां:

  1. मामला परिसीमा (Limitation) की सीमा से बाहर है, क्योंकि वादकारण 2013 में उत्पन्न हुआ और परिवाद 2022 में दायर हुआ।

  2. परिवादी उपभोक्ता की परिभाषा में नहीं आता, क्योंकि यह मामला नीलामी से संबंधित है और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की परिधि से बाहर है।

  3. नीलामी "जहां है जैसी है" की शर्तों पर की गई थी, अतः कब्जा न मिलना कोई सेवा में कमी नहीं मानी जा सकती।

आयोग की प्रतिक्रिया:

आयोग ने कहा कि मामला परिसीमा अधिनियम की बाध्यता में नहीं आता क्योंकि विपक्षी बैंक ने कभी स्पष्ट रूप से कब्जा देने से इनकार नहीं किया। इसके चलते वादकारण की निरंतरता बनी रही। आयोग ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय Anthony H. Silva बनाम Hermonie Mary Salazar (2018) और Sanjay Kumar Joshi बनाम Municipal Board, Laxmangarh (2015) का हवाला देते हुए कहा कि जब तक उपभोक्ता को कब्जा नहीं सौंपा गया, वादकारण जीवित बना रहता है।

इसके अतिरिक्त, आयोग ने यह भी कहा कि—

“विपक्षी बैंक ने जानबूझकर गलत सूचना दी कि भूमि पर उसका कब्जा है, जबकि बाद में सामने आया कि वह भूमि सरकारी है। यह एक गंभीर मिसरिप्रजेंटेशन और धोखाधड़ी है, जो सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापार प्रथा के अंतर्गत आता है।”


निर्णय 

संपूर्ण सुनवाई और दस्तावेजों के अवलोकन के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि:

  • बैंक ने उपभोक्ता को न तो विक्रय-पत्र दिया, न ही कब्जा सौंपा।

  • पूरी राशि लेने के बाद भी कोई समाधान नहीं दिया गया।

  • उपभोक्ता को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक क्षति हुई।


यूको बैंक को आयोग द्वारा दिए गए निर्देश:

  1. ₹12,01,786.92/- (बारह लाख एक हजार सात सौ छियासी रुपए) की राशि पर 7% वार्षिक साधारण ब्याज सहित दो माह के भीतर परिवादी को लौटाएं (ब्याज की गणना 04 मार्च 2022 से होगी)।

  2. मानसिक, शारीरिक और आर्थिक क्षति के मद में ₹10,000/- अदा करें।

  3. परिवाद व्यय के रूप में ₹5,000/- का भुगतान करें।

  4. यदि आदेश की अनुपालना दो माह में नहीं की जाती, तो समस्त राशि पर 9% वार्षिक ब्याज लागू होगा।

 

परिवादी द्वारा भावना यादव, अधिवक्ता विपक्षी द्वारा ललित कुमार गुप्ता, अधिवक्ता ने  पैरवी की...

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13 Jun 2025 By दैनिक जागरण

नीलामी में धोखाधड़ी पर यूको बैंक को उपभोक्ता आयोग ने ठहराया दोषी, राशि लौटाने का आदेश

BHOPAL, MP

भोपाल के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग की बेंच-2 ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यूको बैंक, शाखा लालघाटी, भोपाल को सेवा में कमी का दोषी करार दिया और परिवादी श्री मसूद अहमद कुरैशी को ₹12,01,786.92 की राशि 7% वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का आदेश पारित किया। यह राशि उस संपत्ति की थी, जो सरफेसी अधिनियम के तहत बैंक द्वारा नीलाम की गई थी।

यह निर्णय परिवादी मसूद अहमद कुरैशी द्वारा दायर परिवाद क्रमांक 203/2022 पर सुनवाई के बाद पारित किया गया। कुरैशी ने आरोप लगाया था कि यूको बैंक द्वारा नीलामी में बेची गई संपत्ति की पूरी राशि जमा करने के बाद भी न तो उन्हें संपत्ति का कब्जा सौंपा गया और न ही विक्रय-पत्र की रजिस्ट्री की गई।


मामले की पृष्ठभूमि

प्रकरण की शुरुआत 2013 में हुई थी, जब यूको बैंक ने सरफेसी अधिनियम, 2002 की धारा 8(5)(सी) के तहत एक वेयरहाउस (गोडाउन) की नीलामी हेतु सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया। इस विज्ञापन में यह उल्लेख किया गया था कि बैंक ने संपत्ति का आधिपत्य 27-11-2012 को प्राप्त कर लिया है।

परिवादी मसूद कुरैशी ने नीलामी में भाग लिया और ₹13,13,000/- की बोली राशि में से ₹1,17,000/- अग्रिम रूप में तथा शेष राशि ₹12,01,786.92/- बाद में जमा कर दी। बैंक ने उनके पक्ष में 21 मार्च 2013 को एक सेल सर्टिफिकेट जारी कर दिया।

परंतु, इसके पश्चात जब कुरैशी ने कब्जा प्राप्त करने और विक्रय-पत्र निष्पादित करने की प्रक्रिया प्रारंभ की, तो उन्हें बताया गया कि संबंधित भूमि फ्रीहोल्ड नहीं है और वह शासकीय भूमि है। इस पर न तो कब्जा सौंपा गया, न ही बैंक ने भुगतान की गई राशि लौटाई।


बैंक की आपत्तियां और आयोग की प्रतिक्रिया

बैंक की आपत्तियां:

  1. मामला परिसीमा (Limitation) की सीमा से बाहर है, क्योंकि वादकारण 2013 में उत्पन्न हुआ और परिवाद 2022 में दायर हुआ।

  2. परिवादी उपभोक्ता की परिभाषा में नहीं आता, क्योंकि यह मामला नीलामी से संबंधित है और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की परिधि से बाहर है।

  3. नीलामी "जहां है जैसी है" की शर्तों पर की गई थी, अतः कब्जा न मिलना कोई सेवा में कमी नहीं मानी जा सकती।

आयोग की प्रतिक्रिया:

आयोग ने कहा कि मामला परिसीमा अधिनियम की बाध्यता में नहीं आता क्योंकि विपक्षी बैंक ने कभी स्पष्ट रूप से कब्जा देने से इनकार नहीं किया। इसके चलते वादकारण की निरंतरता बनी रही। आयोग ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय Anthony H. Silva बनाम Hermonie Mary Salazar (2018) और Sanjay Kumar Joshi बनाम Municipal Board, Laxmangarh (2015) का हवाला देते हुए कहा कि जब तक उपभोक्ता को कब्जा नहीं सौंपा गया, वादकारण जीवित बना रहता है।

इसके अतिरिक्त, आयोग ने यह भी कहा कि—

“विपक्षी बैंक ने जानबूझकर गलत सूचना दी कि भूमि पर उसका कब्जा है, जबकि बाद में सामने आया कि वह भूमि सरकारी है। यह एक गंभीर मिसरिप्रजेंटेशन और धोखाधड़ी है, जो सेवा में कमी तथा अनुचित व्यापार प्रथा के अंतर्गत आता है।”


निर्णय 

संपूर्ण सुनवाई और दस्तावेजों के अवलोकन के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि:

  • बैंक ने उपभोक्ता को न तो विक्रय-पत्र दिया, न ही कब्जा सौंपा।

  • पूरी राशि लेने के बाद भी कोई समाधान नहीं दिया गया।

  • उपभोक्ता को मानसिक, आर्थिक और शारीरिक क्षति हुई।


यूको बैंक को आयोग द्वारा दिए गए निर्देश:

  1. ₹12,01,786.92/- (बारह लाख एक हजार सात सौ छियासी रुपए) की राशि पर 7% वार्षिक साधारण ब्याज सहित दो माह के भीतर परिवादी को लौटाएं (ब्याज की गणना 04 मार्च 2022 से होगी)।

  2. मानसिक, शारीरिक और आर्थिक क्षति के मद में ₹10,000/- अदा करें।

  3. परिवाद व्यय के रूप में ₹5,000/- का भुगतान करें।

  4. यदि आदेश की अनुपालना दो माह में नहीं की जाती, तो समस्त राशि पर 9% वार्षिक ब्याज लागू होगा।

 

परिवादी द्वारा भावना यादव, अधिवक्ता विपक्षी द्वारा ललित कुमार गुप्ता, अधिवक्ता ने  पैरवी की...

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