FY26 GDP आंकड़े आज होंगे जारी, नए बेस ईयर के साथ इन 6 संकेतकों पर रहेगी बाजार की नजर

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देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और आने वाले महीनों में बाजार की चाल को लेकर आज का दिन अहम माना जा रहा है। केंद्र सरकार शुक्रवार शाम 4 बजे FY26 की जनवरी-मार्च तिमाही के GDP आंकड़े जारी करेगी। इसके साथ पूरे वित्त वर्ष के विकास दर के आंकड़े भी सामने आएंगे। इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आंकड़े नए बेस ईयर 2022-23 के साथ जारी किए जाएंगे, इसलिए सिर्फ ग्रोथ नंबर ही नहीं बल्कि उनकी व्याख्या भी काफी महत्वपूर्ण रहने वाली है। शेयर बाजार से लेकर निवेशकों, कंपनियों और नीति निर्माताओं तक सभी की नजर इन आंकड़ों पर बनी हुई है।

इकोनॉमिस्ट्स का अनुमान है कि FY26 में भारत की आर्थिक वृद्धि करीब 7.4 फीसदी रह सकती है। हालांकि यह अनुमान पहले जारी दूसरे एडवांस एस्टिमेट्स से थोड़ा कम माना जा रहा है। बाजार के जानकार मानते हैं कि केवल GDP ग्रोथ नंबर देखना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि उसके पीछे छिपे कई इंडिकेटर्स आने वाले समय की असली तस्वीर दिखा सकते हैं। यही वजह है कि आज जारी होने वाले आंकड़ों में छह प्रमुख संकेतकों पर सबसे ज्यादा फोकस रहने वाला है।

सबसे पहले बात GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद की करें तो यही वह आंकड़ा होता है जिससे पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। GDP देश के भीतर तय समय में तैयार हुई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं की कुल वैल्यू को दर्शाता है। अगर ग्रोथ उम्मीद से ज्यादा आती है तो इसका असर बाजार और निवेश माहौल पर सकारात्मक दिख सकता है, जबकि कमजोर आंकड़े निवेशकों की चिंता बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञ इस बार रियल और नॉमिनल दोनों तरह के GDP आंकड़ों पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि इनसे महंगाई और वास्तविक आर्थिक गतिविधियों दोनों की तस्वीर साफ होगी।

दूसरा महत्वपूर्ण संकेतक GVA यानी सकल मूल्य वर्धित माना जा रहा है। कई अर्थशास्त्री GDP से ज्यादा GVA को अर्थव्यवस्था की असली स्थिति समझने का पैमाना मानते हैं क्योंकि यह सीधे उत्पादन गतिविधियों से जुड़ा होता है। इसमें कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और इंडस्ट्री सेक्टर का प्रदर्शन साफ दिखाई देता है। अनुमान है कि FY26 में GVA ग्रोथ करीब 7.7 फीसदी रह सकती है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो यह संकेत माना जाएगा कि उत्पादन गतिविधियां अभी भी मजबूत बनी हुई हैं।

तीसरा इंडिकेटर PFCE यानी निजी अंतिम उपभोग व्यय है। आसान भाषा में कहें तो लोग कितना खर्च कर रहे हैं, यह इसी आंकड़े से पता चलता है। भारत जैसी खपत आधारित अर्थव्यवस्था में इसका महत्व काफी ज्यादा है क्योंकि GDP में इसका योगदान आधे से भी ज्यादा माना जाता है। रोजमर्रा की खरीदारी, सेवाओं पर खर्च और उपभोक्ता मांग की रफ्तार इसी से मापी जाती है। हालांकि इस बार इसके थोड़ा कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर उपभोग की रफ्तार धीमी दिखती है तो यह संकेत हो सकता है कि लोग खर्च करने में सावधानी बरत रहे हैं।

सरकारी खर्च यानी GFCE भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, योजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं और विकास कार्यों पर कितना खर्च कर रही है, इसका असर सीधे आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी पूंजीगत खर्च को आर्थिक ग्रोथ का बड़ा इंजन माना गया है। ऐसे में अगर सरकारी खर्च उम्मीद से कम दिखाई देता है तो इससे विकास दर को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

इसके अलावा GFCF यानी सकल स्थिर पूंजी निर्माण पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। यह बताता है कि कंपनियां और सरकार भविष्य के लिए कितना निवेश कर रही हैं। नई फैक्ट्रियां, मशीनें, सड़कें, रेलवे, टेक्नोलॉजी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इसी श्रेणी में आते हैं। अगर निवेश बढ़ता दिखाई देता है तो यह संकेत माना जाता है कि आने वाले वर्षों में आर्थिक गतिविधियां मजबूत रह सकती हैं। अनुमान है कि इस बार निवेश से जुड़े आंकड़े बेहतर दिख सकते हैं।

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05 Jun 2026 By दैनिक जागरण

FY26 GDP आंकड़े आज होंगे जारी, नए बेस ईयर के साथ इन 6 संकेतकों पर रहेगी बाजार की नजर

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देश की अर्थव्यवस्था की दिशा और आने वाले महीनों में बाजार की चाल को लेकर आज का दिन अहम माना जा रहा है। केंद्र सरकार शुक्रवार शाम 4 बजे FY26 की जनवरी-मार्च तिमाही के GDP आंकड़े जारी करेगी। इसके साथ पूरे वित्त वर्ष के विकास दर के आंकड़े भी सामने आएंगे। इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आंकड़े नए बेस ईयर 2022-23 के साथ जारी किए जाएंगे, इसलिए सिर्फ ग्रोथ नंबर ही नहीं बल्कि उनकी व्याख्या भी काफी महत्वपूर्ण रहने वाली है। शेयर बाजार से लेकर निवेशकों, कंपनियों और नीति निर्माताओं तक सभी की नजर इन आंकड़ों पर बनी हुई है।

इकोनॉमिस्ट्स का अनुमान है कि FY26 में भारत की आर्थिक वृद्धि करीब 7.4 फीसदी रह सकती है। हालांकि यह अनुमान पहले जारी दूसरे एडवांस एस्टिमेट्स से थोड़ा कम माना जा रहा है। बाजार के जानकार मानते हैं कि केवल GDP ग्रोथ नंबर देखना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि उसके पीछे छिपे कई इंडिकेटर्स आने वाले समय की असली तस्वीर दिखा सकते हैं। यही वजह है कि आज जारी होने वाले आंकड़ों में छह प्रमुख संकेतकों पर सबसे ज्यादा फोकस रहने वाला है।

सबसे पहले बात GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद की करें तो यही वह आंकड़ा होता है जिससे पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। GDP देश के भीतर तय समय में तैयार हुई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं की कुल वैल्यू को दर्शाता है। अगर ग्रोथ उम्मीद से ज्यादा आती है तो इसका असर बाजार और निवेश माहौल पर सकारात्मक दिख सकता है, जबकि कमजोर आंकड़े निवेशकों की चिंता बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञ इस बार रियल और नॉमिनल दोनों तरह के GDP आंकड़ों पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि इनसे महंगाई और वास्तविक आर्थिक गतिविधियों दोनों की तस्वीर साफ होगी।

दूसरा महत्वपूर्ण संकेतक GVA यानी सकल मूल्य वर्धित माना जा रहा है। कई अर्थशास्त्री GDP से ज्यादा GVA को अर्थव्यवस्था की असली स्थिति समझने का पैमाना मानते हैं क्योंकि यह सीधे उत्पादन गतिविधियों से जुड़ा होता है। इसमें कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और इंडस्ट्री सेक्टर का प्रदर्शन साफ दिखाई देता है। अनुमान है कि FY26 में GVA ग्रोथ करीब 7.7 फीसदी रह सकती है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो यह संकेत माना जाएगा कि उत्पादन गतिविधियां अभी भी मजबूत बनी हुई हैं।

तीसरा इंडिकेटर PFCE यानी निजी अंतिम उपभोग व्यय है। आसान भाषा में कहें तो लोग कितना खर्च कर रहे हैं, यह इसी आंकड़े से पता चलता है। भारत जैसी खपत आधारित अर्थव्यवस्था में इसका महत्व काफी ज्यादा है क्योंकि GDP में इसका योगदान आधे से भी ज्यादा माना जाता है। रोजमर्रा की खरीदारी, सेवाओं पर खर्च और उपभोक्ता मांग की रफ्तार इसी से मापी जाती है। हालांकि इस बार इसके थोड़ा कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर उपभोग की रफ्तार धीमी दिखती है तो यह संकेत हो सकता है कि लोग खर्च करने में सावधानी बरत रहे हैं।

सरकारी खर्च यानी GFCE भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, योजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं और विकास कार्यों पर कितना खर्च कर रही है, इसका असर सीधे आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में सरकारी पूंजीगत खर्च को आर्थिक ग्रोथ का बड़ा इंजन माना गया है। ऐसे में अगर सरकारी खर्च उम्मीद से कम दिखाई देता है तो इससे विकास दर को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

इसके अलावा GFCF यानी सकल स्थिर पूंजी निर्माण पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। यह बताता है कि कंपनियां और सरकार भविष्य के लिए कितना निवेश कर रही हैं। नई फैक्ट्रियां, मशीनें, सड़कें, रेलवे, टेक्नोलॉजी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इसी श्रेणी में आते हैं। अगर निवेश बढ़ता दिखाई देता है तो यह संकेत माना जाता है कि आने वाले वर्षों में आर्थिक गतिविधियां मजबूत रह सकती हैं। अनुमान है कि इस बार निवेश से जुड़े आंकड़े बेहतर दिख सकते हैं।

https://www.dainikjagranmpcg.com/business/fy26-gdp-figures-will-be-released-today-with-the-new/article-55021

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