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बुर्का और पर्दा प्रथा पर इम्तियाज अली के बयान से विवाद, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
बालीवुड डेस्क
महिलाओं के बुर्के में सहज होने को बताया पिछड़े समाज की निशानी, बयान के बाद समर्थन और विरोध दोनों में बंटी राय
फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली इन दिनों अपनी नई फिल्म “मैं वापस आऊंगा” को लेकर सुर्खियों में हैं, लेकिन इसी बीच उनका एक बयान चर्चा का बड़ा कारण बन गया है। हाल ही में एक पॉडकास्ट बातचीत के दौरान उन्होंने बुर्का और पर्दा प्रथा पर अपनी राय रखी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई है। बयान सामने आने के बाद से ही अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। कई जगह यह चर्चा केवल फिल्मी दुनिया तक सीमित नहीं रहकर सामाजिक बहस का रूप ले चुकी है। पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान इम्तियाज अली ने समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषयों पर अपनी राय साझा की। इसी दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात ठीक नहीं लगती जब कोई महिला यह कहती है कि वह बुर्के या पर्दे में सहज महसूस करती है। उनके अनुसार अगर किसी समाज में यह सोच गहराई से बैठ जाए कि इस तरह की व्यवस्था में रहना सामान्य है, तो यह कहीं न कहीं पिछड़े सामाजिक ढांचे की निशानी है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय की आलोचना करना नहीं है, बल्कि वह अपनी समझ के आधार पर यह बात रख रहे हैं। उन्होंने बातचीत में आगे यह भी कहा कि कई बार लोग लंबे समय से चली आ रही परंपराओं को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेते हैं। उनके मुताबिक यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब व्यक्ति को यह महसूस ही नहीं होता कि वह किसी सीमित सोच या ढांचे के भीतर रह रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि वह किसी पर अपनी राय थोपने में विश्वास नहीं रखते और हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने का अधिकार है।
उनके इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कुछ यूजर्स ने इसे महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद पर टिप्पणी बताते हुए कहा कि अगर कोई महिला अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है तो उसे पिछड़ेपन से जोड़ना गलत है। कई लोगों का कहना था कि यह व्यक्तिगत आस्था और संस्कृति से जुड़ा मामला है, जिसे बाहरी नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों ने इम्तियाज अली के बयान का समर्थन किया और कहा कि समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि इम्तियाज अली जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां बुर्का और पर्दा प्रथा लंबे समय से मौजूद रही है। ऐसे में उनके इस बयान को लेकर लोगों ने उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने उन्हें पाखंडी तक कह दिया, जबकि कुछ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है और उसे उसकी पहचान के आधार पर जज नहीं किया जाना चाहिए। बयान के बाद बहस सिर्फ समर्थन और विरोध तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह विचारों की टकराहट में बदल गई। कई यूजर्स ने लिखा कि आधुनिक समाज में किसी भी परंपरा पर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन उसे अपमानजनक भाषा में नहीं कहा जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जोड़ते हुए कहा कि इस तरह के बयान समाज में अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं।
इसी बातचीत के दौरान इम्तियाज अली ने यह भी कहा कि आज के समय में संतुलित सोच रखने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ती वैचारिक कट्टरता चिंता का विषय है और लोगों को एक-दूसरे के विचारों के प्रति सहिष्णु रहना चाहिए। हालांकि उनके इस हिस्से को भी अलग-अलग तरीके से देखा गया, कुछ ने इसे सकारात्मक बताया तो कुछ ने इसे उनके बयान का बचाव माना। इस बीच उनकी नई फिल्म “मैं वापस आऊंगा” भी चर्चा में बनी हुई है। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है और एक अधूरी प्रेम कहानी को दर्शाती है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना, शरवरी वाघ और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। फिल्म को लेकर पहले ही अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ चुकी हैं। कुछ लोगों ने इसकी कहानी की सराहना की है, जबकि कुछ ने इसे लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण से सवाल भी उठाए हैं। फिल्म के पहले सप्ताह के कलेक्शन को लेकर भी रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिसमें बताया गया है कि फिल्म ने शुरुआती दिनों में ठीक-ठाक प्रदर्शन किया है। पाकिस्तान के कुछ फिल्म निर्माताओं और समीक्षकों ने भी इस फिल्म की तारीफ की है और इसे भावनात्मक रूप से मजबूत कहानी बताया है। इससे फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ हद तक चर्चा मिली है। इम्तियाज अली हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए भावनात्मक और सामाजिक विषयों को अलग अंदाज में प्रस्तुत किया है। “जब वी मेट”, “रॉकस्टार”, “हाईवे”, “तमाशा” और “लव आज कल” जैसी फिल्मों ने उन्हें खास पहचान दिलाई है। उनकी फिल्मों में अक्सर रिश्तों, भावनाओं और समाज की जटिलताओं को गहराई से दिखाया जाता है।
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बुर्का और पर्दा प्रथा पर इम्तियाज अली के बयान से विवाद, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
बालीवुड डेस्क
फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली इन दिनों अपनी नई फिल्म “मैं वापस आऊंगा” को लेकर सुर्खियों में हैं, लेकिन इसी बीच उनका एक बयान चर्चा का बड़ा कारण बन गया है। हाल ही में एक पॉडकास्ट बातचीत के दौरान उन्होंने बुर्का और पर्दा प्रथा पर अपनी राय रखी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई है। बयान सामने आने के बाद से ही अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर लोग अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। कई जगह यह चर्चा केवल फिल्मी दुनिया तक सीमित नहीं रहकर सामाजिक बहस का रूप ले चुकी है। पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान इम्तियाज अली ने समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषयों पर अपनी राय साझा की। इसी दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें यह बात ठीक नहीं लगती जब कोई महिला यह कहती है कि वह बुर्के या पर्दे में सहज महसूस करती है। उनके अनुसार अगर किसी समाज में यह सोच गहराई से बैठ जाए कि इस तरह की व्यवस्था में रहना सामान्य है, तो यह कहीं न कहीं पिछड़े सामाजिक ढांचे की निशानी है। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय की आलोचना करना नहीं है, बल्कि वह अपनी समझ के आधार पर यह बात रख रहे हैं। उन्होंने बातचीत में आगे यह भी कहा कि कई बार लोग लंबे समय से चली आ रही परंपराओं को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेते हैं। उनके मुताबिक यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब व्यक्ति को यह महसूस ही नहीं होता कि वह किसी सीमित सोच या ढांचे के भीतर रह रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि वह किसी पर अपनी राय थोपने में विश्वास नहीं रखते और हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने का अधिकार है।
उनके इस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कुछ यूजर्स ने इसे महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद पर टिप्पणी बताते हुए कहा कि अगर कोई महिला अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है तो उसे पिछड़ेपन से जोड़ना गलत है। कई लोगों का कहना था कि यह व्यक्तिगत आस्था और संस्कृति से जुड़ा मामला है, जिसे बाहरी नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों ने इम्तियाज अली के बयान का समर्थन किया और कहा कि समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि इम्तियाज अली जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं, वहां बुर्का और पर्दा प्रथा लंबे समय से मौजूद रही है। ऐसे में उनके इस बयान को लेकर लोगों ने उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने उन्हें पाखंडी तक कह दिया, जबकि कुछ ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है और उसे उसकी पहचान के आधार पर जज नहीं किया जाना चाहिए। बयान के बाद बहस सिर्फ समर्थन और विरोध तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह विचारों की टकराहट में बदल गई। कई यूजर्स ने लिखा कि आधुनिक समाज में किसी भी परंपरा पर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन उसे अपमानजनक भाषा में नहीं कहा जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं से जोड़ते हुए कहा कि इस तरह के बयान समाज में अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं।
इसी बातचीत के दौरान इम्तियाज अली ने यह भी कहा कि आज के समय में संतुलित सोच रखने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज में बढ़ती वैचारिक कट्टरता चिंता का विषय है और लोगों को एक-दूसरे के विचारों के प्रति सहिष्णु रहना चाहिए। हालांकि उनके इस हिस्से को भी अलग-अलग तरीके से देखा गया, कुछ ने इसे सकारात्मक बताया तो कुछ ने इसे उनके बयान का बचाव माना। इस बीच उनकी नई फिल्म “मैं वापस आऊंगा” भी चर्चा में बनी हुई है। यह फिल्म भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है और एक अधूरी प्रेम कहानी को दर्शाती है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना, शरवरी वाघ और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार प्रमुख भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। फिल्म को लेकर पहले ही अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ चुकी हैं। कुछ लोगों ने इसकी कहानी की सराहना की है, जबकि कुछ ने इसे लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण से सवाल भी उठाए हैं। फिल्म के पहले सप्ताह के कलेक्शन को लेकर भी रिपोर्ट्स सामने आई हैं, जिसमें बताया गया है कि फिल्म ने शुरुआती दिनों में ठीक-ठाक प्रदर्शन किया है। पाकिस्तान के कुछ फिल्म निर्माताओं और समीक्षकों ने भी इस फिल्म की तारीफ की है और इसे भावनात्मक रूप से मजबूत कहानी बताया है। इससे फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ हद तक चर्चा मिली है। इम्तियाज अली हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए भावनात्मक और सामाजिक विषयों को अलग अंदाज में प्रस्तुत किया है। “जब वी मेट”, “रॉकस्टार”, “हाईवे”, “तमाशा” और “लव आज कल” जैसी फिल्मों ने उन्हें खास पहचान दिलाई है। उनकी फिल्मों में अक्सर रिश्तों, भावनाओं और समाज की जटिलताओं को गहराई से दिखाया जाता है।
