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हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंदर हो रहे बड़े बिहेवियर बदलाव का मिल रहा संकेत
डिजिटल डेस्क
-कोविड ने कंटेट, दर्शकों का रुख और पूरी इंडस्ट्री को भी बदल दिया
हाल में एक दिलचस्प बात हुई। बतौर फिल्म समीक्षक मैंने दो फिल्में देखीं। धुरंधर और अस्सी। बिना तुलना में गये, दोनों फिल्में मुझे पसंद आयी। अलग प्रकृति की फिल्में थी। जाहिर है अलग ट्रीटीमेंट और ऑरा भी। दोनों का क्राफ्ट अलग था। लेकिन इसका अंतिम परिणाम एकदम अलग रहा। धुरंधर जहां सफलता का कीर्तिमान गढ़ गया।
तो अस्सी फर्श पर गिर गया। दो अच्छी फिल्म। दोनों का परिणाम इतना अलग। यह सामान्य घटना नहीं है। यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंदर हो रहे बड़े बिहेवियर बदलाव का संकेत है जिसपर शायद कोई बात नहीं करना चाह रहा है। न एक्टर, डायरेक्टर,स्टोरी टेलर न बिजनेस से जुड़े लोग और न दर्शक। दोनों फिल्मों के रिव्यू बेहतर थे।
धुरंधर पहले दिन से परफेक्ट इंटरनेटमेंट एलिमेंट था। इंटरनेट सनसनी बन गयी थी। तो अस्सी पर भी इतने रील, कमेंट आ रहे थे कि कम बजट की फिल्म के लिए आशा देने वाली थी। लेकिन अस्सी अनुभव सिन्हा-तापसी जोड़ी की पिछली फिल्म थप्पड़ का आधा भी न रह सकी। कई बार उम्मीद से कम रहना चलता है कि लेकिन इतना पीछे रहना एक अलग बहस छेड़ देती है। ठीक उसी समय धुरंधर सिर्फ सफल नहीं होती है लेकिन जिस स्केल पर जाकर सफल हो जाती है वह भी नये ट्रेंड को जन्म दे देती है। ऐसा लगता है कि कोविड ने जब दुनिया में बहुत कुछ बदला तो हिंदी फिल्मों के कंटेट,दर्शकों का रूख और पूरी इंडस्ट्री को भी बदल दिया। इसे आप अस्सी और धुरंधर फिल्मों की तुलना से समझ सकते हैं।
कोविड से ठीक पहले थप्पड़ आयी। वह चल गयी। अगर समीक्षकों के स्तर पर देखें तो थप्पड़ से भी बेहतर फिल्म अस्सी को बतायी गयी। लेकिन दर्शक नहीं मिले। जो भी दर्शक मिले उसने तारीफ की। मतलब फिल्म से दिक्कत नहीं थी। दिक्क्त थिएटर जाने से थी। क्या फिल्में का चलना भी अब राजनीतिक रैलियों की तरह हो गयी जब आपको दर्शकों को थिएटर तक पहुंचाने के लिए संसाधनों,नेटवर्क और तमाम हथकंडे का इस्तेमाल करना होगा तब जाकर वे आएंगे और तब जाकर हिट और फ्लॉप का फैसला हेागा।
धुरंधर फिल्म को दर्शकों ने बेशक पसंद की और सुपर हिट होने के कई फैक्टर इसमें मौजूद हैं लेकिन फिल्म के रिलीज होने से पहले दर्शकों को सिनेमाघर तक खींचने के लिए कैसे-कैसे घटनाक्रम हुए उसे सबने देखा। दरअसल तटस्थ दर्शक जिसे सिर्फ फिल्म से मतलब है वह अच्छी फिल्म देखने के लिए इंतजार कर सकता है और ओटीटी पर आने का इंतजार करता है। क्या ऐसे तटस्थ दर्शक जो सिर्फ कंटेट या अच्छी फिल्में देखने के लिए जाना चाहता है,उसके मन में थिएटर जाने की इच्छा कम हो गयी या उन्हें अपने तक खींचने का तरीक इंडस्ट्री भूल गया है? क्या इन्हें अपने रणनीति में बदलाव करना होगा? क्या दर्शक ओटीटी-थिएटर की फिल्मों के बीच अंतर कर रहा है? तो इंडस्ट्री को भी उसी अनुरूप अपने विजन में बदलाव करने की आवश्यकता है या वे आने वाले समय में दर्शकों को अस्सी जैसी फिल्मों के लिए थिएटर में कैसे लाएं इसके लिए कोई रणनीति है? साथ ही अब यह भी एक ट्रंड है कि फिल्म चलती नहीं है तो बिल्कुल नहीं चलती है। चलती है तो बहुत चलती है। मतलब जीरो स्कोर या नहीं तो सेंचुरी। बीच की फिल्में कम होती है जिसमें अस्सी या दूसरी ऐसी फिल्में फिट होती थी। इनके लिए स्पेस ही नहीं दिख रहा है।
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हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंदर हो रहे बड़े बिहेवियर बदलाव का मिल रहा संकेत
डिजिटल डेस्क
हाल में एक दिलचस्प बात हुई। बतौर फिल्म समीक्षक मैंने दो फिल्में देखीं। धुरंधर और अस्सी। बिना तुलना में गये, दोनों फिल्में मुझे पसंद आयी। अलग प्रकृति की फिल्में थी। जाहिर है अलग ट्रीटीमेंट और ऑरा भी। दोनों का क्राफ्ट अलग था। लेकिन इसका अंतिम परिणाम एकदम अलग रहा। धुरंधर जहां सफलता का कीर्तिमान गढ़ गया।
तो अस्सी फर्श पर गिर गया। दो अच्छी फिल्म। दोनों का परिणाम इतना अलग। यह सामान्य घटना नहीं है। यह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अंदर हो रहे बड़े बिहेवियर बदलाव का संकेत है जिसपर शायद कोई बात नहीं करना चाह रहा है। न एक्टर, डायरेक्टर,स्टोरी टेलर न बिजनेस से जुड़े लोग और न दर्शक। दोनों फिल्मों के रिव्यू बेहतर थे।
धुरंधर पहले दिन से परफेक्ट इंटरनेटमेंट एलिमेंट था। इंटरनेट सनसनी बन गयी थी। तो अस्सी पर भी इतने रील, कमेंट आ रहे थे कि कम बजट की फिल्म के लिए आशा देने वाली थी। लेकिन अस्सी अनुभव सिन्हा-तापसी जोड़ी की पिछली फिल्म थप्पड़ का आधा भी न रह सकी। कई बार उम्मीद से कम रहना चलता है कि लेकिन इतना पीछे रहना एक अलग बहस छेड़ देती है। ठीक उसी समय धुरंधर सिर्फ सफल नहीं होती है लेकिन जिस स्केल पर जाकर सफल हो जाती है वह भी नये ट्रेंड को जन्म दे देती है। ऐसा लगता है कि कोविड ने जब दुनिया में बहुत कुछ बदला तो हिंदी फिल्मों के कंटेट,दर्शकों का रूख और पूरी इंडस्ट्री को भी बदल दिया। इसे आप अस्सी और धुरंधर फिल्मों की तुलना से समझ सकते हैं।
कोविड से ठीक पहले थप्पड़ आयी। वह चल गयी। अगर समीक्षकों के स्तर पर देखें तो थप्पड़ से भी बेहतर फिल्म अस्सी को बतायी गयी। लेकिन दर्शक नहीं मिले। जो भी दर्शक मिले उसने तारीफ की। मतलब फिल्म से दिक्कत नहीं थी। दिक्क्त थिएटर जाने से थी। क्या फिल्में का चलना भी अब राजनीतिक रैलियों की तरह हो गयी जब आपको दर्शकों को थिएटर तक पहुंचाने के लिए संसाधनों,नेटवर्क और तमाम हथकंडे का इस्तेमाल करना होगा तब जाकर वे आएंगे और तब जाकर हिट और फ्लॉप का फैसला हेागा।
धुरंधर फिल्म को दर्शकों ने बेशक पसंद की और सुपर हिट होने के कई फैक्टर इसमें मौजूद हैं लेकिन फिल्म के रिलीज होने से पहले दर्शकों को सिनेमाघर तक खींचने के लिए कैसे-कैसे घटनाक्रम हुए उसे सबने देखा। दरअसल तटस्थ दर्शक जिसे सिर्फ फिल्म से मतलब है वह अच्छी फिल्म देखने के लिए इंतजार कर सकता है और ओटीटी पर आने का इंतजार करता है। क्या ऐसे तटस्थ दर्शक जो सिर्फ कंटेट या अच्छी फिल्में देखने के लिए जाना चाहता है,उसके मन में थिएटर जाने की इच्छा कम हो गयी या उन्हें अपने तक खींचने का तरीक इंडस्ट्री भूल गया है? क्या इन्हें अपने रणनीति में बदलाव करना होगा? क्या दर्शक ओटीटी-थिएटर की फिल्मों के बीच अंतर कर रहा है? तो इंडस्ट्री को भी उसी अनुरूप अपने विजन में बदलाव करने की आवश्यकता है या वे आने वाले समय में दर्शकों को अस्सी जैसी फिल्मों के लिए थिएटर में कैसे लाएं इसके लिए कोई रणनीति है? साथ ही अब यह भी एक ट्रंड है कि फिल्म चलती नहीं है तो बिल्कुल नहीं चलती है। चलती है तो बहुत चलती है। मतलब जीरो स्कोर या नहीं तो सेंचुरी। बीच की फिल्में कम होती है जिसमें अस्सी या दूसरी ऐसी फिल्में फिट होती थी। इनके लिए स्पेस ही नहीं दिख रहा है।
