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इतिहास की किताबों से गायब आर्थिक सच उजागर करेगी '1947: ब्रेक्सिट इंडिया', डॉ. शशि थरूर बोले- हर युवा को देखना जरूरी
नई दिल्ली
भारत की स्वतंत्रता और वर्ष 1947 के विभाजन को लेकर दशकों से पारंपरिक राजनीतिक दृष्टिकोण ही सामने रखा जाता रहा है, लेकिन इतिहास का एक ऐसा महत्वपूर्ण आर्थिक अध्याय भी है जिसे अब तक मुख्यधारा की चर्चाओं से दूर रखा गया। आगामी फीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री "1947: ब्रेक्सिट इंडिया" (1947: Brexit India) इसी अनकहे सच को कड़े और तथ्यात्मक वित्तीय (Financial) नज़रिए से पर्दे पर ला रही है। इस ऐतिहासिक व शोध-आधारित विमर्श को देखने के बाद डॉ. शशि थरूर का मानना है कि देश की वर्तमान युवा पीढ़ी, विशेषकर 'जनरेशन जेड' (Gen Z) और 'जनरेशन अल्फा' (Gen Alpha) को यह डॉक्यूमेंट्री अनिवार्य रूप से देखनी चाहिए।
यह प्रोजेक्ट पारंपरिक राजनीतिक घटनाक्रमों से हटकर यह स्थापित करता है कि कैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से पूरी तरह जर्जर हो चुका ब्रिटेन, अमेरिकी ऋण (Loan) की शर्तों के आगे घुटने टेक चुका था। इसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अंग्रेजों ने जल्दबाजी में विभाजन का निर्णय लिया, ताकि भारत और पाकिस्तान के सिर पर भारी मानवीय व लॉजिस्टिकल तबाही का ठीकरा फोड़कर वे स्वयं एक सुरक्षित और रणनीतिक 'एग्जिट' ले सकें।
इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज का हिस्सा बनने और इसके विभिन्न आयामों को करीब से देखने के बाद डॉ. शशि थरूर ने कहा, “इतिहास कभी भी सिर्फ बीते हुए कल के बारे में नहीं होता; यह हमारे आज को भी आकार देता है। ब्रिटिश शासन के साथ भारत के इस लंबे सफर की विचारशील खोज में अपना योगदान देकर मुझे बेहद खुशी हो रही है।”
इस खास विषय को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए मशहूर लेखिका शमा जैदी की लिखी पटकथा और संजीवन लाल के निर्देशन में बनी यह फिल्म रटी-रटाई कहानियों से अलग एक व्यावहारिक आर्थिक दृष्टिकोण अपनाती है। इस डॉक्यूमेंट्री में डॉ. थरूर के अलावा विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ कमोडोर उदय भास्कर और प्रख्यात राजनीतिक वैज्ञानिक डॉ. इश्तियाक अहमद जैसे अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के साक्ष्य और विचार शामिल हैं। इन सभी विशेषज्ञों ने मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक आर्थिक लागत का एक तरह से 'फोरेंसिक पोस्टमार्टम' किया है, जिसे बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता बोमन ईरानी की गंभीर और असरदार आवाज ने और अधिक प्रभावशाली बना दिया है।
इस फिल्म के दृष्टिकोण की गहराई का अंदाजा हाल ही में दिल्ली में आयोजित हुई इसकी एक एक्सक्लूसिव स्क्रीनिंग से भी लगाया जा सकता है, जहां पहुंचे राजनयिकों, इतिहासकारों और सीनियर पत्रकारों के बीच इस नए पहलू को लेकर एक व्यापक सहमति देखी गई। वहां मौजूद मेहमानों का साफ कहना था कि यह फिल्म देश के सामने एक ऐसा सच लेकर आती है, जिस पर हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली में हमेशा पर्दा डाला गया है।
इस पूरे प्रयास की सबसे बड़ी ताकत इसके पीछे की गई 10 साल से ज्यादा की लंबी रिसर्च है। फिल्म के निर्माता और कॉन्सेप्ट क्रिएटर डॉ. स्वर्णजीत सिंह का कहना है कि यह प्रोजेक्ट केवल एक ऐतिहासिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का एक निष्पक्ष 'फाइनेंशियल ऑडिट' है। यह साफ दिखाता है कि अंग्रेज भारत में सिर्फ व्यापारी बनकर आए थे और उन्होंने यहाँ के संसाधनों पर एक माफिया की तरह नियंत्रण किया, लेकिन जैसे ही दूसरे विश्व युद्ध के बाद उनकी अपनी कंपनी की बैलेंस शीट घाटे में आई, वे एक जल्दबाजी का सौदा करके जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए। वहीं, डायरेक्टर संजीवन लाल ने बताया कि 10 साल के इस जटिल वित्तीय डेटा को इंसानी त्रासदी के साथ जोड़कर पर्दे पर उतारना एक बड़ी क्रिएटिव चुनौती थी, जो अब विभाजन को लेकर चल रही पुरानी बहसों को एक बिल्कुल नया और तार्किक मोड़ देगी।
इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) 2023 में ऑफिशियल सिलेक्शन पा चुकी यह ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री अब बहुत जल्द एक प्रमुख ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर अपने डिजिटल प्रीमियर के साथ आम दर्शकों के बीच आने के लिए पूरी तरह तैयार है।
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इतिहास की किताबों से गायब आर्थिक सच उजागर करेगी '1947: ब्रेक्सिट इंडिया', डॉ. शशि थरूर बोले- हर युवा को देखना जरूरी
नई दिल्ली
भारत की स्वतंत्रता और वर्ष 1947 के विभाजन को लेकर दशकों से पारंपरिक राजनीतिक दृष्टिकोण ही सामने रखा जाता रहा है, लेकिन इतिहास का एक ऐसा महत्वपूर्ण आर्थिक अध्याय भी है जिसे अब तक मुख्यधारा की चर्चाओं से दूर रखा गया। आगामी फीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री "1947: ब्रेक्सिट इंडिया" (1947: Brexit India) इसी अनकहे सच को कड़े और तथ्यात्मक वित्तीय (Financial) नज़रिए से पर्दे पर ला रही है। इस ऐतिहासिक व शोध-आधारित विमर्श को देखने के बाद डॉ. शशि थरूर का मानना है कि देश की वर्तमान युवा पीढ़ी, विशेषकर 'जनरेशन जेड' (Gen Z) और 'जनरेशन अल्फा' (Gen Alpha) को यह डॉक्यूमेंट्री अनिवार्य रूप से देखनी चाहिए।
यह प्रोजेक्ट पारंपरिक राजनीतिक घटनाक्रमों से हटकर यह स्थापित करता है कि कैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से पूरी तरह जर्जर हो चुका ब्रिटेन, अमेरिकी ऋण (Loan) की शर्तों के आगे घुटने टेक चुका था। इसी अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अंग्रेजों ने जल्दबाजी में विभाजन का निर्णय लिया, ताकि भारत और पाकिस्तान के सिर पर भारी मानवीय व लॉजिस्टिकल तबाही का ठीकरा फोड़कर वे स्वयं एक सुरक्षित और रणनीतिक 'एग्जिट' ले सकें।
इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज का हिस्सा बनने और इसके विभिन्न आयामों को करीब से देखने के बाद डॉ. शशि थरूर ने कहा, “इतिहास कभी भी सिर्फ बीते हुए कल के बारे में नहीं होता; यह हमारे आज को भी आकार देता है। ब्रिटिश शासन के साथ भारत के इस लंबे सफर की विचारशील खोज में अपना योगदान देकर मुझे बेहद खुशी हो रही है।”
इस खास विषय को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए मशहूर लेखिका शमा जैदी की लिखी पटकथा और संजीवन लाल के निर्देशन में बनी यह फिल्म रटी-रटाई कहानियों से अलग एक व्यावहारिक आर्थिक दृष्टिकोण अपनाती है। इस डॉक्यूमेंट्री में डॉ. थरूर के अलावा विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ कमोडोर उदय भास्कर और प्रख्यात राजनीतिक वैज्ञानिक डॉ. इश्तियाक अहमद जैसे अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के साक्ष्य और विचार शामिल हैं। इन सभी विशेषज्ञों ने मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक आर्थिक लागत का एक तरह से 'फोरेंसिक पोस्टमार्टम' किया है, जिसे बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता बोमन ईरानी की गंभीर और असरदार आवाज ने और अधिक प्रभावशाली बना दिया है।
इस फिल्म के दृष्टिकोण की गहराई का अंदाजा हाल ही में दिल्ली में आयोजित हुई इसकी एक एक्सक्लूसिव स्क्रीनिंग से भी लगाया जा सकता है, जहां पहुंचे राजनयिकों, इतिहासकारों और सीनियर पत्रकारों के बीच इस नए पहलू को लेकर एक व्यापक सहमति देखी गई। वहां मौजूद मेहमानों का साफ कहना था कि यह फिल्म देश के सामने एक ऐसा सच लेकर आती है, जिस पर हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली में हमेशा पर्दा डाला गया है।
इस पूरे प्रयास की सबसे बड़ी ताकत इसके पीछे की गई 10 साल से ज्यादा की लंबी रिसर्च है। फिल्म के निर्माता और कॉन्सेप्ट क्रिएटर डॉ. स्वर्णजीत सिंह का कहना है कि यह प्रोजेक्ट केवल एक ऐतिहासिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य का एक निष्पक्ष 'फाइनेंशियल ऑडिट' है। यह साफ दिखाता है कि अंग्रेज भारत में सिर्फ व्यापारी बनकर आए थे और उन्होंने यहाँ के संसाधनों पर एक माफिया की तरह नियंत्रण किया, लेकिन जैसे ही दूसरे विश्व युद्ध के बाद उनकी अपनी कंपनी की बैलेंस शीट घाटे में आई, वे एक जल्दबाजी का सौदा करके जिम्मेदारी से भाग खड़े हुए। वहीं, डायरेक्टर संजीवन लाल ने बताया कि 10 साल के इस जटिल वित्तीय डेटा को इंसानी त्रासदी के साथ जोड़कर पर्दे पर उतारना एक बड़ी क्रिएटिव चुनौती थी, जो अब विभाजन को लेकर चल रही पुरानी बहसों को एक बिल्कुल नया और तार्किक मोड़ देगी।
इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) 2023 में ऑफिशियल सिलेक्शन पा चुकी यह ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री अब बहुत जल्द एक प्रमुख ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर अपने डिजिटल प्रीमियर के साथ आम दर्शकों के बीच आने के लिए पूरी तरह तैयार है।
