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12 साल पुराने आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर का फैसला रद्द
Digital Desk
राजस्व मंडल के 2014 के आदेश का पालन नहीं होने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और अदालती आदेशों की अनदेखी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राजस्व मंडल के करीब 12 साल पुराने आदेश का पालन नहीं किए जाने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने इस मामले में कलेक्टर द्वारा जारी एक आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश के पालन में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब किसी सक्षम अदालत ने राजस्व मंडल के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई है, तब उसके क्रियान्वयन में वर्षों की देरी को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का उदाहरण माना। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि राजस्व मंडल ने 20 मई 2014 को अपना आदेश पारित किया था, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी उसका प्रभावी पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते। यदि किसी आदेश पर कोई स्थगन नहीं है, तो उसका समयबद्ध तरीके से पालन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी कहा कि आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है और इससे आम नागरिकों का भरोसा भी कमजोर होता है।
यह पूरा मामला एडवेंचर वाइल्ड लाइफ रिजॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजस्व मंडल के आदेश का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। उस समय भी न्यायालय ने प्रशासन को निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया और बाद में कलेक्टर की ओर से नया आदेश जारी कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2025 को प्रशासन को 45 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी निर्धारित समय में आदेश लागू नहीं किया गया। इसके बजाय 27 फरवरी 2026 को कलेक्टर की ओर से एक नया आदेश जारी किया गया, जिसमें यह स्पष्ट करने की बात कही गई कि मामले में कहीं कोई अपील या अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित तो नहीं है। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अनावश्यक बताया और कहा कि जब मूल आदेश पर किसी भी अदालत की ओर से रोक नहीं थी, तब इस तरह की कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं बनता।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित पैनल वकील ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि राजस्व मंडल के 2014 के आदेश पर किसी भी सक्षम न्यायालय ने कोई अंतरिम राहत या स्थगन आदेश जारी नहीं किया है। इस स्वीकारोक्ति के बाद अदालत ने माना कि आदेश के पालन में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही का परिणाम है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर अपने दायित्व से बच नहीं सकते। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं द्वारा दिए गए आदेशों का सम्मान करना प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि किसी आदेश को चुनौती नहीं दी गई है या उस पर रोक नहीं लगी है, तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से न केवल संबंधित पक्षों को नुकसान होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता भी प्रभावित होती है।
न्यायालय ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत का मानना है कि जवाबदेही तय किए बिना प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है ताकि भविष्य में न्यायालय के आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न हो। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। इससे स्पष्ट होता है कि अदालतें अब न्यायिक आदेशों के पालन में होने वाली देरी को गंभीरता से देख रही हैं। साथ ही यह निर्णय उन लोगों के लिए भी राहत का संकेत है, जो वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए न्यायालयों के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह निर्णय ऐसे मामलों में मिसाल बन सकता है, जहां प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून के शासन में न्यायालय के आदेश सर्वोपरि हैं और उनका समय पर पालन सुनिश्चित करना हर संबंधित अधिकारी का कर्तव्य है।
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12 साल पुराने आदेश की अनदेखी पर हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर का फैसला रद्द
Digital Desk
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और अदालती आदेशों की अनदेखी को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने राजस्व मंडल के करीब 12 साल पुराने आदेश का पालन नहीं किए जाने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने इस मामले में कलेक्टर द्वारा जारी एक आदेश को निरस्त कर दिया और आदेश के पालन में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब किसी सक्षम अदालत ने राजस्व मंडल के आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई है, तब उसके क्रियान्वयन में वर्षों की देरी को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने इसे प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का उदाहरण माना। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि राजस्व मंडल ने 20 मई 2014 को अपना आदेश पारित किया था, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी उसका प्रभावी पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारी न्यायिक आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते। यदि किसी आदेश पर कोई स्थगन नहीं है, तो उसका समयबद्ध तरीके से पालन करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी कहा कि आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को प्रभावित करती है और इससे आम नागरिकों का भरोसा भी कमजोर होता है।
यह पूरा मामला एडवेंचर वाइल्ड लाइफ रिजॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राजस्व मंडल के आदेश का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। उस समय भी न्यायालय ने प्रशासन को निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद आदेश का पालन नहीं किया गया और बाद में कलेक्टर की ओर से नया आदेश जारी कर दिया गया। रिकॉर्ड के अनुसार, हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2025 को प्रशासन को 45 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए थे। लेकिन इसके बाद भी निर्धारित समय में आदेश लागू नहीं किया गया। इसके बजाय 27 फरवरी 2026 को कलेक्टर की ओर से एक नया आदेश जारी किया गया, जिसमें यह स्पष्ट करने की बात कही गई कि मामले में कहीं कोई अपील या अन्य कानूनी कार्यवाही लंबित तो नहीं है। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अनावश्यक बताया और कहा कि जब मूल आदेश पर किसी भी अदालत की ओर से रोक नहीं थी, तब इस तरह की कार्रवाई का कोई औचित्य नहीं बनता।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित पैनल वकील ने भी अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि राजस्व मंडल के 2014 के आदेश पर किसी भी सक्षम न्यायालय ने कोई अंतरिम राहत या स्थगन आदेश जारी नहीं किया है। इस स्वीकारोक्ति के बाद अदालत ने माना कि आदेश के पालन में हुई देरी पूरी तरह प्रशासनिक स्तर पर हुई लापरवाही का परिणाम है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर अपने दायित्व से बच नहीं सकते। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं द्वारा दिए गए आदेशों का सम्मान करना प्रशासनिक अधिकारियों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि किसी आदेश को चुनौती नहीं दी गई है या उस पर रोक नहीं लगी है, तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में देरी से न केवल संबंधित पक्षों को नुकसान होता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता भी प्रभावित होती है।
न्यायालय ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत का मानना है कि जवाबदेही तय किए बिना प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। इसलिए ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है ताकि भविष्य में न्यायालय के आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी न हो। यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। इससे स्पष्ट होता है कि अदालतें अब न्यायिक आदेशों के पालन में होने वाली देरी को गंभीरता से देख रही हैं। साथ ही यह निर्णय उन लोगों के लिए भी राहत का संकेत है, जो वर्षों तक अपने अधिकारों के लिए न्यायालयों के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक आदेशों के सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह निर्णय ऐसे मामलों में मिसाल बन सकता है, जहां प्रशासनिक स्तर पर आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून के शासन में न्यायालय के आदेश सर्वोपरि हैं और उनका समय पर पालन सुनिश्चित करना हर संबंधित अधिकारी का कर्तव्य है।
